देवेन्द् शर्मा
सूख गये संघर्ष के आंसू
नर्मदा पर बांधों की श्रृंखला की शुरुआत को 25 साल बीत गए हैं। इसके कारण 1.5 लाख से अधिक विस्थापित (जिनमें अधिसंख्य आदिवासी हैं) अब भी पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं। अब तक की तमाम सरकारों ने इन लोगों के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया है। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय स्वतंत्र पीपुल्स ट्रिब्युनल के सदस्य के तौर पर जब मैंने मध्य प्रदेश के निमद क्षेत्र का दौरा किया तो इन गरीब और असहाय लोगों को देखकर सिर घूम गया था। 25 साल से वे अहिंसक संघर्ष कर रहे हैं और फिर भी उन्हें न्याय नहीं मिल पाया है।
जीएम फसलों पर जोरजबर्दस्ती
इसे आप बायोटेक्नालाजी इमरजेन्सी मान सकते हैं. सरकार अघोषित रूप से ऐसा ही काम कर रही है कि अगर बायोटेक्नालाजी के विरोध में कोई भी स्वर उठता है तो उसे निर्ममता से कुचल दिया जाए. ऐसा लगता है कि आपातकाल का भूत फिर से जाग गया है. अगर कुख्यात इंदिरा प्रायोजित इमरजंसी में सवाल करने पर किसी भी व्यक्ति को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जा सकता था तो आज भी बायोटेक्नॉलाजी के सवाल पर हालात वैसे ही हैं. ...हर रोज 26/11 लेकिन सुननेवाला कोई नहीं
आप पिछले कुछ दिनों में मीडिया का कवरेज देखकर इतने आश्वस्त तो जरूर हो गये होंगे मीडिया पूरी तरह से चिंतित है कि हमारे आपके सामने अब दूसरा 26/11 न हो. हमारा इलेक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया हर पहलू से लूप होल तलाश रहा है और हमें जानकारी दे रहा है कि 26/11 जैसे संभावित हमलों से सुरक्षित बचे रहने के लिए क्या क्या उपाय किये जा रहे हैं और क्या क्या उपाय किये जाने चाहिए. निश्चित रूप से साल भर पहले मुंबई में जो आतंकी हमला हुआ था वह भयावह हादसा था और भविष्य में ऐसे भयावह हादसे न हो इसकी पुरजोर व्यवस्था करने की जरूरत भी है. लेकिन.......बर्फ की चादर पर विकास की कालिख
पर्यावरण और वन मंत्री जयराम रमेश द्वारा जारी की गई रिपोर्ट हिमालयन ग्लेशियर्स के अनुसार इस बात का कोई पुख्ता साक्ष्य नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय में ग्लेशियर पिघल रहे हैं। इस अध्ययन की कोई जिम्मेदारी न लेते हुए जयराम रमेश ने बड़ी तत्परता से इसमें जोड़ा कि इसका मतलब इस विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाना था। मुझे इस चर्चा को आगे बढ़ाने में कोई तुक नजर नहीं आता, जबकि इंटरनेशनल पैनल आन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) पहले ही स्वीकार कर चुकी है कि ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।...हमारे सूखे के लिए हम ही जिम्मेदार
आने वाले 15 वर्र्षो में भारत के खाद्यान्न का कटोरा अर्थात पंजाब और हरियाणा सूखाग्रस्त हो जाएंगे। वहां की धरती में सिंचाई के लिए पानी नहीं रह जाएगा। केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड की 2007 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार 2025 में सिंचाई के लिए भूमिगत जल उपलब्धता ऋणात्मक हो जाएगी। उदाहरण के लिए पंजाब में जितना जल जमीन में समाता है उससे 45 प्रतिशत अधिक जल खींच लिया जाता है।...मजबूत अर्थव्यवस्था की कमजोर कड़ी
ऋण के बोझ तले किसानों को राहत पहुंचाने के नाम पर लिया गया राजनीतिक निर्णय वास्तव में बैंकिंग व्यवस्था की सेहत सुधारने के लिए उठाया गया कदम था। अगर सरकार ऋण माफी नहीं देती तो बैंकों के सामने तरलता का भयावह संकट ख़डा हो जाता। किसान ऋण चुकाने की हालत में नहीं थे, इसलिए मजबूरन इन बैंकों में भारी संख्या में नॉन परफार्मिंग एसेट का ढेर लग जाता, जिससे उनके सामने तरलता का संकट ख़डा हो जाता और वे 71 हजार करोड़ रुपये से वंचित रह जाते। दूसरे शब्दों में, ऋण माफी बैंकों के लिए शुरूआती आंशिक राहत थी।...Author info
