अनुराग पुनेठा
कारगिल विजय के दौरान समझौते और लीपीपोती के निशान
हम भले ही इस इलाके में 2009 में आये हैं लेकिन यह इलाका मानों दस साल पहले 1999 में ही खड़ा है. समय ने 1999 से आगे शायद एक भी कदम आगे नहीं बढ़ाया है. हम वहां पहुंचे तो सेना ने हम हर वो मुकाम दिखाया जिसने 1999 में इतिहास बनाया था. दस साल बाद ही सही एक बाद देश और मीडिया को करगिल और द्रास याद आये हैं. इधर मैदान में जवान शहीदों की जैसी गति और दुर्गति है उसकी बात न भी करें तो द्रास और करगिल में भी हालात बहुत अच्छे नहीं है. दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा स्थान होने के बावजूद शौर्य और पराक्रम की गरमाहट में देश की सबसे जटिल सीमा का मुश्तैदी से सुरक्षा कर रहे हैं. लेकिन एक बहुत जटिल सवाल है. क्या करगिल की लड़ाई हमने सचमुच जीत ली है?
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