आशीष कुमार
सहज उकेरी पीर घनेरी
क्षमा कुलश्रेष्ठ जब अठारह साल की थी तो उन्होंने एक कविता लिखी थी. ‘बन के तारा झिलमिलाऊं, चंाद मेरे पास हो, ऐसा कुछ मैं कर दिखाऊं, सबको मुझपर नाज हो, मानती हूं मेरा जीवन, गहरी काली रात है, दिन में तारों का नजारा, एक असंभव बात है।’ आज क्षमा की उम्र होगी यही कोई तीस साल के आसपास, लेकिन जब आप उनसे मिलेंगे, आपको कोई जब तक उनकी उम्र का हिसाब ना बताए, आप उनकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकते।
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