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सिर्फ नारा नहीं है कश्मीर की आजादी- मीरवाईज
मीरवाईज उमर फारूख हुर्रियत कांफ्रेंस के चेयरमैन हैं. पहली बार वे पाकिस्तान समर्थक सैयद अली शाह गिलानी की तहरीके हुर्रियत के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. उमर फारूख हुर्रियत कांफ्रेस में उदार धड़े के नेता समझे जाते हैं और कश्मीर घाटी में छाये संकट के बीच दो बार प्रधानमंत्री से मिलकर बात कर चुके हैं. मिन्ट की डिप्लोमेटिक एडीटर ज्योति मल्होत्रा ने उनसे श्रीनगर में बातचीत की.
तहलका संपादक के नाम खुला पत्र
प्रिय तरूण तेजपाल जी, मैं तहलका का नियमित पाठक हूं. इसलिए पिछले दिनों जब तहलका ने सिमी पर केन्द्रित अंक निकाला तो मैंने इसे बहुत उत्सुकता से पढ़ा. लेकिन पढ़कर मैं चकित रह गया. मुझे उम्मीद थी कि तीन महीनों की खोजबीन के बाद आपने सिमी के बारे में जो जानकारी दी होगी उससे निश्चित ही मेरी समझ में बढ़ोत्तरी होगी.......जमीन नहीं निशाने पर है यात्रा
आखिरकार अमरनाथ यात्रा पर कोई रोक नहीं लगायी गयी है फिर क्या कारण है कि जम्मू में उठा जनज्वार थमने का नाम नहीं ले रहा है? सालों सांप्रदायिक भेदभाव का गवाह रहा जम्मू अपने हक के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने के मूड में क्यों आ गया है? पलायन कर जम्मू में शरणार्थी शिविरों में लगभग अपनी पूरी उम्र गुजार चुके कश्मीरी पण्डित, डोगरे ने आंदोलन में जी जान से क्यों कूद गये हैं? इस मामले को ठीक से समझने की जरूरत है....जम्मू कश्मीर बनाम हिन्दू मुसलमान
आजादी के तत्काल बाद नई दिल्ली आये शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने स्पष्ट शब्दों में कश्मीर की राजनीति और भारतीय संविधान के रिश्ते को उजागर किया था. अब्दुल्ला ने कहा था "कपूरथला, अलवर या भरतपुर में एक भी मुसलमान नहीं है, जबकि ये कभी मुस्लिम बहुमत वाले रजवाड़े हुआ करते थे. कश्मीरी मुसलमानों को इस बात का डर है कि उनके साथ भी कहीं ऐसा ही न हो." इस्लामी कट्टरपंथी नेताओं ने बहुत पहले से इस आशंका पर राजनीति करने की कला विकसित कर ली थी. ...अमरनाथ विवाद कैसे बना फसाद
यह जानने की गंभीर कोशिश नहीं हुई कि सिर्फ फुटबाल के पांच मैदानों के बराबर जमीन दिये जाने के खिलाफ इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों हुई? इसे समझने की कोशिश तो बिल्कुल नहीं हुई कि छत्तरहामा में मारे गये दो संदिग्ध नौजवानों को अमरनाथ विवाद का शहीद बताकर जिस फसाद की फसल बोई गयी क्या वे नौजवान कश्मीरी थे? क्या छत्तरहामा के किसी निवासी ने इससे पहले कभी किसी जिहाद में शिरकत की थी? अगर इसे सिर्फ चुनाव के लिए खड़ा किया गया टंटा भी मान लें तो यह विवाद फसाद में कैसे तब्दील हो गया? ...चाराचोर लालू जमीनखोर लालू
चारा खाने वाले लालू अब चारा नहीं सीधे जमीन ही खा रहे हैं. वे देश के राजनीतिक इतिहास में घोटाले की नयी कहानी लिख रहे हैं. और तरीका भी ऐसा कि अच्छे से अच्छा जांचकर्ता भी कानूनी रूप से उलझाने में खुद उलझ जाए. वे रेलवे में नौकरी देने और दूसरे काम करवाने की एवज में पैसा नहीं बल्कि जमीन का रजिस्ट्री पेपर लेते हैं, वह भी अपने नहीं बल्कि अपने परिवार के किसी सदस्य या रिश्तेदार के नाम. इस काम में उनके दामाद से लेकर मैनेजर प्रेम गुप्ता तक सभी शामिल हैं. ...कांग्रेस को चाहिए एजंसी भाजपा को अमरनाथ
दो खबरें ऐसी हैं जो लोकसभा चुनाव के बारे में ही नहीं बता रहीं बल्कि दिग्गज पार्टियों द्वारा कैसी तैयारी शुरू की जा चुकी है इसका भी संकेत कर रही हैं. अमरनाथ विवाद में आडवाणी और तोगड़िया का बयान हवा खराब करनेवाला है. सब जानते हैं उनका अमरनाथ मसले से शायद की कुछ लेना-देना हो. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस मुख्यालय में एक ऐसी विज्ञापन एजंसी की खोज चरम पर है जो चुनाव में कांग्रेस का गरीब परस्त चेहरा चमका सके. ...अगस्त क्रांति का पहला दिन
