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हिन्दू आतंकवाद का अतिवाद

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image कश्मीर में हिन्दुओं का सफाया किसने किया?

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की गिरफ्तारी के बाद "हिन्दू आतंकवाद" शब्द चर्चा में है. मैं कई अखबारों के लिए कालम लिखता हूं तो मुझे कहा गया कि आप इस बारे में कुछ लिखिए. लोग जानते हैं कि मैं आजन्म कैथोलिक ईसाई हूं, लेकिन २५ सालों तक दक्षिण एशियाई देशों में रहकर फ्रांस के अखबारों के लिए काम किया है इसलिए मैं इस भू-भाग मैं फैली हिन्दू संस्कृति को नजदीक से जानता समझता हूं.

१९८० के शुरूआत में जब मैंने दक्षिण एशिया में फ्रीलांसिग शुरू की थी तो सबसे पहला काम किया था कि मैंने अयप्पा उत्सव पर एक फोटो फीचर किया था. उसी दौरान मैंने हिन्दू जीवन दर्शन में व्याप्त वैज्ञानिकता को अनुभव किया. मैंने अनुभव किया कि हिन्दू दर्शन के हर व्यवहार में आध्यात्म कूट-कूट कर निहित है. अगर आप भारत के गांवों में घूमें तो आप जितने भी गांवों में जाएंगे वहां आपको आपके रूप में ही स्वीकार कर िलया जाएगा. आप किस रंग के हैं, कौन सी भाषा बोलते हैं या फिर आपका पहनावा उनके लिए किसी प्रकार की बाधा नहीं बनता. आप ईसाई हैं, मुसलमान हैं, जैन हैं, अरब हैं, फ्रेच हैं या चीनी हैं, वे आपको उसी रूप में स्वीकार कर लेते हैं. आपके ऊपर इस बात का कोई दबाव नहीं होता कि आप अपनी पहचान बदलें. यह भारत ही है जहां मुसलमान सिर्फ मुसलमान होता है न कि भारतीय मुसलमान या फिर ईसाई सिर्फ ईसाई होता है न कि भारतीय ईसाई. जैसा कि दुनिया के दूसरे देशों में होता है कि यह सऊदी मुसलमान है या फिर यह फ्रेंच ईसाई है. यह भारत ही है जहां हिन्दुओं में आम धारणा है कि परमात्मा विभिन्न रूपों में विभिन्न नाम धारण करके अपने आप को अभिव्यक्त करता है. सभी धर्मग्रन्थ उसी एक सत्य को उद्घाटित करते हैं. अपने ३५०० साल के इतिहास में हिन्दू कभी आक्रमणकारी नहीं रहे हैं, न ही उन्होंने अपनी मान्यताओं को दूसरे पर थोपने की कभी कोशिश की है. धर्मांतरण जैसी बातों की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती.

बाबरी मस्जिद का विध्वंस एक ऐसी घटना जरूर है जो हिन्दुओं के धैर्य का परीक्षा लेती दिखाई देती है. फिर भी इसमें एक भी मुसलमान की हत्या नहीं हुई थी. जबकि इस घटना के विरोध में मुंबई में जो बम धमाके किये गये उसमें सैकड़ों हिन्दू मारे गये थे. फिर भी मैं देखता हूं कि भारत में पत्रकार मुंबई बमकाण्ड से भी बड़ी "डरावनी" घटना बाबरी मस्जिद के गिरने को बताते हैं. हो सकता है कि मैं राजनीतिक रूप से सही न पाया जाऊं लेकिन मैंने दक्षिण एशिया में रहते हुए जो कुछ अनुभव किया उसको वैसे ही लिखा है.

