पाठशाला में राजनीति की पढ़ाई
रविवार को दिल्ली में गोविन्दाचार्य के घर पर पूर्व नियत समय के अनुसार 19 छात्र, एक शिक्षक और तीन सहयोगी उनसे मिलने के लिए आये थे. ये कोई सामान्य छात्र नहीं थे. ये राजनीति के छात्र थे. राजनीति के ऐसे छात्र जो पाठशाला में राजनीति और समाजसेवा की पढ़ाई पढ़ रहे हैं. कंपनीराज के तहत विकास का पाठ पढ़ रहे भारत के ऐसे नौजवान छात्र जो छात्र राजनीति करके राजनीति की पढाई नहीं पढ़ते बल्कि सीधे किताब ही राजनीति की पढ़ते हैं और परीक्षा भी उसी की देते हैं.
पुणे के एमआईटी ने जब यह कोर्स शुरू किया था तो चर्चित चुनाव आयुक्त टी एन शेषन को अपना प्रमुख मार्गदर्शक नियुक्त किया था. वे आज भी बतौर मार्गदर्शक काम कर रहे हैं. जिस बैच के अधिकांश छात्रों से रविवार को परिचय हुआ वे उसी 26 छात्रों में से थे जो वर्तमान समय में एमआईटी में राजनीति की पढ़ाई पढ़ रहे हैं. अब राजनीति की पढ़ाई पर ज्यादा आलोचना न हो इसलिए इसे स्कूल आफ गवर्नेन्स का नाम दे दिया गया है. शायद ऐसा इसलिए किया गया है कि आगे चलकर इन्हीं छात्रों में से कुछ को देश समाज को "गवर्न" करने का मौका मिल जाए? टाटा टी के जागो रे ने टीवी पर विज्ञापन देकर पहले ही देश के फटे पैण्ट फैशन वाले नौजवानों में लोकतंत्र की भावना को भरपूर भरने की कोशिश कर ही दी है. अपनी कोशिश में वह नेता को पूछता है कि आपकी क्वालिफिकेशन क्या है? क्वालिफिकेशन का मतलब डिग्री. वर्तमान शिक्षा प्रणाली हमें शिक्षित करती है कि अगर आपके पास डिग्री है तो आपके पास लूट का वैध लाइसेंस है. मसलन, उदाहरण के तौर पर सुनिये. बीते लोकसभा चुनाव में पैसे लेकर पीआर कंपनियों ने बड़े दलों के लिए प्रचार प्रसार का काम किया. इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है. यह तो पीआर कंपनी का प्रोफेशन है और वह अपना काम कर रही है. आप कल्पना करिए कि यही काम अगर कोई कार्यकर्ता करे तो फिर क्या कहा जाएगा? कार्यकर्ता भ्रष्ट हो गये हैं. राजनीति निकम्मी हो गयी है. राजनीतिज्ञ तो किसी काम के बचे ही नहीं है. बूथ पर काम करनेवाले कार्यकर्ता अगर दारू की एक बोतल और दो पांच सौ रूपया नकद ले लें लोकतंत्र मटियामेट होने लगता है और कोई पीआर एजंसी 120 करोड़ का ठेका लेकर किसी राष्ट्रीय दल का प्रचार अभियान संचालित कर दे तो वह प्रोफेशनलिज्म हो जाता है जिससे लोकतंत्र की जड़े चार फुट और गहरे धंस जाती हैं. नयी शिक्षा व्यवस्था और चटोरी समझ हमें यही समझा रही है.
एमआईटी के छात्रों को भी दिल्ली लाया गया होगा यही सोचकर कि चलो संसद देख लो. राजनीति के उन गलियों चौराहों को देख लो जिसकी किताबें यहां पुणे में बांच रहे हो. इन 16 लड़कों और तीन लड़कियों में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और नागालैण्ड के छात्र शामिल थे. सब कोई न कोई पढ़ाई पढ़कर स्कूल आफ गवर्नेन्स में गवर्न करने का प्रशिक्षण लेने आये हैं. गोविन्दाचार्य उनको समझा रहे थे- ज्ञान विहीन क्रिया निरंकुश होती है और क्रिया विहीन ज्ञान परम मद. ये दोनों ही परिस्थितियां अच्छी नहीं होती है. इसलिए राजनीति करनेवाले व्यक्ति को ज्ञानयुक्त क्रिया में लीन रहना चाहिए. फिर नेता और जनता के संबंधों पर उन्होंने कहा कि यह बहुत प्रगाढ़ होता है. नेता वही होता है जो जनता की भावना को समझता है. गोविन्द जी छात्रों को उपदेश कर रहे थे- "आज राजनीति में ऐसे दलाल/बिचौलिये प्रभावी हो गये हैं जो परम आत्मविश्वास के साथ जनता को ठगते हैं. उन्हें जनता को ठगने की अपनी ताकत पर असीम विश्वास होता है लेकिन जनता की ताकत पर उन्हें कोई विश्वास नहीं है." अगर गोविन्द जी सही बोल रहे हैं तो जागो रे चाय का लोकतंत्र सशक्तिकरण संदेश का क्या हश्र होगा? जिसे गोविन्द जी दलाली और ठगी समझ रहे हैं असल में वही तो प्रोफेशनलिज्म है जिसे इन लंगोटधारी, गंवई राजनीतिज्ञों को सीखना है. यह शिक्षा तो आधुनिक शिक्षा प्रणाली की डिग्री से हासिल होती है. ठगी, चोरी, डकैती को व्यावसायिक रूप कैसे प्रदान किया जाए यह तो कोई आईआईएम ही सिखाता है. अब गंवई नेता तो ठहरे गंवार. उन्हें प्रशंसा तो मिलने से रही. टाटा टी रोज उनका मखौल जरूर उड़ा देती है.
