भूखा नंगा बिहार और मददगार मोदी
हालांकि ओछी हरकतों के लिए भाजपा नेता मशहूर है पर नरेंद्र मोदी के विज्ञापनों ने इस पर मुहर लगा दी है। पटना में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक से पहले बड़े कटआउट और अखबारों में जारी विज्ञापनों ने यह बता दिया है कि भाजपा नेता बिना कुछ किए प्रचार के भारी भूखे है। सवाल यह नहीं है कि इन विज्ञापनों पर नितीश कुमार की क्या प्रतिक्रिया है, सवाल यह है कि मोदी ने इन विज्ञापनों के जरिए यह बताने की कोशिश की है कि अगर गुजरात नहीं होता तो शायद बिहार की जनता पूरी तरह से बाढ़ में बह ही गई होती।
हालांकि नीतीश कुमार ने प्रतिक्रिया स्वरुप जो कुछ किया है वो भी उनका ओछापन है। न इसमें सौम्यता है, न शीलता है। नितीश ने भी पूरी तरह से वोट बैंक की राजनीति है। पर नरेंद्र मोदी के विज्ञापन ने पूरे बिहार का ही नहीं, पूरे गुजरात और भारतीय परंपरा का अपमान किया है। जरा पहले विज्ञापन का लब्बोलबाव देखे। विज्ञापन में कहा गया है कि “संकट की घड़ी में गुजरात हमेशा बिहार के साथ खड़ा रहा। कोसी नदी में 2008 में आई बाढ़ के दौरान भी गुजरात ने बिहार को सर्वाधिक मदद दी।“
नरेंद्र मोदी ने विज्ञापन में बात तो सही कही है। लेकिन विज्ञापन और कटआउट के माध्यम से लाभ होने का मकसद काफी ओछा है। नरेंद्र मोदी ने ठीक कहा है। संकट की घड़ी में गुजरात हमेशा बिहार के साथ खड़ा रहा। यह भी बात सही कि बाढ़ के बाद राहत कार्य मदद में गुजरात ने पूरी मदद बिहार की जनता को दी। लेकिन नरेंद्र मोदी ने यह क्यों नहीं बताया कि संकट की घड़ी में पहले भी गुजराती बिहार के साथ खड़े रहे। गुजरात नरेंद्र मोदी के समय में पहली बार बिहार के साथ तो नहीं खड़ा, उससे पहले भी खड़ा। याद करें चंपारण मूवमेंट को। तिनकठिया प्रणाली से परेशान चंपारण के किसानों को मुक्ति एक गुजराती महात्मा गांधी ने दिलवायी थी। नील की खेती करने वाले चंपारण के लोग ब्रिटिश तिनकठिया प्रणाली से परेशान थे। चंपारण के राजकुमार शुक्ल महात्मा गांधी के पास गए। उनसे आग्रह किया कि वे एक बार आकर चंपारण के किसानों की समस्या सुने। महात्मा गांधी का भारतीय जन आंदोलन में यह पहली सीधी भागीदारी थी। इससे पहले वे अहमदाबाद के मजदूरों के आंदोलन में भाग ले चुके थे। उन्होंने वहां जाकर किसानों की समस्या सुनी। ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। महात्मा गांधी को जहर देने की कोशिश भी की गई। लेकिन बच गए। भारतीय परिवेश में महात्मा गांधी के आंदोलन की क्षमता की पहचान भी यहीं से शुरु हुई। क्योंकि इससे पहले गांधी जी ने अपना आंदोलन दक्षिण अफ्रीका में किया था। लेकिन क्या कभी गांधी जी ने विज्ञापनों के जरिए यह ओछी हरकत की जो आज नरेंद्र मोदी ने की। क्या गांधी जी ने कभी देश की आम जनता के बीच कहा कि बिहार के चंपारण के किसानों को उन्होंने बहुत भारी मदद की। नरेंद्र मोदी यह न समझे कि गुजरात नरेंद्र मोदी के कारण जाना जाता है। गुजरात तो पूरे विश्व में महात्मा गांधी के कारण जाना जाता है। दिलचस्प बात है कि एक गुजराती होते हुए महात्मा गांधी ने राष्ट्रवाद और वसुधैव कुटुंबकम की बात की। लेकिन नरेंद्र मोदी एक राष्ट्रवादी पार्टी के राष्ट्रवादी नेता होने का दावा करते हुए भी गुजरातवाद कर रहे है।
