अनुपम मिश्र
कोपेनहेगन के कोपभाजन का शिकार कौन होगा?
कोपेनहेगन में दुनियाभर के लगभग सभी देश इकट्ठा हो रहे हैं. हमारे अखबार हमें बता रहे हैं कि कोपेनहेगन में कुछ देशों को कोपभाजन का शिकार होना पड़ सकता है. अखबारों की सदिच्छा और इच्छा अपनी जगह लेकिन कोपेनहेगन में वे देश शेष देशों के कोपभाजन बनेंगे जिन्हें सचमुच बनना चाहिए, ऐसा लगता नहीं है. दुनिया में पर्यावरण के पहले के सम्मेलनों में अगर कभी कुछ ऐसा हुआ होता तो हमें उम्मीद भी बंधती कि दादा देश कोपभाजन का शिकार होंगे और दुनिया का दर्शन बदल जाएगा.
अकाल अकेले नहीं आता है
हमारे यहॉं एक कहावत है, `आग लगने पर कुऑं खोदना´। कई बार आग लगी होगी और कई बार कुएं खोदे गए होंगे, तब अनुभवों की मथानी से मथकर ही ऐसी कहावतें मक्खन की तरह ऊपर आई होंगी। लेकिन कहावतों को लोग या नेतृत्व जल्दी भूल जाते हैं। मानसून अपने रहे-सहे बादल समेटकर लौट चुका है। यह साफ हो चुका है कि गुजरात जैसे अपवाद को छोड़ दें तो इस बार पूरे देश में औसत से बहुत कम पानी गिरा है।...मरूभूमि का भाग्यवान समाज
समाज कैसे चलता है, वह अपने सारे सदस्यों को कैसे संगठित करता है, कैसे उनका शिक्षण प्रशिक्षण करता है, उन सबका प्रयोग वह कैसी कुशलता से करता है, उस समाज के एक सदस्य के रूप में मैं भी पिछले तीस साल से देख समझ रहा हूं. वह कितनी लंबी योजना बनाकर काम करता है उसे भी देखने समझने का मौका मिला है. समाज का भूतकाल, वर्तमान और भविष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी जुड़ता रहे, सधता रहे, संभला रहे और छीजने के बदले संवरता रहे इस सब का विराट दर्शन मुझे विशाल पसरे रेगिस्तान में, मरूप्रदेश में मिला और आज भी मिलता चला जा रहा है....बाढ़ के साथ बढ़ने की कला
समाज ने पीढ़ियों से, शताब्दियों से यहां फिसलगुड्डी की तरह फुर्ती से उतरनेवाली नदियों के साथ जीवन जीने की कला सीखी थी, बाढ़ के साथ बढ़ने की कला सीखी थी. उसने और उसकी फसलों ने बाढ़ में डूबने के बदले तैरने की कला सीखी थी. वह कला आज धीरे-धीरे मिटती जा रही है. अब उत्तर बिहार लोग मानते हैं कि इन नदियों ने उन्हें दुख के अलावा कुछ नहीं दिया है. ...बीज नहीं पौरूष भी चला जाएगा
बीजों के भीमकाय सौदे को समझने के लिए हमें पहले बीज के रहस्य को समझना होगा. धरती के गिने जाने लायक कोई तीन लाख पौधों में से...पर्यावरण सुरक्षा का भोग-विलास
दुनिया को पर्यावरण की चिंता करनेवाली 24 घण्टे की बुद्धि नहीं चाहिए बल्कि चौबीसों घण्टे पर्यावरण के प्रति सजग रहनेवाला मानस चाहिए....शोध से ज्यादा श्रद्धा की जरूरत
बहुत कम लोगों को पता होगा कि भारत ही नहीं एशिया का पहला इंजीनियरिंग कालेज कहां बना था? आप जानते हैं वह कब और क्यों बना?...Author info
