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भाजपा के लिए गंभीर आत्ममंथन का समय
आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य के वर्तमान अंक (31 मई, 2009) में भाजपा की कड़ी आलोचना छपी है. पांचजन्य ने अपने संपादकीय में लिखा है कि यह चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती और चेतावनी के रूप में उभरकर आया है. संपादकीय कहता है कि आमचुनाव का परिणामों के बाद भाजपा को गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए. हालांकि आरएसएस मानता है कि अभी भी भाजपा में सुधार की गुंजाइश है और वह एक बार फिर नयी पारी की शुरूआत करेगी. अपने पाठकों के लिए हम वह संपादकीय प्रकाशित कर रहे हैं.
प्रभाकरण को पैदा किसने किया?
वेलुपिल्लई प्रभाकरण का खात्मा उस "आतंक" का खात्मा है जिसने बीसवीं सदी में दुनिया में आतंक की नयी परिभाषा गढ़ी. कहते हैं कि प्रभाकरण कोई 90 हजार हत्याओं के लिए जिम्मेदार था. उसके संगठन ने हत्याओं के नये नये प्रकार विकसित किये. इस बहस में पड़ने की जरूरत नहीं है कि प्रभाकरण ने यह सब श्रीलंका में तमिलों के हक और हित की लड़ाई के नाम पर किया या आंतक और हिंसा के जरिए एक स्वतंत्र राष्ट्र का सपना साकार करना चाहता था. लेकिन प्रभाकरण को इस हद तक हिंसक किसने बनाया? उसकी संस्था को किन लोगों ने मदद किया और क्यों? उन तथ्यों की विस्तृत पड़ताल जरूरी है जिन्होंने प्रभाकरण को दुनिया का सबसे निर्मम हत्यारा बना दिया और तमिलों के अधिकारों के लिए बनी संस्था को दुनिया का सबसे निर्दयी आतंकवादी संगठन. हकीकत यह है कि उन्नीसवीं सदी के शुरू में अमेरिकन मिशनरीज ने जाफना में जो चिंगारी भड़काई थी आज भयंकर आग बन कर श्रीलंका को भस्म कर रहा है....एक चुनाव सर्वेक्षण जरा हटकर
जैसे ही लोकसभा चुनावों के लिए आखिरी दौर का मतदान समाप्त हुआ विभिन्न समाचार चैनलों, अखबारों ने अपने अपने चुनाव सर्वेक्षण जारी करने शुरू कर दिये. केवल मीडिया के सर्वे सार्वजनिक नहीं हुए बल्कि राजनीतिक दलों ने अपने आंतरिक सर्वे भी सार्वजनिक किये और देश के दो बड़े राजनीतिक दलों ने अपने आंतरिक सर्वे को आधार मानते हुए केन्द्र में अपनी सरकार बनाने की संभावना भी जताई है. लेकिन इन सर्वेक्षणों के बीच बच्चों के लिए काम करनेवाली एक संस्था बचपन बचाओ आंदोलन ने भी एक सर्वेक्षण किया और पाया कि इस आमचुनाव में बच्चों का भविष्य कोई मुद्दा नहीं बन पाया....तमिलनाडु के दलित ईसाई मुद्दा क्यों नहीं बनते?
आम चुनाव के पांचवे चरण में तमिलनाडु की सभी 39 सीटों पर 13 मई को मतदान होगा. तमिलनाडु के चुनावी संग्राम में दलित ईसाइयों से सबंधित मुद्दे हाशिए पर है कांग्रेस समेत तमाम क्षेत्रीय पार्टिया धर्मांतरित ईसाइयों के बुनयादी मसलों से ध्यान हटाकर उन्हें अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने का झुनझुना थमा रही है। पिछले कई दशकों से राज्य के दलित ईसाई चर्च एवं समाज में भेदभाव का शिकार हो रहे है। गैर ब्राह्राणवाद के संस्थापक पेरियार और अन्नादुराय के समय से ही वहां दलित जातिया आत्मसम्मान के लिए संघर्षरत रही है।...सरकारी पप्पूओं को कौन जगाएगा?