हिन्दू आतंकवाद के बारे में भी मैं अपने विचार सीधे तौर पर आपके सामने रखना चाहता हूं. पहली बार अरब के आक्रमणकारियों के भारत पर हमले के साथ ही हिन्दू लगातार मुस्लिम आक्रमणकारियों के निशाने पर रहे हैं. १३९९ में तैमूर ने एक ही दिन में एक लाख हिन्दुओं का कत्ल कर दिया था. इसी तरह पुर्तगाली मिशनरियों ने गोआ के बहुत सारे ब्राह्मणों को सलीब पर टांग दिया था. तब से हिन्दुओं पर धार्मिक आधार पर जो हमला शुरू हुआ वह आज तक जारी है. कश्मीर में १९०० में दस लाख हिन्दू थे. आज दस हजार भी नहीं बचे है. बाकी हिन्दुओं ने कश्मीर क्यों छोड़ दिया? किन लोगों ने उन्हें कश्मीर छोड़ने पर मजबूर किया? अभी हाल की घटना है कि अपने पवित्रम तीर्थ तक पहुंचने के लिए हिन्दुओं को थोड़ी सी जमीन के लिए लंबे समय तक आंदोलन चलाना पड़ा, जबकि इसी देश में मुसलमानों को हज के नाम पर भारी सब्सिडी दी जाती है. एक ८४ साल के वृद्ध संन्यासी की हत्या कर दी जाती है जिसपर भारतीय मीडिया कुछ नहीं बोलता लेकिन उसकी प्रतिक्रिया में जो कुछ हुआ उसको शर्मनाक घोषित करने लगता है.

कई बार मुझे लगता है कि यह तो अति हो रही है. दशकों, शताब्दियों तक लगातार मार खाते और बूचड़खाने की तरह मरते-कटते हिन्दू समाज को लतियाने की परंपरा सी कायम हो गयी है. क्या किसी धर्म विशेष, जो कि इतना सहिष्णु और आध्यात्मिक रहा हो इतना दबाया या सताया जा सकता है? हाल की घटनाएं इस बात की गवाह है कि इसी हिन्दू समाज से एक वर्ग ऐसा पैदा हो रहा है जो हमलावरों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे रहा है. गुजरात, कंधमाल, मंगलौर और मालेगांव सब जगह यह दिखाई पड़ रहा है. हो सकता है आनेवाले वक्त में इस सूची में कोई नाम और जुड़ जाए. इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर व्यापक हिन्दू समाज ने अपने स्तर पर आतंकी घटनाओं और हमलों के जवाब देने शुरू कर दिये तो क्या होगा? आज दुनिया में करीब एक अरब हिन्दू हैं. यानी, हर छठा इंसान हिन्दू धर्म को माननेवाला है. फिर भी सबसे शांत और संयत समाज अगर आपको कहीं दिखाई देता है तो वह हिन्दू समाज ही है. ऐसे हिन्दू समाज को आतंकवादी ठहराकर हम क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या आतंकवादी शब्द भी हिन्दू समाज के साथ सही बैठता है? मेरे विचार में यह अतिवाद है.

लेखक पेरिस स्थित "La Revue de l'Inde" (Review of India)के मुख्य संपादक हैं.

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arun arora on 11 November, 2008
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पर शायद ये बात समझ मे नही आती इन तथाकथित मीडिया जनो को और धर्म निर्पेक्षता के इन तथाकथित ठेकेदरो को .ये नही समझ पा रहे कि आने वाले वक्त मे अगर हिंदू तलवार उठाने को मजबूर हुआ तो उसमे एक कारण ये ही लोग होगे .हिंदुओ के पास अपनी अस्मिता बचाने को कोई और रास्ता ना रहे. फ़िर्दौस जैसे लोग इसमे और ज्यादा जहर घोलने का काम कर रहे है.
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Smart Indian on 11 November, 2008
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इस समीक्षात्मक, संतुलित और निष्पक्ष आंकलन के लिए लेखक, सम्पादक और प्रकाशक सभी को बधाई. सच कह पाना अपने आप में एक साहस का काम है,
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मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने इस लेख को अपने ब्लाग पर प्रस्तुत किया. आज की स्थिति का इस से ज्यादा सार्थक विश्लेषण नहीं हो सकता. आक्रामक धर्मों के अनुयाई, स्वघोषित बुद्धिजीवी, मीडिया, इन सबको हिंदू एक ऐसा टारगेट नजर आते हैं जिन्हें कुछ भी कह लो चुपचाप सह लेंगे, बल्कि कुछ तो बदले में तारीफ़ भी कर देंगे कि जितना अच्छा किया है हमें गाली देकर.

