नीरज जोशी
गैरसैंण छोड़कर देहरादून की दुहाई
उत्तराखण्ड को बने नौ साल हो गये लेकिन राज्य की राजधानी को लेकर अभी भी असमंजस बरकरार है. खबर है कि दीक्षित आयोग ने भी सुझाव दिया है कि राज्य की राजधानी का निर्धारण करते वक्त भौगोलिक परिस्थितियों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। साफ है, दीक्षित आयोग भी एक तरह से देहरादून को ही राजधानी बनाये रखने का पक्षधर है। यह हास्यास्पद हो सकता है लेकिन सच्चाई यही है कि गैरसैंण को राजधानी बनाने का विरोध करनेवाले वे लोग हैं जो अलग राज्य का ही समर्थन नहीं करते थे। गैरसैंण को राजधानी बनाने के पीछे तर्क यह था कि यह उत्तराखण्ड के गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मण्डलों के मध्य में पड़ता है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से गढ़वाल और कुमाऊं से समान दूरी के तर्क पर दिल्ली से नजदीकी का तर्क राजधानी बनाने के सवाल पर हावी हो गया है।
ग्वालियर बस अडडे से सुनें एमपी की कहानी
शहर के बीचोंबीच ग्वालियर का बस अड्डा, जिले के अंदर एवं अन्य जिलों और राज्यों में जाने वाले यात्रियों की भारी भीड़ करीब झांसी ग्वालियार रोड के उपर ही खड़ी है। ऐसा इसलिए कि खस्ताहाल बस अडडे के बाहर मध्यप्रदेश परिवहन निगम जरूर लिखा है अंदर जाकर गाड़ियों को खड़ी करनी के लिए काफी बड़ा फील्ड भी है लेकिन दोपहर से लेकर रात नौ बजे तक उस फील्ड में एक भी बस खड़ी नही दिखती। स्थानीय लोग कहते हैं यह हाल पिछले तीन दिन से है। बसें तो जिस दिन से चुनाव की घोषणा हुई उसी दिन से सड़कों पर कम दिखाई देने लगी लेकिन जब से मतदान के दिन नजदीक आ रहे हैं बसें सड़कों से पूरी तरह गायब कर दी गई हैं। ...पहाड़ से बेकार बहता पानी और जवानी
अपने पहले लेख में नीरज जोशी ने पहाड़ से पलायन की मार्मिक बात उठायी थी. इस दूसरी कड़ी में वे उन कारणों को जानने की कोशिश कर रहे हैं जो पहाड़ से पलायन के जिम्मेदार हैं....पहाड़ के एक गांव में मुट्ठीभर लोग
पहाड़ों से पलायन के 60 वर्षो का लेखा जोखा देखें तो समझ में आता है कि इन 60 वर्षो में अकेले उत्तराखण्ड की एक करोड़ से अधिक आबादी पहाड़ छोड़कर बाहर जा चुकी है, जो बच गये वे 85 लाख हैं....Author info