गोविन्द जी उन छात्रों को संबोधित कर रहे थे कि राजनीति में बदलाव आ रहा है. हो सकता है उनके कहने का संदर्भ कुछ और हो लेकिन सच्चाई यही है कि राजनीति में बदलाव आ रहा है. राजनीति की डिग्री लेनेवाले ये छात्र उसी बदली हुई राजनीति का हिस्सा बनेंगे और राजनीति को व्यापार की तर्ज पर एक संगठित स्वरूप प्रदान करेंगे. यह खतरनाक प्रवृत्ति आगे बढ़ी तो राजनीतिक दलों में प्रवेश से पहले किसी संस्थान की डिग्री मांगी जाएगी कि बताईये तो भला आपने किस स्कूल से राजनीति करने की डिग्री ली है? ठीक वैसे ही जैसे आज हर कारपोरेट मीडिया हाउस नौकरी पर भर्ती करने से पहले पूछता है कि भैया किस पत्रकारिता संस्थान से पढ़कर आये हो. डिग्री है तो बात करो नहीं तो रास्ता नापो. डिग्री ही पत्रकारिता के प्रशिक्षण का सबसे मजबूत आधार हो जाए तो पत्रकारिता कहां बचेगी? संपादक प्रतिष्ठान और परंपरा की पत्रकारिता सिर्फ सेमिनार की चिंता का विषय होकर रह जाएंगे. ऐसा ही राजनीति में होगा. रट्टू तोते की तरह कुछ शब्द रटकर जो राजनीति की डिग्री हासिल करेंगे क्या वे संवेदना के स्तर पर कभी उस अंतिम आदमी के भाव को परख पायेंगे जिसका निर्धारण लोग अपनी सुविधा के हिसाब से कर लेते हैं?
फिर डिग्री और नौकरी का अन्योन्याश्रित संबंध होता है. हम डिग्री लेते ही इसलिए हैं ताकि हमें नौकरी मिल जाए. तो क्या अब भाजपा कांग्रेस और लालू मुलायम के पार्टी कार्यालयों के अंदर एचआर डिपार्टमेन्ट की भी स्थापना की जाएगी जो रिक्रूटमेन्ट का काम देखेगी? अगर डिग्रीधारियों को नौकरी नहीं मिली तो सरकार पर बेरोजगार बढ़ने का दबाव बढ़ेगा और राजनीति की डिग्री लेनेवाले राजनीतिज्ञ सरकार के खिलाफ एक अनोखा आंदोलन शुरू कर सकते हैं कि हम बेरोजगार हैं हमारी नौकरी सुनिश्चित करो. क्या इसके बाद सरकार राजनीतिक दलों पर सख्ती बरतेगी कि आपके यहां रिक्रूटमेन्ट नहीं हो रहे हैं, कुछ करिए. सरकार पर नौकरी देने का दबाव बढ़ता जा रहा है. फिर सैलेरी का संकट. अब अगर नौकरी है, सैलेरी है तो फिर टाईमिंग भी तय होगी. सुबह 10 से 5 राजनीति होगी उसके बाद छुट्टी. अगले दिन फिर कुर्ता पाजामा पहनकर राजनीति शुरू होगी और किसी डिग्रीधारी राजनीतिज्ञ की नौकरी का यही रूटीन बन जाएगा. अगर काम ज्यादा तो राजनीति की नौकरी करनेवाले डिग्रीधारी नेता ओवरटाईम की मांग करेंगे. यह सब देख हमारे श्रमिक संगठन उनके लिए अपनी अपनी यूनिट की भी स्थापना कर सकते हैं जो डिग्रीधारी राजनीतिज्ञों के हित की सुरक्षा करेंगे.
आपको लगता कि यह सब मजाक है? मैं भी मजाक मान लेता लेकिन अगर आज राजनीति की डिग्री बांटी जा रही है तो कल यह सब होना ही है. राजेन्द्र माथुर जानते थे क्या कि कोई दिन ऐसा भी आयेगा जब पत्रकारिता का प्रशिक्षण किसी अखबार के संपादकीय विभाग की बजाय फीस बटोरू मीडिया संस्थान में प्रदान किया जाएगा? अगर आज पत्रकारिता में ऐसा हो रहा है तो कल राजनीति में नहीं होगा, इसकी क्या गारंटी है?
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