संजय तिवारी
मीडिया का नया मंत्रः आतंकवाद
ढहते किलों के बीच इलेक्ट्रानिक मीडिया को नया मंत्र मिल गया है. वह मंत्र है- आतंकवाद. आतंकवाद से इस लड़ाई में मीडिया सीधे जनता के साथ मिलकर मोर्चेबंदी कर रहा है. यह मोर्चेबंदी अनायास नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि अचानक ही इलेक्ट्रानिक मीिडया नैतिक रूप से बहुत जिम्मेदार हो गया है. कारण दूसरे हैं जो कि उसकी व्यावसायिक मजबूरियो से जोड़ते हैं. वैश्विक मंदी के इस दौर में आतंकवाद ही एक ऐसा मंत्र है जो ज्यादा देर तक दर्शकों को बुद्धूबक्से से जोड़कर रख सकता है. इलेक्ट्रानिक मीडिया इस मौके को किसी कीमत पर नहीं चूकना चाहता.
अमीरी पर आतंकी हमले के बाद
हर बार आतंकी हमले के बाद भारत अब तक रस्मी प्रतिक्रिया ही देता आया है, सिर्फ दो अवसरों को छोड़कर. एक तब जब संसद पर आतंकी हमला हुआ था और एक अब जब मुंबई के मंहगे होटल और मंहगे लोगों को निशाना बनाया गया है. "इनफ इज इनफ" का मुहावरा इससे पहले कभी सुनने में नहीं आया. तब भी नहीं जब आसाम में सबसे भीषण आतंकी हमला हुआ. दुर्भाग्य से उस दिन भी मीडिया और प्रशासन के लिए साध्वी प्रज्ञा ही मुद्दा थी न कि असम में मारे गये सामान्य नागरिक. लेकिन चंद दिनों के अंतराल पर मुंबई में हुआ आतंकी हमला "इनफ इस इनफ" का जुमला चला देता है....उद्योगपतियों से क्यों मिले आडवाणी?
२० नवंबर की शाम आडवाणी के घर के बाहर भारी गहमा-गहमी थी. दरवाजे के बाहर पत्रकारों की भारी भीड़ जमा थी. कैमरे और गनमाईक तैनात थी. शाम के पांच बजते ही सारे मीडियाकर्मी हरकत में आने लगते हैं. एक-एक कर उद्योगपतियों की गाड़िया आडवाणी के घर के अंदर जाती हैं और बाहर पत्रकारों में उस उद्योगपति को पहचानने की बुझौवल शुरू हो जाती है. पंद्रह बीस मिनट के अंदर देश के कोई १५ शीर्ष उद्योगति आडवाणी के घर पहुंच चुके थे. पहुंचनेवाले लोगों में दोनो अंबानी बंधु भी शामिल थे. मुकेश अंबानी पहले आ गये थे, अनिल बाद में आये. ...अपनी अर्थव्यवस्था से जुड़ने का वक्त
इंटीग्रेशन बहुत अच्छा शब्द है. योग भी एक तरह का इंटीग्रेशन ही है. सत्य का परम सत्य के साथ इंटीग्रेशन. अपूर्ण का पूर्ण के साथ मिलन. पूर्ण के साथ मिले तो अपूर्ण का अभाव दूर हो गया. भारत में भी जब अर्थव्यवस्था को दुनिया के साथ (खासकर दुनिया की बड़ी कंपनियों के साथ) इंटीग्रेटशन की कोशिशे शुरू हुईं तो समर्थकों ने कहा कि हमारा अभाव दूर हो जाएगा. भारत में कोई बीस साल भी नहीं बीते. ढोल फट गया. ...आडवाणी की वेबसाईट : नो वारंटी
"This website makes no representations or warranties in relation to this website or the information and materials provided on this website." भारतीय राजनीति में डिजिटल तकनीकि का प्रयोग करनेवाले लालकृष्ण आडवाणी अपनी ही वेबसाईट पर कही गयी बातों की जिम्मेदारी स्वीकार नहीं करते. इसका उदाहरण यह वाक्य है जो आडवाणी की वेबसाईट पर चस्पा है. हालांकि वेबसाईट का होमपेज यह दावा करता है कि यह भाजपा और एनडीए के भावी प्रधानमंत्री की वेबसाईट है लेकिन इतने बड़े दावे का सच यह है कि वे वेबसाईट पर कही गयी बातों की जिम्मेदारी खुद स्वीकार नहीं करते....आडवाणी की पाती ओबामा के नाम
नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने ओबामा की जीत के बाद उन्हें बधाई देनेवाला एक पत्र लिखा था. लेकिन रूकिये, यह नेता प्रतिपक्ष का पत्र किसी संभावित राष्ट्राध्यक्ष के लिए था या फिर निजी पत्र किसी नेता के नाम था? पत्र का मजमून तो यही कहता है कि यह निजी पत्र है जो किसी करिश्माई नेता से अभिभूत होकर लिखा गया है. हालांकि यह पत्र अपने आप में एक प्रहसन की तरह लगता है. पत्र का लेटरपैड नेता प्रतिरक्ष का है, पहली लाईन में लिखा गया है कि वे भाजपा और अपनी ओर से लिख रहे हैं और बधाई अपनी बीवी, बेटा-बेटी की ओर से दी गयी है. पहले पत्र ही पढ़ लेते हैं-...नो, यू कैन नाट मि. ओबामा !
गोलमेज सम्मेलन के लिए महात्मा गांधी लंदन गये तो लौटते हुए फ्रांस भी गये थे. उनके सामने प्रस्ताव आया कि आपको अमेरिका भी जाना चाहिए. बार-बार दबाव डालने के बावजूद महात्मा ने अमेरिका जाने से मना कर दिया. जब उनके पूछा गया कि आप मना क्यों कर रहे हैं तो उन्होंने कहा था अभी वह वक्त नहीं आया है कि मैं अमेरिका जाऊं. महात्मा गांधी भले ही अमेरिका न गये हों लेकिन बराक ओबामा के निजी दफ्तर में महात्मा गांधी की फोटो लगी हुई है. आर्थिक और सामाजिक भ्रंस के कगार पर खड़े अमेरिका में ओबामा का राष्ट्रपति बनते ही क्या वह वक्त आ गया है कि महात्मा गांधी जैसी चेतना कह सके कि हां, अब वह वक्त आ गया है जब मुझे अमेरिका जाना चाहिए?...Author info
