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तस्लीमा, रुश्दी और फिदा हुसैन

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जब कोई चित्रकार कोई चित्र बनाता है तो उसके दिमाग में यह तो होता ही होगा कि वह चित्र के माध्यम के क्या कहना चाहते है। इस सारे विवाद के बाद भी सम्भवतः हुसैन से किसी ने यह सवाल नहीं किया कि आखिर जिस तरह की चित्रकारी वे करते हैं, उसके पीछे उनकी क्या भावना रहती है ? विवाद के दौरान हुसैन की तरफ से भी आज तक यह नहीं कहा गया कि जिन विवादित पेंटिंगों पर बवाल किया जा रहा है, उन्हें बनाने के पीछे उनकी अपनी क्या सोच रही थी ?

मुझे पेंटिंग समझ में नहीं आती हैं। आड़ी-तिरछी लकीरों के बीच चित्रकार क्या कहना चाहता है, इसे आज तक नहीं समझ सका हूं। और जो लोग, मकबूल फिदा हुसैन पर रोज तीर चला रहे हैं, उनमें से अधिकतर की हालत भी शायद मेरी जैसी ही हो। सब कुछ सही चल रहा था। हुसैन की पेंटिंग महंगी से महंगी बिक रही थी। लेकिन 'विचार मीमांसा' नाम की हद दर्जे की एक घटिया पत्रिका ने एक बार कवर स्टोरी छापी थी, 'यह चित्रकार है या कसाई' बस इस स्टोरी के छपने के बाद फिदा हुसैन द्वारा खींची गईं आड़ी-तिरछी लकीरों में कुछ लोगों को भारत माता की नंगी तस्वीर दिखाई दे गयी तो कुछ लोगों को मां सरस्वती का नग्न अक्स नजर आ गया था। उसके बाद से फिदा हुसैन हिन्दूवादी संगठनों के निशाने पर आ गए थे। हालांकि यही वे लोग हैं, जो तस्लीमा नसरीन और सलमान रुश्दी पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के हमले को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला मानते थे। यही लोग तस्लीमा नसरीन को भारत की नागरिकता दिलाने की पुरजोर मांग करते थे। लेकिन इसके विपरीत यही हिन्दूवादी संगठन एमएफ हुसैन की कलाकृतियों को आग के हवाले करके उन पर ताबड़तोड़ मुकदमे करने से भी बाज नहीं आए थे। यहां पर उनके लिए अभिव्यक्ति की आजादी कोई मायने नहीं रखती थी। सवाल यह है कि तस्लीमा का समर्थन और हुसैन का विरोध क्यों?

क्या तस्लीमा का समर्थन इसलिए किया जाता है, क्योंकि वे इस्लाम और मुसलमानों को कठघरे में खड़ा करती रही हैं। क्या एमएफ हुसैन का विरोध इसलिए, क्योंकि हिन्दूवादी संगठनों को लगता है कि हुसैन हिन्दू देवी-देवताओं की नग्न तस्वीरें अपने कैनवास पर उकेर रहे हैं। बात अगर अभिव्यक्ति की आजादी की है तो तस्लीमा के साथ ही हुसैन का समर्थन भी किया जाना चाहिए। दरअसल, हिन्दूवादी संगठन हर उस आदमी को अपना स्वाभाविक मित्र मान लेते हैं, जो इस्लाम पर प्रहार करता है। इसीलिए वे तस्लीमा नसरीन, सलमान रुश्दी और डेनमार्क के कार्टूनिस्ट की हिमायत में खड़े नजर आते हैं और इन्हें अभिव्यक्ति की आजादी की चिंता सताने लगती है। 

एमएफ हुसैन की कतर की नागरिकता लेने के बाद जो बहस फिदा हुसैन को लेकर चलाई जा रही है, उसमें कुछ बातें ऐसी हैं, जिन्हें पढ़कर हंसी आती है। मसलन, इस बात को बार-बार उठाया जा रहा है कि हुसैन में हिम्मत है तो हजरत मौहम्मद साहब की तस्वीर बना कर दिखाएं। इस तर्क पर हंसी आती है। सब जानते हैं कि इस्लाम में तस्वीर बनाने की मनाही है, पैगम्बरों की तो किसी भी सूरत में तस्वीर नहीं बनायी जा सकती। इसके पीछे शायद कारण यह है कि इस्लाम ने बुतपरस्ती को सख्ती से मना किया है। लेकिन हिन्दू धर्म में तस्वीर बनाना न केवल जायज है, बल्कि सभी देवी देवताओं की तस्वीरें, मौजूद हैं, जिनके सामने खड़े होकर पूजा की जाती है। ऐसे में यह कहना कि हुसैन किसी पैगम्बर की तस्वीर बनाकर दिखाएं, कुतर्क के अलावा कुछ नहीं है। चलो मान लिया यदि हुसैन ऐसा कर सकें तो क्या हुसैन के विरोधी उनके समर्थक हो जाएंगे ? क्या हुसैन का सरस्वती को नंगा चित्र बनाना जायज ठहरा दिया जाएगा ?