एक ढाँचे को मस्जिद कह कर जिस तरह इस देश में नफरत का जहर फैलाया गया, जगह-जगह बम धमाके किए गए, उस से बड़ा षड़यंत्र दुनिया में कहीं नहीं किया गया. इस्लामी कानून के अनुसार यह ढांचा मस्जिद था ही नहीं. उस समय कुछ मुस्लिम विद्द्वानों ने यह कहा भी था, पर नफरत की आग फैला कर और उस से व्यक्तिगत और राजनितिक फायदे उठाने की हवस में वह सही आवाज दबा दी गई.

आज अगर हिन्दू समाज से एक वर्ग ऐसा पैदा हो रहा है जो हमलावरों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे रहा है तो सब घबराए हुए हैं. हिंदू स्वभाव से शांतिप्रिय हैं. लेकिन हर बात की हद होती है. रावण और कंस को भी एक हद तक ही बर्दाश्त किया गया था. यह बात उन लोगों को समझनी चाहिए जो रात-दिन हिन्दुओं और उनके धर्म पर हमले कर रहे हैं. प्यार से रहो और सब को प्यार से रहने दो. यह बात इनकी समझ में क्यों नहीं आती? क्या है जिसे हासिल करने के लिए यह लोग इस देश को सिविल वार की और धकेल रहे हैं? सीमा पार के लोगों के लिए तो यह एक फायदे की बात हो सकती है, पर इस देश में रहने वालों के लिए यह किस तरह सही है? क्या इन का उद्देश्य भी वही है जो सीमा पार वालों का है?

यह कुछ ऐसे सवाल हैं जो हर अमन-पसंद नागरिक को परेशान कर रहे हैं. कौन देगा इन का जवाब?
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on 11 November, 2008
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निष्पक्ष विश्लेषण
सच कहना साहस का काम है और जब भीड़ में गलत चीखों के बीच सच कहना और भी अधिक साहस का काम है.

अभी तक तो हिन्दू सिर्फ कैंचुये ही समझे जाते रहे हैं.
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devang on 11 November, 2008
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१३९९ में तैमूर ने एक ही दिन में एक लाख हिन्दुओं का कत्ल कर दिया था. इसी तरह पुर्तगाली मिशनरियों ने गोआ के बहुत सारे ब्राह्मणों को सलीब पर टांग दिया था. तब से हिन्दुओं पर धार्मिक आधार पर जो हमला शुरू हुआ वह आज तक जारी है. कश्मीर में १९०० में दस लाख हिन्दू थे. आज दस हजार भी नहीं बचे है. बाकी हिन्दुओं ने कश्मीर क्यों छोड़ दिया? किन लोगों ने उन्हें कश्मीर छोड़ने पर मजबूर किया? अभी हाल की घटना है कि अपने पवित्रम तीर्थ तक पहुंचने के लिए हिन्दुओं को थोड़ी सी जमीन के लिए लंबे समय तक आंदोलन चलाना पड़ा, जबकि इसी देश में मुसलमानों को हज के नाम पर भारी सब्सिडी दी जाती है. एक ८४ साल के वृद्ध संन्यासी की हत्या कर दी जाती है जिसपर भारतीय मीडिया कुछ नहीं बोलता लेकिन उसकी प्रतिक्रिया में जो कुछ हुआ उसको शर्मनाक घोषित करने लगता है.

काश ये बात सोनिया के दलालों को समझ में आये.
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