भारत के दुर्भाग्य विधाता
अब बात अमरनाथ स्राईन बोर्ड को दी गयी जमीन की नहीं है. बात कश्मीर की आजादी की चल पड़ी है. जो लोग भूल चुके थे उन्हें याद दिलाया जा रहा है कि कश्मीर में हालात ९० वाले हो चले हैं. ऐसा कहनेवाले अकेले हुर्रियत के लोग नहीं है. यह दिल्ली के पत्रकार बिरादरी में भी कहा जा रहा है.
आजादी के दूसरे दिन दूसरी आजादी की बात करते हुए हिन्दुस्तान टाईम्स के संपादक वीर संघवी ने लिखा कि कश्मीर के बारे में वह सोचिए जो कल्पना से भी परे हो. पूरा लेख यह बताता है कि कश्मीर भारत पर एक अनायास बोझ है और यह बीसवीं सदी की समस्या है. भारत इक्कीसवीं सदी का देश है इसलिए अब इस बीसवीं सदी की समस्या से निजात पाने का वक्त आ गया है. वहीं तथाकथित मैनेजमेन्ट गुरू अरिंदम चौधरी अपनी पत्रिका संडे इंडियन कश्मीर की आजादी के समर्थन में खुद कवर स्टोरी लिखकर कह रहे हैं कि क्या कश्मीर के एककीकरण का इंतजार करते हुए इतना लंबा समय नहीं बीत चुका कि हमें नये सिरे से कुछ सोचना चाहिए?
इसे सिरे को समझने के लिए पत्रकार बिरादरी कश्मीर की आजादी के समर्थन में जो बहाने बना रही है वह मजेदार है. वीर संघवी लिखते हैं कि हमने कश्मीर को भारत में मिलाने के लिए क्या नहीं किया, और आज भी उसे धारा ३७० का विशेष दर्जा हासिल है. केन्द्र सरकार की ओर से हर कश्मीरी पर सालाना ९७५४ रूपये खर्च किया जाता है. जो कि बिहार में खर्च किये जा रहे प्रति व्यक्ति खर्च से दस गुना ज्यादा है. हर रोज कश्मीर में तैनात सेना का खर्च अलग. लेकिन इसका नतीजा क्या है? किसी भी कीमत पर कश्मीरी लोग भारत के साथ नहीं रहना चाहते. क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को यह शोभा देता है कि वह ऐसे हिस्से को अपने साथ जबर्दस्ती जोड़कर रखे जो आपके साथ रहना ही नहीं चाहता? कुछ इसी तरह की बात अरिंदम चौधरी भी लिख रहे हैं. दोनों को पढ़कर लगता है मानों दोनों अंग्रेजी घरानों को एक ही जगह से डिक्टेशन मिली हो और उन्होंने उसे जस का तस उतार दिया है.
खुफिया रपटों की मानें तो कश्मीर में जो कुछ हो रहा है उसके लिए कांग्रेस जिम्मेदार है. कहते हैं कि आईबी ने पहले ही यह रिपोर्ट दे दी थी कि अगर अमरनाथ जमीन हस्तांतरण को रद्द किया जाता है तो घाटी और जम्मू दोनों जगहों पर हालात बेकाबू हो सकते हैं. सूत्रों की मानें तो कांग्रेस के आला नेतृत्व ने इसे दरकिनार कर दिया. कांग्रेसी रणनीतिकारों का मानना था कि अमरनाथ श्राईनबोर्ड विवाद के कारण घाटी और जम्मू में जो ध्रुवीकरण होगा उससे पीडीपी पूरी तरह से नेस्तनाबूत हो जाएगी. इसके बाद नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के गठजोड़ का रास्ता साफ हो जाएगा. लेकिन आज हालात पलट गये हैं. नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी दोनों की हुर्रियत कांफ्रेस और पाकिस्तान समर्थक गिलानी के सुर में बोल रहे हैं. १७ अगस्त को उमर फारूख ने कहा कि अगर हालात को ठीक नहीं किया गया तो वे संसद से इस्तीफा दे देंगे तो २५ अगस्त को महबूबा मुफ्ती ने दिल्ली में प्रेस कांफ्रेस करके धमकी दे डाली कि भारत को अमरनाथ श्राईनबोर्ड और कश्मीर में से किसी एक का चुनाव करना होगा.
