प्रभाष जोशी
उस दिन मैं भी नेक्सन की तरह रोया था
अपने भी देश-समाज में गोरे रंग की बड़ी महिमा है. लेकिन सोलह गुण संपन्न कृष्ण को सांवरा बनाकर हमने गौर-वर्ण को फीका कर दिया. अपने यहां भी भेदभाव और ऊंच-नीच बहुत है. लेकिन किसी एक जाति के सभी लोग इसलिए भेदभाव के शिकार नहीं होते कि उनकी चमड़ी काली होती है. अपने यहां भेदभाव की कई परतें हैं. इसलिए रंगभेद उतना निंदनीय और वांछनीय नहीं होता जितना पश्चिम में होता है. ऐसे में काले ओबामा का ह्वाईट हाउस में बैठना अपने को उतना उल्लेखनीय नहीं लगता जितना अमेरिका के श्वेत-अश्वेत लोगों को लगता होगा.
धन की लक्ष्मी या पूंजी की अप्सरा?
कनाट प्लेस और लक्ष्मीनगर दोनों ही अर्थव्यवस्था के बम-बम होने से पहले के बाजार हैं. खुले बाजार की अर्थव्यवस्था आने और भारत के अमेरिका से जुड़ने से पहले भी ये बाजार थे. धूमधाम से दिवाली मनाते थे. लेकिन देखते ही देखते कनाट प्लेस का अमेरिकीकरण हुआ. बहुमंजिला इमारते बनीं. अंतरराष्ट्रीय ब्राण्डों के आउटलेट खुले. पालिका बाजार बना, जिसमें सस्ती और नकली चीजों की भरमार हो गयी....Author info
