संजय तिवारी
गूगल गणराज्य के १० साल
गूगल की सफलता की कहानी समझने के लिए उस दौर को समझना होगा जब वेब पन्ने इतने हो गये थे कि डायरेक्टरी की जरूरत महसूस होने लगी थी. यह काम गूगल ने नहीं किया. सबसे पहले यह काम याहू के संस्थापक डेविड फिलो और जेरी येंग ने किया था. वे भी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के छात्र थे. उन्होंने सबसे पहले अप्रैल १९९४ में जो डायरेक्टरी शुरू की उसका नाम रखा था- जेरीस गाईड टू द वर्डवाईड वेब. अकेले इसी साल एक मिलियन से ज्यादा हिट्स आये. १८ जनवरी १९९५ को याहू नाम रजिस्टर हुआ और यहां से याहू डायरेक्टरी युक्त पोर्टल में बदल गया.
नरेगा का पैसा अधिकारियों का विकास
राजीव गांधी गलत थे जो उन्होंने यह कहा कि विकास के लिए ऊपर से जो पैसा आता है उसका १०पैसा ही नीचे पहुंचता है. उड़ीसा के अधिकारी यह साबित कर रहे हैं कि रूपये में दस पैसा नहीं बल्कि २५ पैसा नीचे पहुंचता है. आज राजीव गांधी जिन्दा होते और अपनी ही पार्टी की महत्वाकांक्षी परियोजना नरेगा के तहत पैसे की बंदरबाद देखते तो निश्चित रूप से वे अपना जुमला ठीक करते. लेकिन रूकिये, एक दिक्कत है. ...इंस्पेक्टर शर्मा को किसने किया शहीद?
दिल्ली के बाटला हाउस इलाके में आतंकवादियों से मुटभेड़ के दौरान इंस्पेक्टर एम सी शर्मा की दुखद मौत किसकी गोली से हुई? मुटभेड़ के आज दो दिन बाद यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वे आतंकवादियों की गोली से मारे गये? या वे किसी साजिश के शिकार हुए? आज कुछ अखबारों ने एक फोटो प्रकाशित की है. फोटो में दो लोग इंस्पेक्टर शर्मा को संभालते हुए ले जा रहे हैं. जैसा कि पुलिस और मीडिया ने बताया था कि उनके पेट में तीन गोली लगी थी, फोटो में एमसी शर्मा के पेट पर कहीं खून का निशान नहीं है. ...हिन्दू होने का 'अ'धर्म
जिस कानपुर में दंगा करके सिमी इस्लामिक छात्र आंदोलन से जेहाद के रास्ते पर चल पड़ा था उसी कानपुर में अगस्त के महीने में हुए एक विस्फोट के बाद शक किया गया कि ऐसा करनेवाले बजरंग दल के लोग थे. यह छोटी सी घटना बताती है कि एक प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्व आकार ले रहा है जो तीर कमान नहीं बल्कि बम और डेटोनेटर पर हाथ साफ कर रहा है....पुण्य प्रसून का पुण्य प्रसूत
दो तीन दिन पहले दिल्ली में भारतीय पत्रकारिता की परंपरा पर एक सेमिनार था. मुख्य वक्ता थे प्रभाष जोशी. बात आयी टीवी पत्रकारिता की तो प्रभाष जोशी ने कहा कि "हमारे पुण्य प्रसून जी जिस चैनल को छोड़कर पुण्य प्रसूत हो गये हैं उस चैनल....." जब प्रभाष जी यह बोल रहे थे तो सामने की एक कुर्सी पर नकवी साब भी बैठे हुए थे. जी हां, ये वही नकवी साहब हैं जो आज तक के सर्वे-सर्वा हैं और बहुत अच्छे ज्योतिषी हैं. प्रभाष जी का यह कहना कि आज तक छोड़कर पुण्य प्रसूत हो चुके पुण्य प्रसून मुझे अच्छा लगा. क्योकि कोई भी गैरतवाला पत्रकार आज तक और इंडिया टीवी जैसे घरानों के साथ शायद ही काम करना चाहे. ...गूगल क्रोम पर 24 घण्टे
हालांकि यह थोड़ा कम समय होता है किसी ब्राउजर को पूरा समझने में फिर भी क्रोम के बारे एक बात जो सबसे पहले आपका ध्यान खींचती है वह है इसकी तीव्रता. मैं आईई-6,7, ओपेरा, सफारी और फायरफाक्स का प्रयोग कर चुका हूं लेकिन यह उन सब ब्राउजर से तेज है. और जो बात सबसे ज्यादा निराश करती है वह है इसकी सादगी. आपको भी हैरानी हो सकती है कि सादगी तो इंटरनेट की जान है फिर इसमें निराश होनेवाली कौन सी बात है?...दलित चिंतन के मनुवादी
चंद्रभान प्रसाद अपने आप को ऐसा दलित चिंतक कहते हैं, जो अकेले ही अंग्रेजी में लिखता है. क्योंकि वे खुद अपने आप को दलित चिंतक कहते हैं और अंग्रेजी में लिखते हैं इसलिए लोगों में भी उनकी दलित चिंतक के रूप में अच्छी-खासी प्रतिष्ठा है. सीपीआई (एमएल) से अपना व्यक्तित्व बनाने की शुरूआत करनेवाले प्रसाद जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पहुंचे तो उनका अंबेडकर प्रेम दहाड़े मारकर बाहर आ गया, अब तो वे मानते हैं कि वामपंथी और संघी दो ऐसे संगठन हैं जो दलितों के सबसे बड़े विरोधी हैं. हिन्दू तो दलितों के सनातन दुश्मन हैं ही. ...Author info
