संजय तिवारी
कांग्रेस का राहुल उदयः कितना सच, कितना झूठ
16 मई को अभी चुनाव परिणाम आने शुरू भी नहीं हुए थे. सिर्फ रूझान आ रहे थे जो यह बता रहे थे कि कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए बड़ा उलटफेर करने जा रही है. सुबह के ग्यारह बजे तक जो रुझान आ रहे थे वे बता रहे थे कि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर रही है. लेकिन रुझान आते ही कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि कांग्रेस ने जो सफलता अर्जित की है वह राहुल गांधी जी की कड़ी मेहनत का परिणाम है. इसके थोड़ी देर बार अंबिका सोनी का बयान आया कि राहुल गांधी जी को इस भारी जीत का सारा श्रेय देना चाहिए और पुरस्कार भी.
बड़ी पूंजी से पत्रकारिता छोटी हो जाती है, इसलिए...
विस्फोट के संचालन के बारे में मैंने जो कुछ लिखा उसके बारे में अब मुझे कहने के लिए कुछ शेष नहीं रह गया है. बहुत सारे लोगों ने प्रतिक्रिया देकर साफ कर दिया है कि इस काम को जितना मैं चाहता हूं, वे मुझसे भी ज्यादा चाहते हैं. अकेले कमरे और थके कंप्यूटर के सहारे जो काम शुरू हुआ था आज उसे मानने-जानने वालों की एक श्रृंखला खड़ी हो गयी है, यह मुद्रा बटोरने से बड़ी कमाई है. खासकर पत्रकारिता के बारे में बात हो यह सौ प्रतिशत सही बात लगती है. क्योंकि यही वह अंतिम माध्यम है जिसके जरिए आप व्यवस्था पर नजर रख सकते हैं. अगर यह भी बड़ी पूंजी के हाथ की गुलाम होगी आम आदमी इसके सामने भी बाजार से ज्यादा कुछ नहीं होगा....विस्फोट पर अस्थाई कार्य विराम
विस्फोट.कॉम जरूर मेरा अपना निजी प्रयास है लेकिन इसको आगे ले जाने में हमारे साथियों, खासकर ब्लाग जगत से जुड़े साथियों का बहुत अहम योगदान रहा है. उन्होंने न केवल इसको प्रचारित किया बल्कि अपने ही बीच का एक काम मानकर इसको बढ़ाने का भी काम किया. देखते ही देखते एक साल के अंदर विस्फोट देश की सबसे चर्चित साईट हो गयी. लेकिन किसी को काम को बढ़ने के लिए सिर्फ जब्जे के अलावा भी दूसरे सहयोग चाहिए होते हैं. ...खबरों की दुनिया में हिन्दी का जयघोष
आमचुनावों में हिन्दी अखबारों द्वारा पैसा लिये जाने की अपमानजक खबरों के बीच एक सम्मानजनक खबर भी आयी है. आईआरएस 2009 के पहले दौर का सर्वे नतीजा सार्वजनिक हुआ है. आईआरएस यानी इंडियन रीडरशिप सर्वे के जरिए ही हमें देश के प्रिंट पाठकों का अंदाज लगता है. यह सर्वे देश भर में दो दौर में किया जाता है और दोनों के अलग-अलग परिणाम घोषित किये जाते हैं. ताजा आंकड़ा साल 2009 के लिए पहले दौर का आंकड़ा है. सर्वे कहता है कि देश के शीर्ष दस अखबारों में पांच हिन्दी के हैं. बाकी पांच दूसरी भारतीय भाषाओं के अखबार हैं. अंग्रेजी का कोई भी अखबार देश के शीर्ष दस अखबारों में शामिल नहीं है. भारत के नागरिकों ने निर्विवाद रूप से हिन्दी अखबारों को इस देश का न्यूज नायक घोषित कर दिया है लेकिन सवाल यह है कि क्या हिन्दी के अखबार नायक की तरह व्यवहार कर रहे हैं? ...हार के कगार पर खड़े हैं राजनाथ
जब हम लोग गाजियाबाद से भाजपा प्रत्याशी राजनाथ सिंह के रोड शो में शामिल हुए तब तक वे एक सभा निपटा चुके थे. रोड शो के लिए जो रूट निर्धारित किया गया था वह उनके संसदीय क्षेत्र की सबसे कमजोर और मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्र लोनी थी. सुबह 10 बजे से शाम के चार बजे तक राजनाथ सिंह ने अनवरत यात्रा की. उनके साथ काफिले में कोई 50 के करीब गाड़ियां थी, कुछ पुलिस वाहन थे और कुछ मोटरसाईकिलें मिल-बिछुड़ रही थीं. राजनाथ सिंह के प्रचार को करीब से देखने और गाजियाबाद से उनके हार की अफवाहों की सच्चाई जानने के लिए जरूरी था कि कम से कम दिनभर उनके प्रचार अभियान को नजदीक से देखा जाए. हमने वही किया....हुड्डा का गुड्डा है, प्रचार जमकर होना चाहिए
चर्चा आम है कि मीडिया पैसे लेकर खबरे छाप रहा है. अब तक तीन ऐसे प्रत्याशी सामने आये हैं जिन्होंने खुलकर मीडिया पर आरोप लगाया है कि मीडिया ने उनसे पैसे की मांग की. देश के दो बड़े शीर्ष अखबार दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर खुलकर व्यापार कर रहे हैं. घोसी (उत्तर प्रदेश) लोकसभा क्षेत्र के जिन दो प्रत्याशियों ने मीडिया से पैसा मांगने का आरोप लगाया था उसमें दोनों ही प्रत्याशियों ने एक ही अखबार का नाम लिया था- दैनिक जागरण. लेकिन ऐसा ही कुछ इलाहाबाद में भी हुआ. वहां भाजपा प्रत्याशी योगेश शुक्ला ने आरोप लगाया कि दैनिक जागरण उनके प्रचार अभियान की खबरें नहीं छाप रहा है. दैनिक जागरण मानता है कि वह राजनीतिक रूप से भाजपा के करीब है लेकिन भाजपा के ही दो प्रत्याशियों ने आरोप लगाकर दैनिक जागरण को कटघरे में खड़ा कर दिया कि विचारधारा से बड़ा है पैसा. लेकिन इन सब आरोपों से यह तो साबित हो गया कि मीडिया मैनेजमेन्ट खुलकर चुनाव में पैसे का खेल रच रहा है. ...प्रमोद महाजन की राजनीतिक विरासत
आज प्रमोद महाजन की तीसरी पुण्यतिथि है. राजनीति में और खासकर भाजपा में प्रमोद महाजन के राजनीतिक प्रयोगों की तीन साल में ही कैसे बिसार दिया गया है इसका अंदाज इसी बात से लगता है कि पूरी भाजपा में आज सुधांशु मित्तल के अलावा प्रमोद महाजन का नाम लेनेवाला भी कोई नहीं बचा है. जो प्रमोद महाजन कभी पूरी भाजपा का टिकट तय करते थे उनके न रहने के बाद उनकी बेटी ने टिकट मांगा लेकिन वादा करके उसे टिकट नहीं दिया गया और बेटा अपने कर्मों की वजह से पहले ही किनारे लग गया था. क्या प्रमोद महाजन भारतीय राजनीति में इतने अप्रांसगिक हो सकते हैं? भारतीय राजनीति की बात छोड़िये क्या भाजपा प्रमोद महाजन के प्रभाव से उबर गयी है? शायद नहीं. प्रमोद महाजन ने भाजपा के लिए जो रास्ते तैयार किये थे भाजपा का वर्तमान और भविष्य उन्हीं रास्तों पर है....Author info
