संजय तिवारी
मील का 73 वां पत्थर
मिथक बन चुका वह पत्रकार अभी भी अथक दिखाई देता है. बंगाली किनारे वाली धोती पर मटके के माड़ीदार कुर्ते में गांधी शांति प्रतिष्ठान के पुरातन और सनातन व्यवस्था की अद्यतन मिसाल बन चुके इस स्रोतशाल में उस 73 साल के अदम्य उत्साही 'नौजवान' पत्रकार ने केक पर चाकू फेरा तो लगा कि उस नौजवान के मन में पैदाइश के 73 साल बाद आगे और 73 मील पत्थर पार करने की ललक शिशुवत हो चली है. वह केक काटनेवाले 'नौजवान' कोई और नहीं, भारतीय पत्रकारिता के एकमात्र जीवित स्तंभ पुरुष प्रभाष जोशी हैं.
क्यों न उठायें श्रीधरन पर सवाल ?
रविवार की भोर दिल्ली के जमरूदपुर इलाके में हुए एक हादसे में एक इंजीनियर सहित पांच लोग मारे गये. 15 अन्य घायल हैं जिसमें चार की हालत गंभीर है. जब हादसा हुआ तो श्रीधरन दिल्ली में नहीं थे. सुबह की फ्लाईट पकड़कर बंगलौर से दिल्ली आये और घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद लोधी रोड स्थित अपने कार्यालय गये और अपना इस्तीफा लिख दिया. उन्होंने तय किया कि वे सोमवार से दफ्तर नहीं आयेंगे. बड़े निर्माण कार्य के दौरान मानवीय और मशीनी चूक की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है इसलिए इस दुर्घटना को अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता. लेकिन यह एक मौका जरूर है जब श्रीधरन के कामकाज की समीक्षा की जानी चाहिए. ...घराना पत्रकारों को जमाने की चिंता
इस बार उदयन शर्मा की पुण्यतिथि मनाने के लिए उनके समर्थकों के पास शायद सबसे नायाब तरीका मौजूद था. उन्होंने उनको एक संवाद के जरिए याद किया. मौका यह कि अभी हाल में ही लोकसभा चुनाव हुए हैं और लोकसभा चुनाव के दौरान मीडिया ने जिस तरह से पैसा बटोरा वह पत्रकार बिरादरी को नैतिकता इत्यादि पर बहस के लिए अच्छा मौका दे देती है. चार घण्टों के दौरान कोई 14 वक्ताओं ने धुंआधार तरीके से अपने तर्क रखे, नाराजगी दिखाई, मजबूरी भी बताई और आह्वान किया कि बदलाव जरूरी है. फिर सब बाहर निकले, चाय पी, एक दूसरे से परिचय बढ़ाया और अपने अपने काम पर वापस लौट गये. पत्रकारिता पर चिंता का उबाऊ और थका देनावाला चार घण्टा पूरा हो गया था. ...आखिरकार कम हुआ यूरिया से याराना
भारत में रासायनिक खाद के प्रयोग ने भले ही किसानों को संकट में डाला हो लेकिन उसने देश के पूंजीपतियों को हमेशा संकट से उबारने का काम किया है. पिछले पांच दशक में भारत में रासायनिक खादों के प्रयोग में बेतहाशा वृद्धि हुई है. इस बेतहाशा वृद्धि को पूरा करने के लिए देश में लगातार रासायनिक उर्वरक के उत्पादन में वृद्धि हुई. इस बढ़े हुए उत्पादन का अतिरिक्त भार न कंपनियों पर पड़े और न किसानों पर इसलिए सरकार ने भारी मात्रा में उर्वरक कंपनियों को सब्सिडी दी. किसानों को मदद के नाम पर पचास सालों तक चले इस खेल का परिणाम यह हुआ कि किसान बदहाल हो गये, खेत बेहाल हो गये.. ...Author info