कुछ तिथियां ऐसी होती है जिन पर समय के थपेड़े असर नहीं डाल पाते. अगस्त क्रांति का पहला दिन (9 अगस्त 1942: भारत छोड़ो) आज भी वैसा ही तरोताजा हो जाता है जैसा छाछठ साल पहले था. इस रोमांचक वाकये के विषय में हर दौर में काफी लिखा और कहा गया. ...गांधी जी ने कहा था- करेंगे या मरेंगे
9 अगस्त 1942 को गांधी जी ने क्या कहा था? 'करो या मरो' या फिर 'करेंगे या मरेंगे'. 'करो या मरो' और करेंगे या मरेंगे में केवल भाषा का ही नहीं भाव का भी फर्क है. 9 अगस्त की सुबह पांच बजे अपनी गिरफ्तारी से ठीक पहले देश के नाम दिये गये संदेश के नीचे गांधी जी ने हाथ से हिन्दी में लिखा था- करेंगे या मरेंगे. गांधी मार्ग के संपादक अनुपम मिश्र कहते हैं "लेकिन 1942 से लेकर आज तक हम करेंगे या मरेंगे को करो या मरो जैसा आदेशात्मक और कठोर अनुवाद चलाते आ रहे हैं." ...हिन्दी मरे तो हिन्दुस्तान बचे
आप सब अपने-अपने टेलिविजनों पर रोज देख रहे होंगे, कि इन दिनों एक विज्ञापन में देशभक्ति से भरे आदमी का गुस्सा उफनकर बाहर आता है, जिसमें वह कहता है, `देश बदल रहा है, भेष कब बदलोगे ?´ उसका वश नहीं चलता, वरना भेष नहीं बदलने वाले को वह खुद ही ऐसे पीटता जैसे कि वह क्रिकेट के मैदान में अपने बल्ले से गेंद को पीटता है। लेकिन, वह भेष न बदलने वाले को कार पार्किंग के चौकीदार से पिटता हुआ, बताता है।...आधुनिक किसे कहेंगे?
आज के जमाने में आधुनिक उसे कहते हैं जो बहुत क्लिष्ट हो, जटिल हो, काम्प्लेक्स हो. लेकिन क्या सरलता और सादगी आधुनिकता का प्रतीक नहीं हो सकती? मैं बहुत सारे किसानों से मिलता हूं. कुछ ऐसे किसानों से काफी प्रभावित हुआ हूं जिन्होंने किसानी की अपनी तकनीकि अपनी समझ के अनुसार विकसित की हैं. ऐसे ही एक किसान हैं श्री भास्कर सावे. वे महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा पर देहरी नाम के गांव में रहते हैं....धर्म के धंधें में मासूमों की बलि
आशाराम के आश्रमों में हो रही मासूमों की हत्या के तह में आप जाएंगे तो पायेंगे यहां भी कारण संपत्ति है. पूरी मानवता को मायामोह से मुक्ति का रास्ता बतानेवाले आशाराम खुद संपत्तिभोगी हैं. धर्म के धंधे में जितना माल कमाया तो उस माल को धीरे-धीरे व्यापार की शक्ल दे दिया. लेकिन उन्हें शायद यह नहीं मालूम था कि धर्म के नाम पर जो संपत्ति वे इकट्ठा कर रहे हैं एक दिन वही संपत्ति उन्हें ले डूबेगी. ...श्रीअमरनाथ श्राईन बोर्ड और विवाद
अमरनाथ यात्रा का सारा प्रबंधन सरकार द्वारा होता था लेकिन उसके कुप्रबंधन तथा अव्यवस्था के चलते 1996 में आए बर्फानी तूफान में सैकड़ों श्रद्धालु मारे गये थे. यात्रा आतंकवादियों के आक्रमण का भी निशाना बनी. तब केन्द्र सरकार ने अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा-व्यवस्था, प्रबंधन आदि के लिए ´नितीश सेन कमेटी´ का गठन किया। कमेटी ने सुझाव देते हुए कहा कि ...मौत का पानी
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पानी में आर्सेनिक की मौजूदगी पर उस वक्त लोगों का ध्यान गया, जब 1994-95 में 'द एनालिस्ट' में दीपांकर चक्रवर्ती का शोधपत्र छपा, जिस पर 1996 में 'द गार्डियन' में छपे एक लेख में 'द वाटर ऑफ डैथ' (मौत का पानी) शीर्षक से टिप्पणी की गई थी। भूजल में आर्सेनिक की उपलब्धता अब पानी को मौत का पानी बना रही है. दीपांकर चक्रवर्ती से बातचीत-...Author info
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