संजय तिवारी
सवा सौ साल की मजबूत कांग्रेस और कमजोर पड़ता गैरकांग्रेसवाद
कांग्रेस शब्द की उत्पत्ति उस समय के साम्राज्यवादी देश इंग्लैण्ड की बजाय वर्तमान के साम्राज्यवादी देश अमेरिका में हुई. मूल लातिन के कांन+ग्रादि का अपभ्रंस कांग्रेस शब्द का इस्तेमाल अमेरिका के विभिन्न राज्यों को एकीकृत करने के लिए होने वाली बैठकों के लिए किया गया और कांग्रेस शब्द के रूप में शायद पहली बार 1621 में प्रयुक्त किया गया.
दलित के हाथ में सत्ता नहीं देना चाहती कांग्रेस- अली अनवर
अली अनवर पश्मान्दा मुस्लिम महाज के नेशनल प्रेसीडेन्ट हैं और राज्यसभा में जद (यू) के मुख्य सचेतक हैं. रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को सदन में प्रस्तुत करवाने में अकेले अली अनवर की ही भूमिका है. पिछले दो साल से लगातार वे इस रिपोर्ट को सदन में पेश किये जाने के लिए अभियान चला रहे थे. रंगनाथ मिश्रा आयोग के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर हमने उनसे लंबी बात की. प्रस्तुत है अली अनवर से पूरी बातचीत-...भारतीय जनता पार्टी के 'लिटिल' गडकरी
भारतीय जनता पार्टी के नये अध्यक्ष नितिन गड़करी को आप ध्यान से देखिए. उनके चेहरे पर हमेशा आपको मुस्कान दिखाई देगी. ऐसा नहीं है कि वे हमेशा मुस्कुराते रहते हैं लेकिन उनके चेहरे की भाव भंगिमा ऐसी है कि कोई भी देखनेवाला यही समझता है कि वे मुस्कुरा रहे हैं. लेकिन जो नितिन गड़करी को नजदीक से जानते हैं वे बताते हैं कि उनका स्वभाव उनके चेहरे के भाव से बिल्कुल उलट है. वे अतिशय गुस्सेवाले हैं....मान्यताप्राप्त पत्रकारों की अमान्यताप्राप्त राजनीति
इस देश में एक प्रदेश है उत्तर प्रदेश. उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में ऐसे ऐसे शब्द इस्तेमाल किये जाते हैं जिसे कोई प्रशासनिक व्यवस्था का घुन ही समझ सकता है. ऐसा ही एक शब्द है- अनाधिकृत अध्याशी. अब यह अनाधिकृत अध्याशी क्या बला है? आपको ज्यादा दिक्कत न हो इसलिए बताते हैं. इसका सीधा सीधा मतलब होता है- गैरकानूनी कब्जा करनेवाला....विदाई बेला में भी अकेले हैं राजनाथ
जैसे ही आप भाजपा कार्यालय 11, अशोक रोड के अंदर दाखिल होते हैं सामने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मूर्ति लगी है. मूर्ति के दोनों ओर दो गलियारे जाते हैं जिसमें बायीं ओर भाजपा अध्यक्ष का कमरा बनाया गया है और दाहिनी ओर भाजपा के संगठन महामंत्री का. ...एक दशक बाद फिर चर्चा में रोमेश शर्मा
दस साल बाद एक बार फिर रोमेश शर्मा चर्चा में है. इस बार वह चर्चा में इसलिए आया है क्योंकि रोमेश शर्मा को अपनी ही प्रेमिका कुंजुम बुद्धिराजा की हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया है. रोमेश शर्मा की 11 साल पहले गिरफ्तारी के एक साल बाद यानी 1999 में कुंजुम बुद्धिराजा की उसके ही हड़पे गये दिल्ली के एक फार्महाउस में उसके ही भतीजे द्वारा हत्या कर दी गयी थी. ...मुनाफे की मानसिकता का शिकार हो गया यूएनआई
योजना भवन के पीछे स्थित यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया (यूएनआई) की सड़क से जैसे ही आप गुजरते हैं तो वहां यूएनआई के गेट के दोनों ओर दो तरह की बैठकें दिखती हैं. गेट के दाहिनी तरफ एक चायवाला बैठा है और बायीं ओर एक लाल बैनर के नीचे राजेश कुमार बैठे हैं. खुरदरी अधपकी दाढ़ी वाले राजेश कुमार यूएनआई वर्कर्स यूनियन के महासचिव हैं. फिर वे यहां गेट के बायीं ओर क्या कर रहे हैं? वे यूएनआई को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं....राजनीतिक सफलता के शिखर पर सोनिया गांधी
अगर आपको दो दशक पहले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या से जुड़ी कोई याद होगी तो उसमें सोनिया गांधी की उपस्थिति को महसूस कीजिए. कैसे एक नाजुक और संकोची स्वभाव की अधेड़ महिला ने राजनीति के बियाबान में उतरने से मना कर दिया था. उस वक्त जिसने भी टीवी देखा होगा उसे याद होगा कि गुमसुम सोनिया गांधी कहीं से राजीव गांधी के उत्तराधिकारी होने का दावा नहीं कर रही थी. यह कांग्रेस की परंपरा से उलट था, लेकिन सच था. ...सत्यानंद !.......कौन सत्यानंद?
हमारी कारपोरेट मीडिया के लिए यह कोई खबर हो भी नहीं सकती थी. हुई भी नहीं. झारखण्ड के किसी दूरस्थ स्थान रिखिया में एक कोई सत्यानंद सरस्वती नाम के संन्यासी ने देह त्याग कर दिया. तो? इसमें खबर क्या है? रोज न जाने कितने सन्यासी मरते मराते रहते हैं अब क्या अखबार सबकी खबर छापेंगे? शायद यही तर्क सबसे ज्यादा प्रभावी रहा होगा इसीलिए हमारे अखबारों, टीवी चैनलों ने इस बारे में एक लाइन की खबर बनाना भी मुनासिब नहीं समझा. इसमें किसी को कोई आपत्ति भी नहीं हो सकती क्योंकि यह तो मीडिया का अपना विवेक होता है....सुबह पत्रकारिता की डिग्री, शाम को शराब में सराबोर
पहली दिसंबर को राष्ट्रपति महामहिम प्रतिभा पाटिल हैदराबाद में विश्व समाचार पत्र सम्मेलन का उद्घाटन करने गयी थीं. उन्होंने वहां कहा कि देश में मीडिया का तेजी से विस्तार हो रहा है. इस विस्तार का परिणाम यह है कि देश में मीडिया संस्थानों का भी तेजी से विस्तार हो रहा है. लेकिन इधर कुछ सालों में मीडिया में बहुत कुछ बदल गया है. अब पत्रकार रगड़ रगड़ कर पत्रकार बनने की बजाय पढ़कर पत्रकार बनते हैं. जाहिर सी बात है विस्तार पाते मीडिया उद्योग को व्यवसाय का एक और बेहतरीन माध्यम मिल गया है....Author info
