संजय तिवारी
भविष्य के भारत की ओर पहला बजट
वित्त वर्ष 2010-11 बजट प्रस्तुत होने से पहले आम आदमी की परिभाषा दाल रोटी से जोड़ी जा रही थी. लेकिन बजट आया तो आम आदमी की जगह शहर के वे लोग आ गये जो एक घर और गाड़ी का सपना देखते हैं. अपने बजटीय प्रावधान में प्रणव मुखर्जी ने जो घोषणाएं की हैं वह उस आम आदमी को सचमुच राहत देनेवाली हैं जिनका रोना अब तक विपक्षी दल और मीडिया का एक हिस्सा रो रहा था. फिर अचानक ही प्रणव मुखर्जी का बजट आम आदमी का विरोधी कैसे हो गया?
दरवेशी में बीते दो साल
आपको यह जानकर अच्छा लगेगा कि हालात जैसे थे वैसे ही हैं. 25 फरवरी 2008 से लेकर आज 25 फरवरी 2010 तक हालात बदस्तूर हैं. न बाहर की दुनिया के रुख में कोई बदलाव आया है और न अपनी परिस्थितियों में. हां, अब दिमाग उस समग्रता में विषय वस्तु को पकड़ने से मना कर देता है जैसे दो साल पहले पकड़ लेता है. लेकिन इसमें दिमाग का भी कोई दोष नहीं है....रेल बजट में कैसे समाये देश?
64 हजार किलोमीटर से अधिक का रेल नेटवर्क और प्रतिदिन 17 हजार ट्रेनों के द्वारा हर साल करीब छह अरब लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचानेवाली भारतीय रेलवे आखिरकार क्या है? एक परिवहन सेवा प्रदाता कंपनी या फिर एक सरकारी मंत्रालय? आप भी यही कहेंगे कि यह एक रेल सेवा प्रदाता संस्थान है जो भारत सरकार में एक मंत्रालय के रूप में काम करता है. क्योंकि यह सबसे बड़ा मंत्रालय है इसलिए सिर्फ रेलमंत्री को ही यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपना बजट अलग से प्रस्तुत करे. ...1411 का इमोशनल अत्याचार
अगर आप किसी नगर या महानगर में रहते हैं तो इस संख्या 1411 से अपरिचित नहीं होंगे. देश की पांचवी सबसे बड़ी मोबाइल फोन सेवा प्रदाता कंपनी एयरसेल ने भारत में घटते बाघों की चिंता में यह धुंआधार प्रचार अभियान शुरू किया है. एयरसेल का मानना है कि देश में कुल 1411 बाघ ही बचे हैं. कंपनी का ऐसा मानना क्यों है इसका कोई आधार नहीं है फिर भी कंपनी ने बाघ बचाने का बीड़ा उठा रखा है....कहीं खो गये हैं जार्ज फर्नांडीज
बात 1998-99 की है. उन दिनों सूबेदार सिंह मुंबई में फुटपाथ वालों के लिए एक राजनीतिक दल बनाकर मुंबई महानगरपालिका में उनका प्रतिनिधित्व देना चाहते थे. हालांकि हृदयाघात से उनका निधन हो गया लेकिन अक्सर वे ट्रेड यूनियन के दिनों के जार्ज फर्नांडीज को याद करते हुए रो दिया करते थे. वे कहते थे- "मेरा जार्ज कहीं खो गया है." सूबेदार सिंह जिन दिनों जार्ज फर्नांडीज को याद करके रो दिया करते थे उन दिनों जार्ज फर्नांडीज दिल्ली में रक्षा मंत्री और राजग के संयोजक हुआ करते थे. ...मैंने देखी, मुकेश अंबानी की मुंबई
हमारे शहर समृद्धि की छलक से नहीं निकले हैं. हमारे शहर गरीबी से उपजे पलायन की पैदाइश हैं. इसलिए जब हम किसी शहर में जाते हैं तो हमें एक ही शहर में कई शहर दिखाई देते हैं. महानगरों में स्थिति और अधिक स्पष्ट है. मुंबई ऐसे ही कई शहरों से अटा एक अटपटा शहर है. ...बैरन हुआ बीटी बैंगन
बीटी बैंगन पर पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को 8 फरवरी को आखिरी जन सुनवाई करनी थी. वे बंगलौर पहुंचे. वहां लोगों से बात शुरू की. इतने में एक किसान खड़ा हुआ और उसने जयराम रमेश पर आरोप लगाया कि वे मोनसेन्टों के हित में बीटी बैंगन को बढ़ावा दे रहे हैं. दो दिन बाद ही जयराम रमेश ने जब बीटी बैंगन पर अपना बहुप्रतिक्षित फैसला किया तो उस किसान को भी जवाब देने की कोशिश की कि वे मोनसेन्टों के एजेन्ट नहीं है....एक दिन सामना से सामना
