संजय तिवारी
'तुम्हारे काम को मीडिया रिपोर्ट कर रहा है, इसलिए ज्यादा से ज्यादा नुकसान करो'
यह पाकिस्तान में बैठे आतंकियों के आका की आवाज है जो ओबेराय होटल में एक आतंकी से बात करते हुए बोल रहा है. (पूरी बातचीत अंदर है) टीवी पत्रकार अपनी खूब सफाई दे रहे हैं कि मुंबई के आतंकी हमले में उनकी भूमिका कहीं से दोषपूर्ण नहीं थी. बरखा दत्त की रिपोर्टिंग पर सवाल खड़ा किया गया और इस प्रकरण में एक ब्लागर ने न सिर्फ माफी मांगी बल्कि अपनी वह पोस्ट भी डिलिट कर दी जिसमें उसने टीवी रिपोर्टिंग पर सवाल उठाये थे. लेकिन क्या हकीकत यही है? कुंते ने क्या लिखा उसके साथ ही हम यहां मुंबई में आतंकी हमलों की खुफिया रपट के हवाले से आतंकियों और उनके आकाओं के बीच हुई बातचीत का कुछ हिस्सा दे रहे हैं. इस बातचीत को पढ़ने से साफ हो जाता है कि टीवी रिपोर्टरों की करतूतों की वजह से आतंकियों को फायदा हो रहा था या नहीं.
मारने नहीं, मरने पर उतारू
दिल्ली के पंचकुईयां रोड पर हिन्दू महासभा का भवन कोई ७५ साल पुराना है. लगभग इतने ही साल का एक आदमी आजकल यहां आकर रूका हुआ है. वह हिन्दुओं की पवित्र नदी गंगा को मरते हुए नहीं देख सकता इसलिए फैसला करके दिल्ली आया है कि उसका पार्थिव शरीर ही अब इस भवन से बाहर जाएगा....एक प्रस्तावित कानून के खिलाफ वास्तविक आंदोलन
जो जंतर-मंतर लगभग भूल चुके हैं वे आज जंतर-मंतर पर थे. मीडिया के लोग. वे कब के भूल चुके हैं कि दिल्ली में जन आंदोलनों की एक जगह है जिसे जंतर मंतर कहते हैं. लेकिन आज उन्हें याद आया. वे जंतर-मंतर पर पहुंचे. नारे लगाये. खबर देनेवाले खबर बने. काला कानून वापस लेने की मांग हुई. फिर उस काले कानून की प्रतियां जलाई गयीं जो अभी बना नहीं है. सबकुछ ठीक से निपट गया. लोग आये थे और वापस चले गये. ...भाजपा के भस्मासुर
अगर आपको उत्तर प्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री रहे रामप्रकाश गुप्ता याद होंगे तो यह भी याद होगा कि वे मुख्यमंत्री पद से क्यों हटाये गये? उनके बारे में यह खबर मीडिया में फैलायी गयी थी कि वे बहुत भुलक्कड़ हैं. कैबिनेट की मीटिंग में हुए निर्णयों को भी भूल जाते हैं. ऐसी खबरें रोज आती थीं. आखिरकार तंग आकर भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने का निर्णय ले लिया था. उनकी जगह राजनाथ सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया और अगला विधानसभा चुनाव भी उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा गया. नतीजा यह हुआ कि भाजपा थोड़े और गर्त में चली गयी....पत्रकारिता के बारह सवाल
दिल और दिमाग किसी भी चेतन शरीर के अनिवार्य हिस्से हैं. जिन्दा रहने के लिए दोनों की जरूरत है. हालांकि दोनों के स्वभाव बिल्कुल विपरीत हैं लेकिन दोनों में से किसी एक के बिना जीवित शरीर की कल्पना नहीं की जा सकती. लेकिन यह दिल दिमाग केवल चेतन में ही नहीं होते. चेतन पुरूष जो कुछ रचना करता है उस रचना में भी दिल-दिमाग उतर आता है. कागज, पन्ने और स्याही सदियों से मनुष्य के इस स्वभाव के गवाह रहे हैं. जब-जब दिल टूटे हैं तो कागज ही सबसे ज्यादा स्याह हुए हैं लेकिन जब दिमाग सुन्न हो जाए तो? ...ब्लाग विचार के साथ व्यभिचार
