संतोष कुमार
अब देखिए राजनीति का कॉमनवेल्थ
कॉमनवेल्थ घोटाले की कड़ी से कड़ी जुडऩे लगी। पहले दिन बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल निशाने पर रहे, तो दूसरे दिन खेल गांव बनाने वाली कंपनी एम्मार-एमजीएफ का खेल बिगड़ गया। डीडीए के पास जमा 183 करोड़ की बैंक गारंटी जब्ती का नोटिस जारी हो गया। पर अभी तो सिर्फ ठेका लेने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसा। यक्ष प्रश्न, ठेका देने वाले नौकरशाहों-नेताओं ने कितना खाया, इसकी परतें कब उधड़ेंगी? अब ठेकेदारों पर कार्रवाई में तेजी दिखाने से क्या होगा? ठेकेदार तो अपना टेंडर भरते। यह तो देने वाले पर निर्भर, किस कंपनी को ठेका दे। सो सवाल, ठेका देते वक्त नौकरशाहों-नेताओं ने होश क्यों गंवाया?
बताओ भला, सीएजी शीला और कलमाड़ी का क्या बिगाड़ लेगी?
कॉमनवेल्थ के आयोजक सफलता की खुमारी में हैं तो देश की जनता विजयादशमी के जश्न में डूबी है, ऐसे में रामायण के एक प्रसंग का जिक्र लाजिमी होगा। जब भगवान राम लंका पर फतह कर अयोध्या लौटे। राज्याभिषेक हो गया तब सिर्फ एक धोबी की टिप्पणी सुन राम ने अग्नि परीक्षा दे चुकी सीता को तज दिया था। पर कॉमनवेल्थ के आयोजकों पर न जाने कितने आरोप लग चुके, फिर भी किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद बेमानी। पहले भी जांच हुई, रपटे आईं लेकिन उन्हीं शीला दीक्षित ने सीएजी को ठेंगा दिखा दिया जिनके खिलाफ अब कामनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने की बात कही जा रही है....दिल्ली शिफ्ट हुआ कर-नाटक
अब दिल्ली शिफ्ट हो गया कर-नाटक। सोनिया-आडवाणी के घर फैसलाकुन बैठकों का दौर चला। राष्ट्रपति राज के खौफ में बीजेपी ने अपने 105 एमएलए दिल्ली बुला लिए ताकि राष्ट्रपति के सामने परेड करा राजनीतिक मुद्दे को धार दे सके पर तेल की धार देख कांग्रेस ने खुद को फिसलने से बचा लिया। बिहार, झारखंड, गोवा जैसी जल्दबाजी नहीं की, गवर्नर हंसराज भारद्वाज तो बेनकाब हो चुके। सो फैसले पर फौरन मोहर लगाने की तोहमत नहीं ली अलबत्ता बीजेपी को भी बेनकाब करने की रणनीति बनाई।...कर्नाटक में फिर शुरू हुई किट-किट
कर्नाटक में बीजेपी का नाटक फिर शुरू हो गया। दक्षिण भारत में पहली बार किला फतह किया पर कुनबे में ऐसी कलह मची, दो साल में ही किले की चारदीवारी दरकने लगी है। अब बीजेपी के डेढ़ दर्जन एमएलए बगावत पर उतर आए हैं। इन बगावती विधायकों ने गवर्नर को चिट्ठी लिख समर्थन वापसी का एलान कर दिया है तो येदुरप्पा ने भी चार असंतुष्ट मंत्रियों को फौरन केबिनेट से बर्खास्त कर दिया है।...राहुल बाबा की नजर में जैसे सिमी वैसे ही आरएसएस
