पप्पू प्वाइंट पर अटक गई बिहार कांग्रेस की सूई
राहुल गांधी की फार्मूला कार पर बैठकर फर्श से अर्श पर पहुंचने का सपना देख रही बिहार कांग्रेस की मुसीबत यह है कि वह हर बार एक न एक ऐसी अंदरूनी मुसीबत में उलझ जाती है कि उसे बाहर ध्यान देने का वक्त ही नहीं मिल पाता। फिलहाल साधु यादव से ज्यादा बहुचर्चित बाहुबली राजनेता पप्पू यादव उसके लिए गले की फांस बने हुए हैं।
उनकी पत्नी पूर्व सांसद रंजीत रंजन उन्हें हर कीमत पर पार्टी की सदस्यता दिलाना चाहती है, मगर पार्टी के नेता हैं कि ऐसे बिदक रहे हैं जैसे उनके आने से पार्टी का तरोताजा धुला-धुलाया दामन दाग-दाग हो जाएगा। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ चुकीं और पार्टी में अपनी मजबूत पकड़ बना चुकीं पूर्व सांसद रंजीत रंजन कहती हैं कि क्या पार्टी में अभी दागी नेता नहीं हैं, जो पप्पूजी के चरित्र को लेकर इतने सवाल खड़े किए जा रहे हैं। उनका इशारा साफ-साफ बिहार कांग्रेस के प्रभारी जगदीश टाइटलर की ओर है जो सिख दंगों का आरोप झेल रहे हैं। वहीं उनके समर्थक कहते हैं कि सवाल दागी और साफ-सुथरी छवि का नहीं, सवाल जनाधार का है। दरअसल पार्टी की बिहार इकाई पर कुछ ऐसे लोगों ने कब्जा कर लिया है जिनका कोई जनाधार नहीं है, ऐसे नेता खुद तो पार्टी की सफलता में कोई योगदान नहीं दे पाते जो लोग दे सकते हैं उनके पार्टी में आने में वे बाधा खड़ी करते हैं। समर्थक यह कहते हुए पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अनिल शर्मा पर प्रहार करते हैं, जो पप्पू के पार्टी में आने में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। दरअसल लोकसभा चुनाव के दौरान जब कांग्रेस ने राजद और लोजपा से नाता तोड़कर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था उस वक्त उसे उम्मीदवार ही नहीं मिल रहे थे।
ऐसे में उस वक्त जो भी सामने आया पार्टी ने उसे टिकट थमा दिया। न योग्यता का ख्याल रखा और न ही छवि का। ऐसे में लालू प्रसाद के बिगड़ैल साले साधू यादव, राजद के रमई राम, पप्पू की पत्नी रंजीत रंजन जैसे नेताओं को टिकट मिल गया। पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र में पप्पू की माताश्री को पार्टी ने समर्थन दे दिया, वह निर्दलीय रूप से मैदान में थीं। उस वक्त पप्पू के कुनबे ने सोचा कि कांग्रेस पर उनका कब्जा हो गया है, मगर अब कांग्रेस भूलसुधार करते हुए पप्पू और साधू टाइप नेताओं से बचना चाहती है। साधू तो अपने बहनोई के पास लौट गए मगर पप्पू के मामले में यह इतना आसान साबित नहीं हो रहा। वस्तुत: पप्पू को पार्टी में शामिल किया जाए या नहीं इस पर फैसला लेना पार्टी के लिए इतना आसान नहीं। क्योंकि पप्पू भले ही कई आपराधिक मामलों में आकंठ फंसे हों, मगर राज्य के यादवों का एक बड़ा वर्ग आज भी उनका कट्टर समर्थक है।
लालू प्रसाद के लगातार पतन के बाद यादवों के लिए सत्ता में बने रहने की एक मात्र उम्मीद पप्पू यादव का कांग्रेस में शामिल होकर पार्टी में निर्णायक भूमिका निभाना है। ऐसे में अगर कांग्रेस पप्पू को पार्टी में शामिल कर लेती है तो एक झटके में यादवों का एकमुश्त वोट उन्हें हासिल हो जाएगा, मगर इस फैसले की उन्हें भारी कीमत चुकानी होगी। राहुल गांधी जिस तरह पार्टी में युवा और स्वच्छ छवि के लोगों को शामिल कर रहे हैं उस प्रयास को इस कदम से करारा झटका लगेगा। इतना ही नहीं जदयू-भाजपा गठबंधन को भी बैठे-बिठाए पार्टी के खिलाफ एक बड़ा मुद्दा मिल जाएगा। वहीं अगर पप्पू के इस प्रस्ताव को नकार देती है तो पूरे राज्य के यादव कांग्रेस विरोधी हो जाएंगे। ऐसे में उसे इस विधानसभा चुनाव में भी तीसरे स्थान से ही संतोष करना पड़ेगा। ऐसे में ऐन विधानसभा चुनाव के पहले पप्पू के इस दांव के आगे कांग्रेस असहाय नजर आ रही है। उसकी गति उस सांप की तरह हो गई है जिसने छुछंदर को गलती से पकड़ लिया है, अब वह न तो उसे निगल पा रही है और न ही उलगने की हिम्मत जुटा पा रही है।
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