असल में, वीर सांघवी और अरिंदम जैसे संपादक जो कुछ लिख रहे हैं वह इलिटिस्ट माइंडसेट है जिसके लिए भाषा, भूषा और समाज-राष्ट्र आदि कोई मायने नहीं रखते. इसलिए उनका ऐसी मांग करना कोई नाजायज नहीं है. उनके लिए कश्मीर एक पर्यटन स्थल है जिसके अलग होने के बाद भी वे वीजा लेकर वहां जा सकते हैं. लेकिन ऐसे पत्रकार सिर्फ इसी भावना से ऐसी घातक बातें नहीं लिख रहे हैं.
कांग्रेस के अंदर इस बात का मंथन तेज है कि क्या जम्मू, लद्दाख और कश्मीर को तीन हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है? अगर ऐसा हो सकता है तो ४० लाख कश्मीरियों को अलग करके देश के सौ करोड़ जनता के सिर से बोझ उतार दिया जाए. असल में जो पत्रकार ऐसा लिख रहे हैं वे किसी खास मकसद से लिखते जान पड़ते हैं. वह मकसद क्या है, इसे समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है. आजकल हर राजनीतिक दल और कारपोरेट घराने अघोषित रूप से मीडिया हाउस कूत लगाकर खरीदते हैं. जिन दो मीडिया समूहों ने इस तरह की बात उठायी है वे दोनों ही कांग्रेस समर्थक माने जाते हैं. जाहिर सी बात है कांग्रेस के प्रभुत्ववाली यूपीए सरकार आगामी चुनावों को देखते हुए जानबूझकर ऐसे कदम उठा रही है जिससे कश्मीर ही नहीं बल्कि कश्मीर के साथ ही दूसरे चार राज्यों और लोकसभा चुनाव में वोटों का ध्रुवीकरण हो सके.
कांग्रेसी रणनीतिकार यह भूल गये थे कि जितना फायदा उठाने की कोशिश वे कर रहे हैं उससे ज्यादा फायदा भाजपा को मिल सकता है. जम्मू में हो रहे प्रदर्शनों से साफ है कि भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण तेज है. नेशनल कांफ्रेस के साथ सत्ता का भावी समीकरण बुरी तरह से गड़बड़ा गया है. वहीं दूसरी ओर मुसलमानों ने भी अपील जारी करनी शुरू कर दी है कि अमरनाथ श्राईन बोर्ड को जमीन वापस देने में कोई हर्ज नहीं है. यह कांग्रेस को दोहरा नुकसान है. ऐसे असंभावित नतीजों को देखकर अब कांग्रेस के राज्यपाल अमरनाथ संघर्ष समिति को तीन महीने के लिए जमीन लीज पर देने की पेशकश कर रहे हैं.
कांग्रेस समर्थित मीडिया हाउसों द्वारा कश्मीर की आजादी की तरफदारी करवाना बहुत खतरनाक है. आज कश्मीर जायेगा तो कल उत्तर पूर्व भी जाएगा और परसों खालिस्तान भी बनेगा. फिर सरकार के पास ऐसी कोई बंदूक नहीं है कि वह लाल गलियारे को अस्तित्व में आने से रोक सके. मीरवाईज उमर फारूख कहते हैं कि मनमोहन सिंह के पास ऐसी क्षमता नहीं है कि वे कश्मीर के बारे में ठोस निर्णय ले सकें. यह एक अलगाववादी का देश के प्रधानमंत्री के बारे में आंकलन है. यह क्या संकेत कर रहा है? क्या भारत आतंक और अलगाववाद के खिलाफ इतना नर्म और पिलपिला नेशनस्टेट होकर रह गया है कि लाख दो लाख के समर्थन से दाल-रोटी चलानेवाले लोग भी १०० करोड़ जनता के प्रतिनिधि को इस तरह से चुनौती दें?
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Comments (8 posted):
असल में जैसे इस बार अमरनाथ जमीन विवाद पर कांग्रेस ने गंभीर चूक की उसी तरह से कश्मीर में छोटी-छोटी बहुत सारी चूकें समय-समय पर हुई हैं. भारत कश्मीर छोड़ नहीं सकता, कश्मीरियों का एक धड़ा भारत के साथ रहना नहीं चाहता जबकि दूसरा धड़ा पाकिस्तान के साथ जाना नहीं चाहता. अगर हम भारत को राष्ट्र मानते हैं तो देश के दूसरे हिस्सों में कश्मीर से भावनात्मक लगाव होना स्वाभाविक है. फिर यह कहावत भी अपना असर दिखाती है कि जहां मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक हो जाती है वह हिस्सा देश से कट जाता है.
बहुत बड़े पैमाने पर दीर्घकालिक परिणाम की अपेक्षा से काम किये बिना कश्मीर या उत्तर पूर्व समस्या ही बने रहेंगे. चुनाव जीतने की मंशा और योजना ऐसे ही संकट खड़े करेगी.
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