संजय तिवारी
कश्मीर में प्रधानमंत्री बिना बुलेटप्रूफ
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कश्मीर घाटी की अपनी दो दिन की यात्रा पूरी करके दिल्ली लौट आये हैं. प्रधानमंत्री की यह यात्रा कई लिहाज से महत्वपूर्ण है. उन्होंने देश में अब तक के सबसे दुर्गम रास्ते पर बनी रेल लाईन को नागरिकों को समर्पित किया तो साथ ही राज्य में विकास के नये अध्याय की शुरूआत की घोषणा भी की. लेकिन उन सबसे महत्वपूर्ण यह रहा कि प्रधानमंत्री की लगभग चौबीस घण्टे की यह कश्मीर यात्रा बिना बुलेट प्रूफ शील्ड के पूरी हुई. सुरक्षा के लिहाज से वह बुलेटप्रूफ जितना महत्वपूर्ण होता था, कूटनीति के लिहाज से प्रधानमंत्री के सामने से बुलेटप्रूफ शील्ड का हटना उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है.
जियो-सिटीज मर गया अब आगे कौन गिरेगा
जियो-सिटीज इतिहास हो गया. 1999 में 3.7 अरब डालर के िनवेश से याहू समूह में शामिल किया गया जियो-सिजीज याहू के लिए ऐसा घाटे का सौदा साबित हुआ कि आखिरकार याहू ने उसे इसी साल अप्रैल में बंद करने की घोषणा कर दी और आखिरकार 26 अक्टूबर को सदा सर्वदा के लिए अलविदा कह दिया. ऐसा क्या हुआ कि भारी भरकम निवेश के बाद याहू ने जियो-सिटीज को छोड़ दिया? उन उपभोक्ताओं का क्या हुआ होगा जो इंटरनेट पर इस सेवा का उपयोग करते थे? ...दो दिन के आयोजन पर सिर्फ दो सवाल
भारतीय तंत्र शास्त्र बताता है कि मनुष्य 12 वर्ष में अपनी अवस्था बदल देता है. इसलिए भारतीय समाज व्यवस्था में 12 वर्ष का बड़ा महत्व होता है. हर बारहवें साल देश में महाकुंभ का आयोजन होता है. महाकुंभ के आयोजन के पीछे ऐसी व्यवस्था थी कि हर बारह साल में एक नयी पीढ़ी समाज में आकार ले लेती है इसलिए उस नये समाज के लिए व्यवस्था में जो बदलाव करने हैं उनकी संसद महाकुंभ में आयोजित की जाती है जिसे धर्म संसद कहते हैं. ...अमीरी और गरीबी एक साथ, एक दूसरे को चिढ़ाती हुई
मुकेश अंबानी धन पिपासु व्यक्ति नहीं हैं. जो लोग उन्हें नजदीक से जानते हैं वे बताते हैं कि आचार विचार और भोजन में पूरी तरह से सात्विक और बहुत घरेलू किस्म के इंसान हैं. लेकिन मुकेश अंबानी सादगी पसंद व्यक्ति है ऐसा बिल्कुल नहीं है. वे भीमकाय सपने देखतें हैं और उसे पूरा करने की कोशिश करते हैं. ...महाराष्ट्र का महासमर
मतदाता और मतदान के बीच अब घण्टों का अंतराल बचा है. 13 अक्टूबर को देश की तीन विधानसभाओं के लिए उम्मीदवारों का चयन होना है. हरियाणा, अरुणाचल और महाराष्ट्र में सबसे अहम चुनाव महाराष्ट्र का है. इसलिए तो है ही कि जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उसमें महाराष्ट्र सबसे बड़ा राज्य है, लेकिन महाराष्ट्र का महासमर न केवल राज्य में सरकार का निर्धारण करेगा बल्कि केन्द्र की कांग्रेसी सरकार के सामने भी आगे के पांच साल का रोडमैप खींचेगा. ...चौदह साल में चरम पर