सामना का संपादकीय लिखा जा चुका है. मराठी में लिखा गया बाल ठाकरे का संपादकीय हिन्दी में अनुवादित किया गया है जिसमें कहा गया है कि पुणे विस्फोट के बाद अब कांग्रेसियों को सुन्नत करा लेनी चाहिए और पाकिस्तान जाकर बस जाना चाहिए. बाल ठाकरे का यह संपादकीय हो सकता है कल फिर मीडिया में चर्चा का विषय बने कि उन्होंने कांग्रेसियों को सुन्नत कराने और पाकिस्तान बसने की सलाह दी है. लेकिन खान विवाद और पुणे विस्फोट के बीच बाल ठाकरे का यह रुख उनकी विचारधारा के अनुसार ही है....फिल्मी समस्या और जुल्मी मीडिया
12 फरवरी की सुबह सात बजे जब नाशिक से मुंबई के लिए निकल रहे थे तो ड्राइवर ने कहा कि "आज मुंबई में थोड़ा लफड़ा-विफड़ा रइंगा, क्योंकि शाहरुख खान का फिल्म आनेवाला है." शिवेसना से शाहरुख की टसन के बीच नाशिक से मुंबई पहुंचते हुए इतना सोचने में कुछ नाजायज नहीं था....माई नेम इज बाल ठाकरे
साल भर पहले की बात है. 26 फरवरी की देर शाम मुंबई के लीलावती अस्पताल में एक बीमार व्यक्ति को रुटीन चेक-अप के नाम पर अस्पताल लाया गया. डाक्टरों ने परीक्षण किया तो उस बीमार व्यक्ति को अस्पताल में दाखिल कर लिया क्योंकि उन्हें फेफड़े में संक्रमण था. संक्रमण सामान्य नहीं था. डाक्टरों ने लंबे समय तक आराम करने की सलाह दे दी. ...मानस और महात्मा के बीच रामकथा का सेतुबंध
पिछली सदी के महानायक और समय बीतने के साथ अवतार के रूप में स्थापित होते जा रहे महात्मा गांधी भारतीय कथा परंपरा के विषय इतनी जल्दी बन जाएंगे, इसकी कल्पना करना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन ऐसा हो गया. महात्मा गांधी अब भारत की कथा परंपरा में शामिल हो गये हैं. इस दिशा में पहली कोशिश की महात्मा गांधी के सचिव रहे महादेव भाई देसाई के बेटे नारायणभाई देसाई ने की....ऐसे कैसे मंहगाई को मारेंगे मनमोहन?
आखिरकार केन्द्र सरकार से नहीं रहा गया. देश में मंहगाई से त्राहि-त्राहि करती जनता के दुख दूर करने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय की पहल पर केन्द्रीय सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुला ही ली. चर्चा तो क्या हुई वह अंदरवाले जाने लेकिन बाहर जो खबरें आ रही हैं वह चौंकानेवाली हैं. ...प्रयाग से पटना के बीच बसे भारत की नयी सिलिकॉन वैली
विभोर श्रीवास्तव को फोन किया था. 24 साल के विभोर उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले से एक साप्ताहिक अखबार निकालते हैं- मिशन नौकरी. खुद मैनेजमेन्ट के छात्र रहे हैं और नौकरी नहीं मिली तो नौकरी दिलाने के अभियान पर निकल पड़े हैं. अखबार की सात हजार प्रति छापते हैं और जहां कभी भी नौकरी हो उसकी सूचना निशुल्क बांटते हैं....जनता के लिए जनता द्वारा जन-पत्रकारिता
इधर हाल के दिनों में विस्फोट से जुड़े लेखकों को हमने एक इमेल किया था. इमेल में मैंने कुछ संक्षिप्त चर्चा पत्रकारिता पर पूंजी के प्रभाव के बारे में की थी. प्रतिउत्तर में कुछ जवाब आये जिसमें एक जवाब महत्वपूर्ण है. पुष्यमित्र पूछते हैं, थोड़ा और विस्तार से समझाइये. ...Author info
