संजय तिवारी
मत्था टेकने की मानसिकता
वैसे तो किशनलाल की गांधी से अधिक श्रद्धा अपने कारोबार पर है और ओबामा से अधिक डर अपनी पत्नी का है. लेकिन आज न तो उनका कारोबार आड़े आया और न ही पत्नी. सुबह नौ पैंतीस पर वे राजघाट जा रहे थे. पूछने पर बोल पड़े मत्था टेकने जा रहे हैं. गांधी की समाधि के प्रति किशनलाल की इतनी अगाध श्रद्धा कि उन्होंने 'मत्था टेकने' की ऊंचाई दे दी. लेकिन वहां तो आज 10.20 पर बराक ओबामा आ रहे हैं. वहां जाने नहीं देंगे. उन्होंने कहा कि जब "वो" चले जाएंगे तब आधे घण्टे बाद राजघाट खोल देंगे उसके बाद सबसे पहले हम मत्था टेकेंगे.
'गांधीवादी' ओबामा पर भारी अमेरिकी आर्थिक लाचारी
अगर आपने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के मणिभवन यात्रा की फोटो देखी हो तो आपको उस फोटो में बराक ओबामा और पत्नी मिशेल ओबामा के चित्र में गांधी की पोती से हाथ मिलाते वक्त जो श्रद्धा दिख रही है उसमें अमेरिकी बनावट की मिलावट कहीं से नहीं है. गांधी के प्रति ओबामा की श्रद्धा किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा नहीं बल्कि उस विचार के प्रति है जिसे बीसवीं सदी में अंग्रेजों से लड़ते हुए गांधी ने पुन: परिभाषित किया था. ...जिसके दर पर फाइल पहुंची, उसने रात गुजार ली
सपनों के शहर मुंबई के मुंह पर ऐसी कालिख शायद ही कभी लगी हो. मुंबई के कोलाबा स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी की जैसी कहानी सामने आ रही है वह दिल दहला देनेवाली है. जिस शहर में इंच-सेन्टीमीटर में भी रहने की जगह का हिसाब रखा जाता हो वहां एक 31 मंजिला बिल्डिंग अवैध जमीन पर, अवैध तरीके से खड़ी कर दी गयी. भवन को खड़ा करने का यह भ्रष्टाचार उतना संगीन नहीं है जितना संगीन है यह समाचार कि यह भवन 1999 में कारगिल में शहीद जवानों की विधवाओं को आवासीय सुविधा देने के लिए तैयार किया जानेवाला था. कोलाबा के पास जिस स्थान पर यह भवन सीना तान खड़ा हुआ है उसकी हकीकत इतनी गंदी है कि किसी भी स्वाभिमानी नागरिक का सिर शर्म से झुक जाएगा. ...ठाकरे परिवार में कौन बनेगा सरकार?
महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले विधानसभा चुनाव में जो नहीं हुआ वह एक महानगरपालिका के चुनाव में हो रहा है. शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे अपने ही भतीजे से उलझ गये हैं. कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका चुनाव में जैसे ही राज ठाकरे ने बाल ठाकरे पर छींटाकसी की, बाल ठाकरे ने पलटकर ऐसा वार किया कि महाराष्ट्र की राजनीति गर्म हो गयी. चुप रहने की बजाय राज ठाकरे ने फिर जवाब दिया और आपसी ठसक परिवार की चौखट से निकलकर राजनीतिक के अखाड़े की जंग बन गयी. ...अजमेर विस्फोट का मारा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बेचारा
2007 में हुए अजमेर दरगाह विस्फोट में इंन्द्रेश कुमार का नाम आया है या फिर लाया गया यह तो अलग बहस का विषय है लेकिन मीडिया ने पिछले चौबीस घण्टे से इसे हाईप दिया है उसकी हकीकत क्या है? आखिर ऐसा क्या हुआ कि पिछले चौबीस घण्टे में मीडिया को अचानक संघ सबसे बड़ा आतंकी संगठन नजर आने लगा और चार्जशीट में सिर्फ नाम होने के नाम पर ही इन्द्रेश कुमार को आरोपी साबित करने में लग गया? क्या अजमेर शरीफ विस्फोट की जांच के बहाने संघ को ही उड़ाने की साजिश रची गयी है?...प्रेस क्लब में न करना प्रेस कांफ्रेस
जो प्रेस की कार्यप्रणाली को नहीं जानते समझते उनके लिए प्रेस क्लब बहुत पवित्र जगह होती है. लेकिन पत्रकारों के लिए प्रेस क्लब सिवाय दारूबाजी और टाईपास राजनीति के अलावा किसी काम का नहीं होता. देश भर के प्रेस क्लबों का लगभग यही हाल है. ऐसी न जाने कितनी प्रेस कांफ्रेस देखी है जिसमें सवाल पूछनेवालों की संख्या तो पर्याप्त होती है लेकिन अगले दिन अखबारों में कुछ नहीं छपता. ...अब शुरू हुआ असली खेल
कॉमनवेल्थ खेलों के लिए लगाये गये टेन्ट, तंबू कनात उखड़ गये हैं. लेकिन असली खेल उसके बाद शुरू हुआ है. भारतीय जनता पार्टी बनाम कांग्रेस के इस खेल में राजनीति का स्वर्ण पदक कौन हासिल करेगा यह कहना मुश्किल है लेकिन जो खुलासे होंगे वे यह साबित कर देंगे कि खेल भारतीय राजनीति में पर्दे के पीछे असली समाजवाद कायम है. अगर भाजपा की सरकार में कांग्रेसी सुरेश कलमाड़ी कामनवेल्थ खेलों के लिए अगुआ बने रहते हैं तो कांग्रेस की सरकार में आठ सौ करोड़ का ठेका भाजपा के हितैषी सुधांशु मित्तल को मिल जाता है. ...परिवार के लिए सत्ता का संकल्प
पिछले दो तीन दिनों से मुंबई से प्रकाशित होनेवाले अखबारों के लिए एक अनिवार्य खबर छप रही है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे इस साल दशहरा रैली को संबोधित करेंगे. मुंबई के अखबारों की यह उत्सुकता इसलिए भी है क्योंकि पिछले साल खराब स्वास्थ्य के कारण बाल ठाकरे उस शिवाजी मैदान में दशहरे के दिन नहीं आ पाये थे जहां उनके पिता प्रबोधनकार ठाकरे ने उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति को सौंपा था. ...अहा! क्या कॉमन रिपोर्टिंग है
कॉमनवेल्थ खेलों का उद्घाटन भी हो गया और आज अखबारों ने उस उद्घाटन की जमकर रिपोर्टिंग भी कर दी. दिल्ली से प्रकाशित होने वाले सभी अखबार कॉमनवेल्थ की चकाचौंध भरे उद्घाटन से अभिभूत हैं. कुछ अखबार तो हेडिंग लगाना ही भूल गये है. सिर्फ इतना लिख दिया है- अद्भुद....संघी सांप और शेष नाग
अभी कोई चार पांच दिन पहले आशीष कुमार अंशू का फोन आया कि अगर मैं उन्हें ब्लागिंग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चार पांच सौ शब्द में कुछ लिखकर दे दूं तो वे अपनी पत्रिका में उसे छापना चाहते हैं. मैं नहीं लिख पाया. उनकी पत्रिका जानी थी, इसलिए अब वे शायद इसे छापेंगे भी नहीं लेकिन जिन दिनों वे मुझसे लिखने के लिए कह रहे थे विस्फोट पर ही बड़ा कष्टदायी प्रसंग चल रहा था. यह प्रसंग ही ब्लागिंग या इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे सटीक उदाहरण है. ...Author info