बिहार गरीब रहा है, गुजरात समृद्व रहा है। पर इसमें नरेंद्र मोदी का क्या योगदान है। अगर अमीर गुजरात ने गरीब बिहार को बाढ़ राहत में मदद कर दी तो यह कोई अहसान तो नहीं था। पाकिस्तान में आए भूकंप पर भारत ने मदद की पेशकश की थी। भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भूकंप आने पर मदद की पेशकश की थी जो भारत का हिस्सा था और अवैद्य रुप से पाकिस्तान ने उसे हड़प रखा है। पर मदद की पेशकश कोई अहसान नहीं, मानवीय संवेदना थी। इस बात को नरेंद्र मोदी समझे कि गुजरात अमीर रहा है तो इसलिए नहीं कि नरेंद्र मोदी वहां के मुख्यमंत्री है। गुजरात तो दसवीं शताब्दी में भी अमीर था। गुजरात की अमीरी के चर्चे जब मुसलमान आक्रमणकारियों के बीच पहुंचा तो महमूद गजनवी सोमनाथ मंदिर तक पहुंच गया। बहुमूल्य हीरे, जवाहरात लूटकर ले गया। यह सच्चाई है कि गुजरातियों ने विदेशों में अमीरी के झंडे गाड़े। विदेशों में प्रवासी भारतीयों के रुप में पंजाबियों और गुजरातियों ने ही झंडे गाड़े है। पर पंजाबी जहां विदेशों में छोटे उधमी बने, वही गुजराती बड़े उधमी बन गए। पर इसमे नरेंद्र भाई मोदी का क्या योगदान है। गुजराती कोई दस साल में तो बड़े उधमी विदेशों में बने नहीं। नरेंद्र मोदी तो दस साल से ही गुजरात के मुख्यमंत्री है। फिर अगर इस देश में धीरू भाई अंबानी ने अपना झंडा गाड़ा, तो नरेंद्र मोदी की मदद तो नहीं ली। अंबानी ने टाटा और बीड़ला को पीछे किया तो अपने दम पर। तो फिर जब आम गुजराती बिहार की मदद को लेकर कोई ओछी हरकत नहीं कर रहा है, तो फिर नरेंद्र मोदी ने यह हरकत क्यों की।
नरेंद्र मोदी से कुछ सवाल है। निश्चित तौर पर बिहार के बाढ़ राहत कार्यक्रम में गुजरात ने काफी मदद की। लेकिन नरेंद्र मोदी बिहार के उन देनों की चर्चा भी करें जो बिहार ने गुजरात ही नहीं पूरे विश्व को दिए। गुजरात जैन धर्म का केंद्र रहा है। आज भी ज्यादातर गुजराती जैन धर्म को पोषक है, जैन धर्म के सिद्वांतों का पालन करते है, जिसमें अहिंसा मुख्य है। हालांकि नरेंद्र मोदी गुजरात ने इस परंपरा को खत्म करने की कोशिश की, लेकिन मोदी को यह भी पता होना चाहिए कि जैन धर्म की उत्पति ही बिहार में हुई। भगवान महावीर का जन्म बिहार में हुआ था। जैन धर्म का शुरूआती प्रचार भी बिहार में हुआ। उसी जैन धर्म का सबसे ज्यादा प्रभाव महात्मा गांधी पर पड़ा। वही महात्मा गांधी जैन धर्म की अंहिसा को पूरी दुनिया में स्थापित कर गए। यह भी कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि जो काम भगवान महावीर नहीं कर सके वो महात्मा गांधी ने किया। महात्मा गांधी तो भगवान बुद्व और महावीर से भी आगे निकले। क्योंकि बुद्व की अंहिसा दक्षिण पूर्व एशिया तक सीमित रही, वहीं जैन धर्म की अहिंसा गुजरात और राजस्थान तक। लेकिन महात्मा गांधी दोनों धर्मों की अहिंसा को पूरे विश्व में स्थापित कर गए। हालांकि महात्मा गांधी ने दुनिया को यह कभी नहीं कहा कि देखो, गुजरातियों ने अहिंसा का पाठ पूरी दुनिया को पढ़ाया है।
नरेंद्र मोदी ने अगर बिहार की मदद की तो बिहार ने भी गुजरात की मदद की है। बिहार के मजदूर सूरत, अहमदाबाद की फैक्ट्रियों में दूषित जीवन जीकर भी गुजरात की अर्थ व्यवस्था को मजबूत कर रहे है। नरेंद्र मोदी का गुजरात सिर्फ बिहारी मजदूरों पर अहसान नहीं कर रहा है। अगर नरेंद्र मोदी की भाषा में ही जवाब दिया जाए तो बिहारी मजदूर भी गुजरात पर अहसान कर रहे है। क्योंकि जितने सस्ते में बिहारी काम करते है उतने सस्ते में कोई और काम नहीं करेगा। लेकिन बिहारियों की मेहनत की कीमत नरेंद्र मोदी शायद नहीं समझ पाए। कुछ इस