सरकार की चिंता है कि मतदान का प्रतिशत कम हो रहा है इसलिए दिल्ली में इस बार खास तौर पर मतदान करने के लिए चुनाव आयोग ने विज्ञापन अभियान चलाया. गैर-सरकारी संगठनों के अलावा मीडिया ने भी इस बारे में जागरूकता फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन यह क्या? उत्साह से लबालब मतदाता जब पोलिंग बूथ पर पहुंचा तो नाम ही गायब. दिल्ली और दिल्ली से सटे गाजियाबाद के इलाकों में एक जैसी परेशानी से मतदाताओं को दो-चार होना पड़ा. कहीं मतदाता सूची से नाम ही गायब तो कहीं गलत और गलत पता. निश्चित रूप से यह कमाल सरकारी पप्पूओं का है. आम मतदाता को पप्पू न बनने की सलाह देनेवाली सरकारें अपने ही महकमें के पप्पूओं को कब जगाएगी जो मतदान के लिए सारी पूर्व तैयारी करते हैं? ...24 साल बाद मिली 'काजू' को जमीन
आखिरकार उड़ीसा के कोरापुट जिले में पिछले 24 सालों से चला आ रहा आदिवासियों का आंदोलन थम गया है। आदिवासियों का यह आंदोलन काजू फल की खेती को लेकर था जिसमें वे फसल उगाने के लिए जमीन पर अधिकारों की मांग कर रहे थे। देश में उड़ीसा काजू के उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। सबसे पहले इस आंदोलन की पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है। उड़ीसा में 20 जिले ऐसे हैं जहां काजू की खेती बहुतायत में होती है। आदिवासी और दलित बहुल इस राज्य में काजू के उत्पादन पर इन दोनों वर्गों का अधिपत्य रहा है, लेकिन खेती-गृहस्ती का इनका सिलसिला बहुत दिनों तक चल नहीं पाया।...मानवतावादी मकसद के लिए मैदान में
सुधीर गंडोत्रा के कांधे पर लटका झोला उनके प्रचार अभियान का ब्रह्मास्त्र है. उनके पास न तो अखबार और टीवी में भारी भरकम विज्ञापन देने के लिए धनबल है और न ही मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए बाहुबल. फिर भी वे पंद्रहवीं लोकसभा के लिए नई दिल्ली से मैदान में हैं. जहां जाते हैं झोले से निकालकर एक आठ पेज का मेमोरन्डम थमा देते हैं जिसमें उनकी पार्टी की अपील भी है और यह सीख भी कि अच्छे लोग हमारी संसद में क्यों पहुंचने चाहिए. हमने जानना चाहा कि एक लाईन में आपको बताना हो कि आप चुनाव क्यों लड़ रहे हैं तो क्या कहेंगे?...बाघ न बचाने की राजनीति
पन्ना में 22 बाघ हैं, पन्ना में सिर्फ दो बाघ हैं. दोनों ही बातें सही हैं. लेकिन यह कैसे मुमकिन है? देहरादून स्थित वाईल्डलाईफ इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया की हालिया रिपोर्ट में यह तथ्य स्वीकार किया गया है कि पन्ना में बाघों की संख्या में तेजी से कमी आई है. लेकिन वहीं मध्यप्रदेश सरकार इसे मानने को तैयार नहीं है. वह अब भी पन्ना में 22 बाघ होनें की जिद पर अडा़ हुआ है. अब एक और बानगी देखिए. एक ट्रेवेल वेबसाईट घुमक्कड़.कॉम पर कुमकुम दासगुप्ता, पन्ना के बारे में अपना संस्मरण लिखने के दौरान यह बताना नहीं भूलते, “मुझे वहां कोई बाघ नजर नहीं आया और न ही मुझे यह लगा कि वहां कोई बाघ हो सकता है. तो आखिर क्या वजह है कि सरकार इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर रही है?”...हिंसक अमेरिकी पूंजीवाद का 'स्वाईन फ्लू'
स्वाईन फ्लू के संक्रमण की शुरूआत मैक्सिको के ला ग्लोरिया समुदाय से हुई है. इस समुदाय के लोगों ने डाक्टरों को एक दो महीने पहले ही सांस में तकलीफ की शिकायत की थी. वहां के निवासियों को शुरू में लगा कि संभवतः ऐसा प्रदूषण के कारण हो रहा है. लेकिन उन्हें इस बात की आशंका थी कि इस प्रदूषण की समस्या बगल में चल रहे सूअर फार्म के कारण है. यह फार्म अमेरिका की एक कंपनी स्मिथफील्ड फूड्स के साथ एक ज्वाईंट वेंचर है. ला ग्लोरिया के लोगों ने इस सूअर फार्म के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और धरने दिये ताकि स्वास्थ्य में आ रही इस गड़बड़ी को रोकने के लिए सरकार कोई कार्रवाई करे. लेकिन कार्रवाई करने की बजाय सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ ही कार्रवाई कर दी. प्रदर्शन कर रहे नेताओं को गोली मार देने की धमकी दी गयी....इस देश में भाजपा के लिए संजीवनी हैं मुसलमान
1984 के लोकसभा में चुनाव भाजपा केवल दो सीटें जीतकर मर चुकी थी। केवल अन्तिम संस्कार शेष था। लेकिन राजीव गांधी की अपरिपक्व मंडली ने हिन्दुओं को खुश करने के लिए फरवरी 1986 में बाबरी मस्जिद पर लगे ताले को खुलवाकर बोतल में बंद जिन्न को बाहर निकाल दिया। ताला खुलने के बाद आखिरी सांसें गिन रही भाजपा को जैसे 'संजीवनी' मिल गयी। लालकृष्ण आडवाणी सहित कल्याण सिंह, साध्वी रितम्भरा, उमा भारती, अशोक सिंहल, विनय कटियार, प्रवीण तोगड़िया और न जाने कितने लोगों ने राम मंदिर को ही अपना एकमात्र मुद्दा बना लिया। गली-गली रामसेवकों की फौजें तैयार हो गयीं। नफरत,घृणा और कत्लोगारद का ऐसा माहौल तैयार किया गया कि हिन्दुस्तान का धर्मनिरपेक्ष ढांचा चरमरा कर रह गया।...Author info
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