पूत के पांव पालने में दिखते हैं. लेकिन पूत के पांव पालने तक पहुंचे इसके लिए पूत का स्वस्थ प्रसव होना जरूरी होता है. हिन्दी ब्लागरी के साथ ऐसा नहीं हुआ. हिन्दी ब्लाग प्रसव की पीड़ा झेलकर अस्तित्व में आये जरूर लेकिन आज ब्लाग एक अच्छे विचार के गर्भपात हो जाने जैसे हैं. किसी विचार का इतने कम समय में अप्रांसगिक हो जाना बहुत पीड़ादायक है. हिन्दी ब्लाग के विकास के लिए जिन औजारों का इस्तेमाल किया गया वही औजार इसके पतन के कारण भी हो गये. ...राजू सत्यम् सत्यानाश
बी रामलिंग राजू १९७७ में जब अमेरिका से एमबीए करके वापस लौटे तो पिता के कहने के उलट उन्होंने समाचार और साफ्टवेयर व्यापार में जाने का फैसला किया. यह वही समय था जब भारत में आईटी उद्योग की बुनियाद पड़ रही थी.१९८७ में राजू ने २० कर्मचारियों के साथ सत्यम कम्प्यूटर्स की स्थापना की. उनको पहला आर्डर डान डियर टैक्टर्स से मिला जिसके लिए सत्यम कम्प्यूटर को साफ्टवेयर की सप्लाई करनी थी. २१ साल के अपने कारपोरेट सफरनामें में सत्यम कम्प्यूटर भारत की चौथी सबसे बड़ी साफ्टवेयर कंपनी बनने के साथ उसने अपना कारोबार ६६ देशों में फैला दिया. वह फार्चून ५०० कंपनियों में शामिल थी लेकिन इसी वक्त पूंजी के शेर ने सवार को अपनी पीठ से नीचे गिरा दिया. ...आदिवासियों की बत्ती गुल
शिबू सोरेन आदिवासी नेता हैं. आदिवासी होने के अपने दावे के कारण ही उन्होंने हर हाल में अपने आप को झारखण्ड का मुख्यमंत्री बनवाने की जिद पकड़ी और वे सफल भी हुए. झारखण्ड का आंदोलन चलानेवाला भले ही आदिवासी नेता रहा हो लेकिन अभी जो मुख्यमंत्री हैं क्या वे आदिवासियों के किसी राज्य के मुख्यमंत्री हैं? 6 दिसंबर को दुमका में पुलिस की आदिवासियों से जो झड़प हुई उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि सत्ता का अपना एक चरित्र होता है जिसकी गिरफ्त में जाने से शिबू भी नहीं बच पाये हैं. ...चौथी दुनिया, दूसरी बार
कहा जाता है कि प्रयोग दोबारा नहीं होते. शायद ऐसा इसलिए कि एक दौर से दूसरे दौर के बीच जो अंतराल आ जाता है उसके कारण प्रयोग दोहराने की कोशिश में दम तोड़ देते हैं. अगर बात मीडिया जगत से जुड़ी हो तो यह तर्क ज्यादा मजबूत हो जाता है. लेकिन संतोष भारतीय यह करने जा रहे हैं. वे उस प्रयोग को दोहराने जा रहे हैं जिसने आज से १६ साल पहले विराम ले लिया था. वे चौथी दुनिया को दोबारा निकालने जा रहे हैं....क्या वह प्रतिहिंसा होगी या अहिंसा?
नया साल पुराने पर एक दोहराव से ज्यादा कुछ होता नहीं है. कुछ घण्टे पहले हम जिस रूप में सोते हैं उसी रूप में हम अगली सुबह जागते हैं. फिर हमारी अपनी मान्यताओं से बनायी हुई बातें हैं कि यह नया साल है. वह पुराना साल था. यह नया दिन है वह पुराना दिन था. दिनों में कोई बदलाव नहीं होता. बदलाव होता है स्वभाव में. लेकिन हम दिनों के प्रति तो सचेत रहते हैं लेकिन अपने स्वभाव के प्रति सचेत नहीं रहते हैं....Author info