मां सरस्वती का कथित चित्र उन्होंने क्या सोच कर बनाया था? इस प्रकार का कोई स्पष्टीकरण आ जाता तो शायद इतना बखेड़ा खड़ा नहीं होता। मैं यहां यह भी स्पष्ट कर दूं कि मैं न तो एमएफ हुसैन का समर्थक हूं और न ही तस्लीमा नसरीन का। क्योंकि मेरा मानना रहा है कि कला के नाम पर किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना सही बात नहीं है। भारत बहुधर्मी और विविधताओं से भरा देश है। यहां धर्म और आस्था के नाम दंगा-फसाद आम बात है। जिस देश में मात्र अफवाह से पूरे देश में गणेश जी दूध पीने लगते हों, दुल्हेंडी के दिन दोबारा से होली का पूजन किया जाता हो, किसी जीव के विचित्र बच्चा पैदा होने पर उसे पूजा जाने लगता हो, वहां पर धार्मिक प्रतीकों से छेड़छाड़ बवाल का कारण तो बनता ही है। और फिर अफवाह को आग में तब्दील करने वाले कट्टरपंथियों की पूरी फौज भी तो मौजूद है। एक बात और। तस्लीमा नसरीन, सलमान रुश्दी और एमएफ हुसैन जैसे कलाकारों पर विवाद इनकी मार्कीट वैल्यू बढ़ाने में मदद करता है। तस्लीमा नसरीन के 'लज्जा' और सलमान रुश्दी के 'द सैटेनिक वर्सेज' पर कट्टपंथी बवाल नहीं करते तो ये दोनों कृतियां कूड़े में फेंकने लायक हैं। जरा बताइए तो इन दोनों का और कौनसी किताब कितने लोगों को याद है, और कितने लोगों ने पढ़ी है ?

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kamaal Hussan on 09 March, 2010 20:28;38
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जनाब सलीम अख्तर साहब,
आप जैसे आदमी को मकबूल जैसे सनकी की तरफदारी करते देखकर ताज्जुब हुआ, हुसैन जैसे लोग ही है जो पता नहीं किस नशे में, या चन्द पैसो के लालच में या फिर कट्टर पंथियों का हीरो बना ने की चाहत में हिंदुस्तान की सरजमीं पर फैली हुई अमन की हवाओं को लू में तब्दील कर देते है...

इन्ही मकबूल साहब की फिल्म मीनाक्षी का जब चंद कट्टर पंथियों ने कोलकाता में विरोध किया तो इन्होने माफ़ी मांगने में एक लम्हा नहीं गवाया और सीन भी फिल्म से काट दिया, लेकिन अगर कोई भारत को माता मानता है, दुर्गा को देवी मानता है , सरस्वती की पूजा करता है तो इन्हे नंगी और हद दर्जे की घृणा पैदा करने वाली तस्वीरे बनाने मेमाजा आता है...इनकी एक तस्वीर देखकर तो मुझे लगा की इस कुंठित दिमाग में क्या रहा होगा..इसकी तस्वीर में दुर्गा , शेर के साथ..........आगे आप समझदार है, हुसैन को ही नहीं हर उस इंसान को मुल्क की सरहदों से बहार फेक देना चैये जो इस तरह की हरकते करे..

