बालेन्दु दाधीच
गिलानी की गुगली और हिन्दुस्तान की गफलत
अभी-अभी हुर्रियत कांफ्रेंस के गरमपंथी धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी अपने विस्फोटक सेमीनार के जरिए दिल्ली और देश में अच्छा-खासा आक्रोश और विवाद पैदा करके गए हैं। अपने अलगाववादी नजरिए पर टस से मस न होने के लिए कुख्यात गिलानी ने दिल्ली में हुए इस कार्यक्रम में न सिर्फ कश्मीर की ‘आजादी‘ की पारंपरिक मांग दोहराईं बल्कि एक कदम आगे बढ़कर ‘स्वतंत्र कश्मीर‘ बनने के बाद की ‘नीतियों‘ का खाका भी पेश कर गए। ‘कश्मीर की आजादी ही एकमात्र विकल्प‘ नामक विषय के इर्द-गिर्द केंद्रित सेमीनार में उन्होंने देशद्रोह के दायरे में आने वाली दर्जनों टिप्पणियां कीं और ‘अभिव्यक्ति की आजादी‘ का फायदा उठाकर आराम से कश्मीर की ओर निकल लिए।
अयोध्या और अदालत: जीत गया इंडिया
अयोध्या में 2.7 एकड़ भूमि के मालिकाने के विवाद का फैसला किसके लिए अधिक अनुकूल रहा और किसके लिए कम, यह अकादमिक और कानूनी, धार्मिक और सियासी चर्चाओं का विषय है। अलबत्ता, पिछले एक हफ्ते के घटनाक्रम में यदि कोई विजेता उभरा है, तो वह है- भारत। यह देश, उसके हिंदू और मुस्लिम नागरिक, दोनों संप्रदायों के धर्माचार्य, राजनेता और यहां की सरकारें भी। क्या कोई यकीन करेगा कि यह वही भारत है जहां इसी मुद्दे पर कितने ही दंगे हो चुके हैं, सैंकड़ों बेकसूर जानें जा चुकी हैं और सरकारें बदल चुकी हैं।...नेहरू से नौ कदम आगे निकलने की चाह
आम तौर पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के बारे में टिप्पणी करने से बचने वाली कांग्रेस को उनका यह बयान रास नहीं आया कि मौजूदा सरकार सबसे ‘एकजुट‘ सरकारों में से एक है- यहां तक कि पंडित नेहरू के नेतृत्व वाली पहली सरकार से भी। डॉ. सिंह के इस बयान ने सबको चौंकाया क्योंकि कांग्रेस के भीतर से कोई नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू, स्व. इंदिरा गांधी या स्व. राजीव गांधी के बारे में अप्रत्यक्ष टिप्पणी भी करे तो वह एक बड़े जोखिम का काम है। लेकिन डॉ. सिंह बार-बार सिद्ध कर चुके हैं कि वे राजनीति के गुर आजमाने में निष्णात किसी खुर्राट नेता की तरह नहीं हैं। उन्होंने जो कहा वह उनकी सीधे-सादे और बेबाक इंसान की छवि के अनुरूप ही था।...चीनी आर्थिक चमत्कार के पैबंद
चीन से आ रही मजदूरों के आत्महत्या करने की खबरों से चीनी आर्थिक चमत्कार के ‘रहस्य‘ खुलने लगे हैं। क्या इस साम्यवादी राष्ट्र के विकास की बुनियाद निर्धन मजदूरों के शोषण पर टिकी है? क्या सस्ते उत्पादन के पीछे चीन में मजदूरों का अंतहीन शोषण है जो आत्महत्या के रूप में सामने आ रहा है?...क्या धरती एलियंस के निशाने पर है?
ब्रीफ हिस्टरी ऑफ टाइम के विख्यात लेखक और एस्ट्रो-फिजिक्स से जुड़े विषयों पर विश्व के सर्वाधिक प्रामाणिक और अधिकार-संपन्न वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, विश्लेषक और चिंतक स्टीफन हाकिंग की बातों को गंभीरता से न लेने का कोई कारण नहीं है। उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय को झकझोर दिया है। उनके बयान ने वैश्विक स्तर पर एक आशंका भरी बहस को भी जन्म दिया है- क्या धरती एलियंस के निशाने पर आ सकती है?...3जी की सफलता बड़ी या 2जी का घोटाला?
केंद्र सरकार और दूरसंचार मंत्री ए राजा थ्री जी स्पेक्ट्रम की नीलामी से 67,710 करोड़ रुपए की भारी-भरकम रकम जुटाने को लेकर आल्हादित हैं। माना कि 3 जी स्पेक्ट्रम की नीलामी प्रक्रिया आशातीत ढंग से सफल रही, माना कि इससे मंदी प्रभावित देश के वित्तीय घाटे को दूर करने में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी और माना कि अंतिम राशि ने खुद सिद्ध कर दिया है कि सारी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और साफ-सुथरी थी। लेकिन इस सफलता ने 2008 में 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में हुए गड़बड़-घोटाले को भी पूरी तरह अनावृत्त कर दिया है।...कस्टमर केयर को कॉल पर कमाई का सवाल
भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी ट्राई ने पिछले दिनों दूरसंचार कंपनियों की उपभोक्ता सेवाओं (कस्टमर केयर) से पूछताछ के लिए किए जाने वाले टेलीफोन कॉल्स पर शुल्क लगाने की अनुमति दी थी। देखते ही देखते एयरटेल, आइडिया, वोडाफोन, एस्सार, टाटा डोकोमो, रिलायंस और अन्य दूरसंचार सेवा प्रदाताओं ने ऐसी कॉलों के लिए पैसे लेना शुरू कर दिया है। ...वार्ता में भारत की उदारता का अनादर
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने पुणे में हुए विस्फोट के बावजूद, भाजपा और अन्य दलों के विरोध के बावजूद पाकिस्तान के साथ बातचीत आगे बढ़ाने का फैसला किया था। उन्होंने अपनी राजनैतिक साख को दांव पर लगा दिया था। लेकिन बातचीत का नतीजा क्या निकला? कहीं ऐसा तो नहीं है कि भारत की उदारता का पाकिस्तान अनावश्यक अनादर कर रहा है?...कोपेनहेगन में क्या हुआ?...कुछ खास नहीं!
भले ही विकासशील देशों और कई पश्चिमी देशों की मांग के विपरीत इसमें कार्बन उत्सर्जन घटाने की किसी विस्तृत समय-सारिणी की व्यवस्था नहीं है इसकी बदौलत कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन का समापन उस किस्म की नाकामी में नहीं हुआ जिसकी आशंका थी। वहां से लौटते नेताओं के हाथ में जो दस्तावेज है वह भविष्य का प्रतीकात्मक और अबाध्यकारी दस्तावेज है। ...हिन्दी के विकास की बाधा दौड़
जिस तरह देश के छोटे से छोटे गांव कस्बे में अंग्रेजी सिखाने वाले विद्यालय खुल रहे हैं, जिस तरह आम भारतीय के मन में अपने बच्चों को अंग्रेजी की शिक्षा देने की ललक पैदा हो रही है और जिस तरह अंग्रेजी में प्रवीण गिने-चुने लोगों के लिए रोजगार के अवसर निरंतर बेहतर होते चले जा रहे हैं उसमें एक किस्म का ट्रेंड दिखाई देता है। लेकिन हिंदी से अंग्रेजी की ओर जाने का यह ट्रेंड क्या इतना बड़ा और प्रभावी है कि वह हमारी राजभाषा के लिए खतरा बन जाए?...Author info