बराक हुसैन ओबामा का कुल राजनीतिक कैरियर 14 साल का है. 1996 में उनका राजनीतिक कैरियर इलिनाइस में सीनेटर के रूप में शुरू हुआ. लेकिन 14 साल के छोटे से अंतराल में ही वे राजनीति के उस चरम पर पहुंच गये जहां से आगे कोई रास्ता नहीं जाता है. इस युग में किसी भी राजनीतिज्ञ का चरम तब समझा जाता है जब उसे शांति का नोबेल पुरस्कार मिल जाए. बराक हुसैन ओबामा पहले श्वेत अमेरिका के अश्वेत राष्ट्रपति बने और अब उन्हें दुनिया का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार भी मिल गया है. चौदह साल के राजनीतिक कैरियर में और भला उन्हें क्या चाहिए?...चार आने की चौथी दुनिया
चौथी दुनिया का बीस बाइस सालों बाद दोबारा प्रकाशन इसी साल शुरू हुआ है. रंग-रोगन का शिकार 20 पन्नों का यह अखबार जब बाजार में आया तो वह कुछ नहीं कर पाया जिसका दावा किया जा रहा था. उस समय अखबार के सर्वे-सर्वा संतोष भारतीय ने एक निजी बातचीत में कहा था कि देखना, हम हर तरह से साप्ताहिक अखबार की पत्रकारिता को नया आयाम देंगे. जब वे यह बात बोल रहे थे तब नहीं पता था कि निकलने के बाद अखबार कैसा दिखेगा?...नया नहीं है गंगा बचाने का धंधा
गंगा को बचाने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता से कोई भी अभिभूत हो सकता है. पर्यावरणविद राजेन्द्र सिंह भी उन्हीं अभिभूत लोगों में हैं जो कह रहे हैं कि सरकार ने बहुत सराहनीय काम किया है. लेकिन सरकार की ओर से गंगा को बचाने का धंधा पहली बार नहीं किया जा रहा है. आजाद भारत में पहले इंदिरा गांधी ने गंगा की दुर्दशा से दुखी होकर गंगा को बचाने के लिए केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अध्ययन करने के लिए कहा था. इसी अध्ययन को आधार बनाकर बाद में गंगा एक्शन प्लान की घोषणा की गयी. सैकड़ों करोड़ रूपया बर्बाद करके गंगा एक्शन प्लान से कुछ भी हासिल नहीं हुआ, इसलिए इस अथारिटी से गंगा को बचाने में कोई मदद मिलेगी, मान लेना मुश्किल है....नवभारत टाइम्स की पोर्न पत्रकारिता
अगर आप विस्फोट.कॉम नियमित पढ़ते हैं तो हो सकता है आपने तुलसी सिंह बिष्ट का कमेन्ट देखा हो. एक दिन तुलसी सिंह मेरे पास आये कहने लगे कि, संजय जी अब मैं आपकी साइट उतना नहीं पढ़ता हूं. मैं नवभारत टाइम्स पढ़ता हूं और खूब कमेन्ट करता हूं. तुलसी की हिम्मत और इमानदारी कि उसने साफ साफ मुझे बता दिया, लेकिन अब मुझे लगता है कि तुलसी सही करते है. नवभारत टाइम्स जो कुछ दे रहा है वह सब लिखने-छापने की समझ अपने अंदर नहीं है इसलिए तुलसी तो नवभारत टाइम्स ही पढ़ेगा....इस अर्थव्यवस्था की मौत का संकेत है यह मौत
आप शायद अरविन्द पाठक को नहीं जानते. मैं भी नहीं जानता. अरविन्द पाठक को जानने का कारण बड़ा दर्दनाक है फिर भी उनकी मौत के बाद ही सही हम सबको अरविन्द पाठक को जानना चाहिए. 38 साल के अरविन्द पाठक दिल्ली के महिपालपुर एक्सटेंशन इलाके में रहते थे. बुधवार को खबर आयी कि उन्होंने अपनी बेटी, अपनी पत्नी को जहर खिलाकर संसार से विदा किया फिर बचा खुचा जहर खुद खाकर सदा सदा के लिए मौत की नींद सो गये. अरविन्द पाठक के साथ ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने ऐसा निर्मम निर्णय ले लिया? ...Author info