राहुल गांधी ने नया सुर्रा छोड़ दिया है। प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी और आरएसएस को एक ही तराजू में तोल दिया। दो दिन पहले मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में राहुल ने कांग्रेस में आने वाले लोगों से बेहिचक कह दिया था। आरएसएस और सिमी की विचारधारा छोड़कर आने वालों को ही कांग्रेस में जगह मिलेगी। बुधवार को भोपाल में जब राहुल के बयान का मतलब पूछा गया तो राहुल ने कह दिया- आरएसएस और सिमी दोनों ही कट्टरवादी संगठन। वैचारिक कट्टरता की दृष्टि से इनमें कोई फर्क नहीं।...अब बापू भजन का ही आसरा
ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान। अयोध्या हो या कॉमनवेल्थ, अब बापू भजन ही आसरा। अयोध्या विवाद में गुरुवार को नया अध्याय जुड़ेगा, सो फैसले से पहले शांति की अपील के साथ-साथ सुरक्षा के भी पुख्ता बंदोबस्त हो गए। अब इंतजार तीन जजों की बैंच के फैसले का। कॉमनवेल्थ गेम्स के आगाज से ठीक पहले फैसले ने सरकार के हाथ-पांव फुला रखे, सो बुधवार को होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने बापू भजन सुना शांति की अपील की।...भ्रष्टाचार का रंगा शियार निकला 'शेरा'
मणिशंकर अय्यर के भाग्य से कॉमनवेल्थ का छीका टूट ही गया। यों कॉमनवेल्थ के नाम पर मची राष्ट्रीय लूट का खुलासा शरद यादव दो साल से करते आ रहे पर लोकतंत्र के चारों स्तंभों ने अनसुना कर दिया। अब मणि के बोल से ही सही, परतें उधड़ रहीं तो सुनने वाले दांतों तले उंगली नहीं, पूरा हाथ दबा रहे हैं। ...अमित शाह तो बहाना है, नरेन्द्र मोदी को बचाना है
मानसून सत्र से पहले ही तलवारें खिंच गईं हैं। अगर विपक्ष के तरकश में भारत-पाक वार्ता, महंगाई, भोपाल गैस कांड, रेल दुर्घटना, घाटी की घटना, नक्सलवाद और सरकार में आपसी खींचतान वाले मुद्दों के तीर हैं तो सत्तापक्ष की झोली में हिंदू आतंकवाद, कर्नाटक में अवैध खनन, बिहार का बवंडर और अब बीजेपी को अलग-थलग करने का सबसे लजीज मुद्दा गुजरात आ गया। सो खलबलाई बीजेपी ने शुक्रवार को पीएम के घर का 'लजीज' खाना ठुकरा दिया।...राजनीति को गाली बनाते गडकरी
'बदनाम होंगे, तो क्या नाम न होगा।' वाजपेयी के बाद की बीजेपी कुछ साल से इसी फार्मूले पर चल रही है। अब नितिन गडकरी भी उसी परंपरा के वाहक। सो अध्यक्षी संभाले छह महीने ही बीते। पर जुबान ऐसी चली, अब तक छह विवाद भी खाते में जोड़ लिए। पहला विवाद तो कुर्सी संभालने के 25वें दिन ही हो गया। जब अप्रवासियों को महानगरों की समस्या बता गए। तो बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी जेडीयू ने गडकरी का पुतला फूंक सलामी दी थी।...जसवंत के जिन्ना भी अब बीजेपी को मंजूर
सुबह का भूला शाम को घर आ जाए, तो उसे भूला नहीं कहते। पर झारखंड में बीजेपी 27 दिन बाद लौटे। बिहार में साढ़े चार साल बाद होश में आए। जसवंत सिंह की किताब समझने में दस महीने चार दिन लगा दे। तो उसे आप भूला कहेंगे या कुछ और। अब आप चाहे जो भी कहें, अपने जसवंत सिंह तो बीजेपी में लौट आए। बीजेपी दफ्तर में खूब ढोल-नगाड़े बजे। आडवाणी-गडकरी-सुषमा ने अगवानी की। पर जैसे जसवंत की दलील सुने बिना बीजेपी से बाहर निकाला वैसे ही अब बीजेपी वापसी पर कोई दलील नहीं दे पा रही।...Author info
