प्रेम शुक्ल
एक सभ्य सनातन देश में वासना का भोग
पुरुष प्रधान भारतीय संस्कृति में नारियों के लिए आदर सम्मान सहज है. इसके लिए कोई आडंबर नहीं होता. भारतीय समाज की शिक्षा दीक्षा में नारी के प्रति सम्मान का पाठ पग पग पर है. लेकिन जरा आधुनिक होते भारत को देखिए. जैसे जैसे यह देश आधुनिक से उत्तर आधुनिक होता जा रहा है, निरा वासना भोगी होता जा रहा है. राठौर से लेकर एनडी तिवारी तक इस भोगकाण्ड में हर खासो आम शामिल दिखाई देता है.
गढ़ तो चढ़ गये गड़करी लेकिन...
गडकरी निश्चित तौर पर महाराष्ट्र के लोक निर्माण विभाग में क्रांतिकारी परिवर्तन करने में कामयाब हुए थे। उन्होंने विदर्भ में भाजपा के विस्तार की कमान भी संभाले रखी। लेकिन पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल में वे महाराष्ट्र में भाजपा को पुनर्संगठित करने में कामयाब नहीं हुए। महाराष्ट्र में भाजपा को सफलता दिलाने में उन्हें किसी प्रकार की बाधा नहीं थी। क्या राष्ट्रीय स्तर पर वही गडकरी भाजपा को नए सिरे से सुसंगठित करने में कामयाब हो पाएंगे?...अलग अस्मिता या सत्ता का स्वार्थ?
तेलंगाना की अस्मिता के समक्ष केंद्र सरकार के समझौते ने कई प्रांतीय अस्मिताओं को हवा देने का काम किया है। असम में बोडोलैंड, पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड, महाराष्ट्र में विदर्भ और उत्तर प्रदेश को बांटकर तीन नए राज्यों के पुनर्गठन की चर्चा/मांगें प्रारंभ हो गई हैं। बीच के दिनों में मैंने ‘हिंदी-गरीबों की भाषा’ शीर्षक से लेख लिखा था। उसमें भाषाई अस्मिता का जिक्र किया था तो एक सुधी पाठक ने प्रश्न पूछा था कि आखिर ‘अस्मिता’ शब्द का अर्थ क्या है?...राजीव गांधी होते तो बनवाते राम मंदिर!
देर से ही सही कांग्रेस ने यह तो माना कि राम मंदिर मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव सटीक राजनीतिक फैसले लेने में चूक गये. कम से कम कांग्रेस ने यह तो मान लिया कि उस पूरे मामले में नरसिंहराव बिल्कुल बरी नहीं किये जा सकते. लेकिन कांग्रेस की यह स्वीकारोक्ति आधी अधूरी है. हकीकत में राम मंदिर को लेकर भाजपा और हिन्दू दलों से अधिक राजीव गांधी उत्साहित थे. ...बाबरी को बरी करने का वक्त
17 साल बाद जस्टिस लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट के आलोक में बाबरी के भूत को जगाने का प्रयास चल रहा है. 6 दिसंबर 1992 के बाद कई वर्षों तक इस्लामाबाद के अलंबरदारों ने बाबरी की याद में अजान दिया था. धीरे धीरे उनकी अजान बंद पड़ गयी थी. बाबरी ढांचे के विध्वंस को शहादत का दर्जा देनेवाले धीरे धीरे आतंकवाद की ऐसी विषबेल सींच गये जिसने अंतत: अजान देनेवालों को ही मारना प्रारंभ कर दिया....Author info
