संजय तिवारी
सौ लोगों के हाथ में गिरवी एक चौथाई देश
इसे आप भारत की उदार हो चुकी अर्थव्यवस्था का पुरस्कार मानिये. पहले व्यापारी यह कहते हुए आपके घर में आये कि आपको व्यापार करने नहीं आता. फिर उन व्यापारियों को मदद करनेवाले जितने भी सहयोगी उपकरण हो सकते थे वे सब एक एक करके भारत में शरण ले रहे हैं. पिछले दो तीन सालों में प्रिंट मीडिया के क्षेत्र में विदेशी पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन अपने देश में होने लगा है. दुनिया का एक जाना माना बिजनेस ब्राण्ड फोर्ब्स भी उन्हीं में से एक है जो भारत से प्रकाशित हो रहा है.
पूंजीवाद को पटखनी देने की कमजोर कोशिश
21 नवंबर को जिस वक्त भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से अपने विशेष विमान द्वारा अमेरका के लिए उड़े तो वहां उन्होंने अगले चार दिनों तक ओबामा प्रशासन के साथ जो तालमेल किया वह भारत में गहराते पूंजीवाद को और मजबूती से धंसाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ. खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्वीकार किया कि भारत बिनाशक अमेरिका का रणनीतिक साझीदार है. ...लीक हो गयी एक गैरजरूरी रिपोर्ट
लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट लीक हो गयी. भारतीय पत्रकारिता में मानक स्थापित करनेवाले एक अखबार और एक टीवी चैनल ने बड़े गर्व के साथ यह काम किया. अखबार तो रिपोर्ट लिखकर फारिग हो गया लेकिन टीवी चैनल दिन रात लगा हुआ है कि साहब मेरे पास 900 पेज की पूरी रिपोर्ट है जिसमें लिखा है कि आप बाबरी मस्जिद गिराने के दोषी हैं. एक एक करके फोन लाइन पर नेता आ रहे हैं और संसद, न्यायालय की बजाय एनडीटीवी पर अपना ट्रायल दे रहे हैं. सुबह जो सनसनी पैदा हुई थी रिपोर्ट के लीक होने से शाम होते होते भाजपा कांग्रेस सब एक ही बात पर आ गये रिपोर्ट में जो लिखा है उससे पहले यह जानना जरूरी है कि रिपोर्ट लीक कैसे हुई?...दिल्ली में देश के दो लाख गन्ना किसान
रामलीला मैदान से जंतर-मंतर पहुंचना हो तो बीच में दिल्ली का प्रतिष्ठित कनाट प्लेस पड़ता है. लेकिन गुरुवार को गन्ना किसानों की रैली को देखते हुए इस प्रतिष्ठित व्यावसायिक जगह को एहतियातन बंद करवा दिया गया था. हो सकता है पुलिस ने दुकानदारों की जानमाल की रक्षा को देखते हुए यह कदम उठाया हो लेकिन राष्ट्रीय लोकदल के कहने पर दिल्ली आये लगभग दो लाख गन्ना किसानों ने छुटपुट उपद्रव के अलावा ऐसा कुछ नहीं किया जिससे "कानून व्यवस्था" का संकट खड़ा होता. ...भ्रष्टाचार को देखने का पूंजीवादी नजरिया
भारत में भ्रष्टाचार अब गर्म बहस का मुद्दा नहीं रहा. अगर ऐसा होता तो मधु कोड़ा के भ्रष्टाचार पर अखबारों के पन्ने भरे रहते और महीनों टीवी चैनल पर शायद दूसरा कोई कार्यक्रम प्रसारित नहीं होता. याद करिए नब्बे की शुरुआत का वह समय जब हर्षद मेहता का शेयर बाजार घोटाला हुआ था या फिर उससे थोड़ा पहले 65 करोड़ के एक "मामूली भ्रष्टाचार" पर दुनिया की सबसे बड़ी संसद पलट दी गयी थी।...Author info