तरह की गलती पंजाब में की गई थी। जब बिहार से यहां ज्यादा मजदूर आते थे तो पंजाबी उनके साथ दुव्यवहार करते थे। क्योंकि मजदूरों की भीड़ ज्यादा थी और एक को निकालने पर दूसरा मजदूर मिल जाता था। गाली गलौज भी आम बात थी। लेकिन आज उन्हीं बिहारियों की याद पंजाबियों को आ रहा है। धान की रोपाई के लिए मजदूर नहीं मिल रहे है। चार साल पहले छ सौ रुपये एकड़ पर बुआई करने वाले बिहारी मजदूर अब 2500 रुपये प्रति एकड़ पर बुआई के लिए भी नहीं मिल रहे है। अब तो पंजाब रेलवे स्टेशनों पर पंजाबी किसानों की आंखें बिहारी मजदूरों की तलाश कर रही है। 2500 रुपये प्रति एकड़ के साथ दोनों समय मुर्गे का भी आफर है। इसलिए नरेंद्र भाई कीमत तो हर मदद की होती है। अगर आपने बाढ़ में मदद की तो बिहारियों ने गुजरात के उद्योगों को बनाने में मदद की। जिससे आपका गुजरात वाइब्रेंट हो गया।
नरेंद्र मोदी जी अपने प्रदेश में ही पैदा हुए महात्मा गांधी से आप कुछ सीखे। उन्हें भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के अकाटय, निर्विरोध नेता होने के लिए विज्ञापनों और होर्डिगों की जरूरत नहीं पड़ी। वे जन आंदोलन से नेता हो गए थे। उनके एक इशारे पर देश में आंदोलन खड़ा होता था। अंग्रेजी सरकार की चूलें हिल जाती थी।लेकिन आप क्या कर रहे है। आप तो भाजपा में भी स्थापित नहीं हो पा रहे है। स्थापित होने के लिए बड़े-बड़े होर्डिंगों और विज्ञापनों की जरूरत आपको पड़ रही है। यह भी याद रखे महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय आंदोलन में स्थापित होने के लिए कहीं भी गुजरात का नाम नहीं लिया। लेकिन देश के हर प्रांत के नेता उनके सामने झुकते थे, बौने थे, उनकी एक आवाज पर कांग्रेस कार्यसमिति, कांग्रेसी कार्यकारणी के फैसले बदल जाते थे। मोदी जी, एक और ख्याल रखे। आपकी तरह ही स्थापित होने की कोशिश एलके आडवाणी ने भी की थी। उनकी दशा तो आप देख ही चुके है। बेचारे पीएम इन वेटिंग ही रह गए। कई चापलूस भाजपाई तो 2009 लोकसभा चुनावों से पहले उन्हें पीएम सर कह संबोधित भी करने लगे थे। आडवाणी यह संबोधन सुन मुस्कराते थे। अब उनके चेहरे से मुस्कराहट गायब है।
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
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- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
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- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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jise dharma ke thekedaar bakhubi apna kaam karna jante the. Bachpan me sarri baate samjh se pare thi. Jo prachaarak Enlgish medium school ka viroad karte the . unke ghar ke bachhe English school me padte the. Mai ek ese sanghi ko janta, hu jo padaee ke sath tution padya karta tha. Uska chakkar ek sanghi parivaar ki ladki se chal gaya . Dono ne bhagkar shadi kar li or English medium school chala raha hai. Mai bhi esaai or Muslim se dur rahne laga . Etna dur ki baat bhi nahi karta tha. jab mai class 8th me aaya to meri mulakaat muslim boy se huee. Uska mijaaj hindu boy jaisa tha. Dheere dheere usse dosti ho gayee . Mujhe mahsus huaa are ye RSS ke log to dharam ke naam par logo ko bhadka rahe hai. Aaj bhi vah muslim boy mera achaa dost hai.
