अनुपम मिश्र
बाढ़ के साथ बढ़ने की कला
समाज ने पीढ़ियों से, शताब्दियों से यहां फिसलगुड्डी की तरह फुर्ती से उतरनेवाली नदियों के साथ जीवन जीने की कला सीखी थी, बाढ़ के साथ बढ़ने की कला सीखी थी. उसने और उसकी फसलों ने बाढ़ में डूबने के बदले तैरने की कला सीखी थी. वह कला आज धीरे-धीरे मिटती जा रही है. अब उत्तर बिहार लोग मानते हैं कि इन नदियों ने उन्हें दुख के अलावा कुछ नहीं दिया है.
Author info
