संजय तिवारी
भारत के दुर्भाग्य विधाता
अब बात अमरनाथ स्राईन बोर्ड को दी गयी जमीन की नहीं है. बात कश्मीर की आजादी की चल पड़ी है. जो लोग भूल चुके थे उन्हें याद दिलाया जा रहा है कि कश्मीर में हालात ९० वाले हो चले हैं. ऐसा कहनेवाले अकेले हुर्रियत के लोग नहीं है. यह दिल्ली के पत्रकार बिरादरी में भी कहा जा रहा है.
वाम से हारा सर्वहारा
"मैं पश्चिम बंगाल में तब आया था जब अधिकांश लोग मेरे इस निर्णय पर मुझे पागल ठहरा रहे थे....मैं उन्हें गलत साबित कर दूंगा जो यह समझते हैं कि इतना निवेश करने के बाद भी मैं यहां से चला जाउंगा." रतन टाटा के इस बयान में धमकी, व्यावसायिक हित और कारपोरेट बाजीगरी सभी कुछ शामिल है. हर हाल में वे सिंगूर में बने रहना चाहते हैं. अगर ऐसा है तो फिर उन्होंने सिंगूर छोड़ने की धमकी क्यों दी थी? ...पलायन का ग्रोथ रेट
आदमी अपनी इच्छा से घूमता आया है और घूमता रहेगा. लेकिन यह घुमंतू स्वभाव वह नहीं है जिसे हम पिछले कुछ सदियों से प्रवास कहकर परिभाषित कर रहे हैं. आज जो पलायन हो रहा है उसमें निज इच्छा का लोप हो चुका है. निजी जरूरतों के साथ जिस एक तत्व ने प्रवास को पलायन बना दिया है वह है मनुष्य के एक वर्ग की असीमित इच्छाएं जो कुण्ठा की शक्ल में मानव जाति के ही दूसरे वर्ग को पीड़ा के अथाह सागर में धकेलती आ रही हैं. इस संघर्ष से जो निकला है वही आज और भविष्य की बड़ी समस्या पलायन और विस्थापन है....हजार करोड़ की हरियाली
"साल २००८ तक दिल्ली से सटे इलाके नये तरह के शहर की बसावट के लिए खासे चर्चित हो चुके होंगे. आज के झड़ौदा कला, झटीकरा, घोड़ी-बछेड़ू और गढ़ी हरसरू जैसे गांव उस समय अंग्रेजीदां नामों और लोगों से शोभायमान हो रहे होंगे. आज भले ही इन गांवों के आस-पास अकूत खेत और चारागाह हों और यहां गाय-भैंसे चरती हों लेकिन उस समय ये चारागाह नये तरह के घास के मैदानों में परिवर्तित हो जाएंगे जिसमें आदमी बड़ी कीमत अदा करके प्रवेश पा सकेगा......Author info