Mai vachpan se hi RSS ki shakha me jaata tha . Unke kuchh shivir attend kiya par mujhe maja nahi aaya . RSS ke pracharak shuru se hi neta banne ka sapna pal lete hai .RSS ke kitne prachark kushal neta hai. Jo musalmano or esaai se dur rahne ki baat karte the vah Apna vote bank badane ke liye musalmano or esaai se samjhota kar lete hai. Us samya Hindu dharma ko taak par rakhkar bhul jaate hai ki kabhi RSS ke Pracharak the. Ramlala ki jai jaikaar karne vali RSS - BJP mandir mudda bhul chuki hai . Hamare mama ne apne baal nahi katwaye , Vah RSS ki dhara me bah kar bole , bhanje ye baal tab tak nahi katege .jab tak Ram mandir nahi ban jayega. Mama ke sar ke baal udh gaye, magar mandir nahi bana . Har paach saal vaad BJP ka Candidate vote ki bheek magne pahuch jata hai. vah RSS or Ram mandir ki duhaai deta hai . Hinduoo ke sapne adhure hai. kya Ram mandir ban payega ?
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ईष्या तू न गयी मेरे मन से
सुशील गंगवार साहब आप जिन प्रचारक महोदय से मिले थे वो आपसे भी बड़े अज्ञानी थे वो संघ की शिक्षा को जब खुद ही नहीं समझ पाए तो आपको क्या समझायेंगे मेरी उम्र ३३ साल है और आज से २० साल पहले करीब २-३ साल तक मैं संघ का स्वयंसेवक रहा उसके बाद न तो संघ से न ही स्वयंसेवकों से कोई सम्बन्ध रहा लेकिन मैंने इस दौरान कभी भी मुस्लिम विरोध की ऐसी भावना कभी महसूस नहीं की जैसी आप व्यक्त कर रहे है जबकि वो समय राममंदिर आन्दोलन का था और मेरे शहर वाराणसी में दंगे आम बात थी जब सांप्रदायिक दंगे होते है तो केवल दो पक्ष होते है हिन्दू और मुसलमान मैंने अपनी आँखों से देखा है की वो हिन्दू जो कांग्रेस, सपा के सक्रिय सदस्य थे उस समय वो भी मुसलमानों के खिलाफ वैसे ही सक्रिय थे जैसे भाजपाई, अपने आप को धोखा मत दीजिये संघ किसी का दुश्मन नहीं मैंने संघ से केवल सेवा की शिक्षा पाई है और इसके लिए मै संघ का आभारी हूँ और आज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र से ही जुड़ा हुआ हूँ मेरे भी कई मुस्लिम मित्र है और कुछ के साथ मै अच्छा महसूस करता हूँ और कुछ के साथ नहीं उसकी वजह है उनके अन्दर इस्लाम का दिखावा और केवल मुस्लिम मित्रो के बीच बने रहना और मेरे रहने पर बहुत सी बातें इशारों में करना
विजय झा
अब देखो एक गलत हेडिंग किस तरह पुरे आर्टिकल को बर्बाद करता है :-
तुम्हारी माँ को ! (इस हेडिंग को क्या कहोगे )
तुम्हारी माँ को मैंने कभी नहीं देखा, पर जहाँ तक मैंने सुना है ओ बहुत ही दयावान और विवेकशील महिला है एक आदर्श माँ के सारे गुण उनमे मौजूद है ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- आदि आदि
अब तुम क्या कहोगे आर्टिकल अच्छा है और हेडिंग भी अच्छा है ? नहीं आर्टिकल अच्छा है पर हेडिंग गलत है इस आर्टिकल के लिए बहुत सारे अच्छे हेडिंग बन सकते है.
इसी तरह संजीव पांडे उर्फ़ राजेश रंजन तुम्हारा आर्टिकल लाख अच्छा हो पर तुम्हारा हेडिंग गलत है, वाहियात है, गैर जिम्मेवार है. ये कही से भी गंभीर लेखन का परिचायक नहीं है सतही लिखना हो तो और बात है तुम्हारी कलम है जैसे लिखो !
साले सारे के सारे कुत्ते
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