चाहे वो हिन्दू हो, मुसलमान हो, सिक्ख या issai
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भारतीय नागरिक on 09 March, 2010 21:13;06
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सिद्दीकी साहब को कमाल साहब ने जबाव दे ही दिया. मैं फिर कहूंगा कि अगर भारत के नक्शे को सिद्दीकी साहब नहीं पहचानते तो फिर .............
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kUMAR DEV on 09 March, 2010 21:41;58
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घटिया मानसिकता और सेकुलरवादी सोंच
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Vicky G on 09 March, 2010 22:13;14
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सलीम जी, आपका तर्क ही खोखला है. तस्लीमा और हुसैन में कोई तुलना ही नहीं. तस्लीमा ने मज़हबी कठमुल्लापन को नंगा किया था, जबकि हुसैन ने धार्मिक और राष्ट्रीय प्रतीकों को ही नंगा कर दिया है. न सिर्फ़ नग्न बल्कि अश्लील चित्रण किया है. चलिए, हिंदुओं के देवी-देवताओं को छॊड दीजिए, क्या मकबूल फ़िदा हुसैन का "प्रसिद्ध" चित्र "रेप ओफ़ यूरोप" याद है आपको, जिसमें "मैक" नाम का "बुल" (सांड) यानी मकबूल माधुरी दीक्षित का बलात्कार करते हुए दिखाया गया है. यह चित्र निकला है हुसैन साहब की मानसिकता और उनकी कूची से.
आप कहते हैं कि इसलाम में चित्र बनाने की मनाही है. सही है. तो क्या इसलाम में दूसरे धर्म के लोगों से संबंधित नग्न और वाहियात चित्र बनाने की छूट है? बात-बात पर फ़तवा देने वाले किसी भी मुल्ला ने कभी फ़तवा जारी किया कि चित्र बनाने वाले हुसैन को इसलाम से खारिज किया जाता है?
और जनाब, हुसैन वाले मामले में आप तस्लीमा को क्यों घसीट रहे हैं? आप भले ही हिंदुओं के कट्टर संगठनों को कोस लीजिए, पर यह मत भूलिए कि हुसैन ने करोडों आम हिंदुओं की भावनाओं को भी ठेस पहुंचाई है. तो, सलीम साहब, एक पल के लिए तस्लीमा का ख्याल निकालकर आप सिर्फ़ इतना बता दीजिए कि हुसैन के विवादास्पद चित्रों पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है. चिंता मत कीजिए, आपकी छवि तो एक धर्मांध, दोमुंही ज़बान वाले कठमुल्ला की बन ही चुकी है (भले ही आप अपनी प्रोफ़ाइल में कुछ भी लिख लें), इसलिए खुलकर अपनी राय रखिए. क्या पता हिंदुओं की ऐसी-तैसी करने के एवज में आपको अगले गणतंत्र दिवस पर पद्म विभूषण मिल जाए. शुभकामनाएं.
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ghakki on 09 March, 2010 23:13;42
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"vivek g" ने जो बाते मैं कहना चाहता था वो सब कह ही दी बिलकुल सही टिपण्णी करी है इस लेख पर बस अंत की तीन पंक्तियों से मैं सहमत नहीं हूँ , ये शायद उनका लेखक के प्रति गुस्सा है जो एसा लिख दिया "सलीम जी ने जिस देप्लोमटिक तरीके से लिका उसी देप्लोमटिक तरीके से उनका जवाब देना चयेहे था जो की "विवेक" ने शुरू में दे देय था|रही बात सेकुलर होने की तो बड़ा कठिन काम है पूरी तरह से कोए भी सेकुलर नहीं होता
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ghakki on 09 March, 2010 23:35;36
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और हा मुहम्नद साहब केचित्र से लोगों का मतलब होता है की हुसैन अपने धर्म के बारे में भी कोच विवादस्पद कर के दिखलाते तो लगता की ये कलाकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है सारी स्वतंत्रता दूसरो के धर्म में ही दिखलाई पड़ती है और क्या चूंके हिन्दू धर्मं में भगवन का चित्र बनाना मना नहीं है तो उसे गलत तरीके से दिखलाओ ये भी कुतर्क है| और बकौल "सलीम " सारी अफवाहे हिन्दू धर्मं की ही बतलाई गए है अरे कुछ अपने बारे में भी लिख देते
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abhishek on 09 March, 2010 23:51;59
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salim sahaab aap is per kya kahege

http://nirmal-anand.blogspot.com/2010/03/blog-post_08.html


मेरा मानना है कि कला के नाम पर किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना सही बात नहीं है।
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Vikram on 10 March, 2010 08:10;50
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Salim Saaheb, please read this recent editorial.

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5664125.cms
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KS on 10 March, 2010 11:44;39
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MAIN TO SAMAJH THA KI AAP BAHUT UDAARVAADI HOGE. AAP BHI PAKKE KATHMULLE NIKLE JO HUSSAIN BACCHAAO KARNE KE CHAKKAR ME TASLEEMA KA HAMLAA KARTE HAI. MAIN KAHTA HOO ISLAAM KAB SUDHEREGAA. HINDU DHARAM KI TARAH ISLAAM ME ITNI AAZADI KAB AAYEGI ?
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R.K.GUPTA on 10 March, 2010 15:31;40
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ye to bewkufi ki inteha hai.
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image सलीम अख्तर देश के अनेक समाचार-पत्रों में सामायिक मुद्दों पर लेख आदि लिखने के साथ ही टेक्निकल पुस्तकों का स्वतन्त्र लेखन। लेखन या पत्रकारिता का कोई कोर्स नहीं किया। लिखने की शुरुआत 1984 से दिल्ली से प्रकाशित होने वाले 'हिन्दुस्तान' और 'नवभारत टाइम्स' में सम्पादक के नाम पत्रों से की थी। हौसला बढ़ा तो सम्पादकीय पेज पर छपने के लिए लिखना शुरु किया। मशहूर पत्रकार स्व0 उदयन शर्मा मेरे आइडियल रहे हैं। इसलिए कलम का इस्तेमाल हमेशा ही फिरकापरस्त ताकतों के खिलाफ और दबे-कुचले लोगों के पक्ष में चली है। जनवादी लेखक संघ से भी जुड़ा हुआ हूँ। संपर्क: saleem_iect@yahoo.co.in
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