संपादक महोदय रिपोर्टर से दूसरी शादी करना चाहते थे
मैं एक अखबार का मालिक और प्रबंध संपादक हूं. मुझे यह सुनाने और बताने की जरूरत नहीं है कि अखबार मालिकों पर अक्सर यह आरोप लगता है कि अखबार मालिक संपादकों को काम करने का मौका नहीं देते. उनके ऊपर दबाव बनाकर रखते हैं कि वे अखबार मालिक के लिहाज से व्यवहार करें. जब मैंने अखबार निकालना शुरू किया तो मैं हमेशा इस बात को लेकर सतर्क था कि डीएनए अखबार के संपादक को ऐसी किसी परिस्थिति का सामना न करना पड़े.
हमने अपने संपादकों को हमेशा इतनी आजादी दी कि वे खुलकर काम कर सकें. वे मेरे संपादक होने की बजाय पाठक के संपादक हों, इसी में समाज को भी लाभ है और अखबार को भी. अगर अखबार को लोग पसंद करते हैं तो उसके व्यावसायिक पहलू अपने आप विकसित हो जाते हैं. देशपाल सिंह पवांर को समूह संपादक बनाकर लाया तो न केवल उन्हें सामग्री संपादन में पूरी आजादी दी बल्कि अखबार के विस्तार के लिए
भी मैंने उन्हें ही आगे किया. लेकिन उन्होंने जो व्यवहार किया उससे व्यक्तिगत रूप से मुझे लगा कि उन्होंने न केवल मेरे साथ छल प्रपंच किया बल्कि उस पद की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है जिसे हमारा समाज मंदिर में बैठे पुजारी का दर्जा देता है. अब देशपाल सिंह पंवार मेरे ऊपर आरोप लगा रहे हैं. उन्हें ऐसा करने की पूरी आजादी है. आखिरकार हम एक लोकतांत्रिक देश में हैं और अभिव्यक्ति की आजादी के कारोबार से ही जुड़े हुए हैं. देशपाल सिंह से मैं सिर्फ दो मुद्दे पर बात करना चाहता हूं, वे खुद और लोग भी महसूस करें कि आखिर एक मालिक ऐसी अवस्था में किसी संपादक के साथ कैसा व्यवहार करता?
1- यह सही है कि श्री पंवार के मीडिया जगत में पूर्व में किए गए योगदान को सुनने के उपरांत और उनकी एकतरफा पहल के उपरांत अगस्त 2009 में श्री देशपाल सिंह पंवार को डीएनए के समूह सम्पादक का दायित्व सौंपा गया। दायित्व ग्रहण करते समय उन्होंने डीएनए प्रबंधन से इस बात का वादा किया था कि उनका एक महत्वपूर्ण कार्य वित्तीय संस्थानों/व्यक्तियों से वित्तपोषण कराकर डीएनए का दिल्ली संस्करण एवं अन्य राज्य संस्करण भी जल्द ही शुरू कराएंगे और इसके लिए उन्होंने अगस्त से लेकर अपनी बर्खास्तगी के दिन तक लगातार लखनऊ मुख्यालय से बाहर रहकर वित्तपोषण की प्रगति से मुझे अवगत कराते रहे कि किन व्यक्तियों से वित्तपोषण की बात उन्होंने की है। इसके सैकड़ों एसएमएस मेरे पास सुरक्षित हैं। श्री पंवार ने आपको प्रेषित अपने उत्तर में मुझसे यह जानना चाहा है कि किस बिल्डर और पॉलिटीशियन ने डीएनए के विस्तार की योजना में वित्तपोषण करने का निर्णय लिया। उनका नाम मैं लेना नहीं चाहता था लेकिन चूंकि श्री पंवार ने सार्वजनिक प्लेटफॉर्म के माध्यम से मुझसे उत्तर जानना चाहा है। इसलिए मैं शपथपूर्वक कह रहा हूं कि श्री पंवार ने दिल्ली के एक प्रतिष्ठित बिल्डर से पांच करोड़ रुपए वित्तपोषण की बात मुझे बताई। साथ ही यह भी कहा कि एक-एक करके दो करोड़ रुपए दो किश्तों में उक्त बिल्डर दिल्ली संस्करण के नाम पर इनको उपलब्ध करा चुके हैं।
जहां तक पॉलिटीशियन की बात है, श्री पंवार ने मुझे बताया कि एक पूर्व केंद्रीय मंत्री दिल्ली संस्करण के लिए 20 करोड़ रुपए की धनराशि के वित्तपोषण कराने को तैयार हो गए हैं और उन्होंने प्रथम किश्त के रूप छह करोड़ रुपए और दूसरी किश्त में एक करोड़ रुपए की धनराशि उनको उपलब्ध करा दी है, जोकि उनके पास सुरक्षित है। जितनी बार भी मैंने श्री पंवार से अनुरोध किया कि चूंकि उक्त बिल्डर और पूर्व केन्द्रीय मंत्री द्वारा उपलब्ध कराई गई धनराशि (दो करोड़ व सात करोड़ कुल नौ करोड़ रुपए) से दिल्ली संस्करण पर काम शुरू किया जाए, मेरे इस सुझाव पर श्री पंवार लगातार टालमटोल रवैया अपनाए रहे और अखबार के मुख्यालय से बाहर रहे तथा आजकल आने की बात कहकर लगातार मुख्यालय आने की तिथि आगे बढ़ाते रहे। मैंने कई बार उनसे यह भी अनुरोध किया कि भवन व्यवसायी और पूर्व केन्द्रीय मंत्री द्वारा उपलब्ध कराए गए रुपए का डीएनए के विस्तार में उपयोग प्रारंभ नहीं किया जाएगा तो इन दोनों व्यक्तियों के मन में डीएनए प्रबंधन को लेकर खराब छवि बनेगी। लेकिन लगातार वे इन दोनों व्यक्तियों से अपने नजदीकी संबंधों का हवाला देकर तिथि को आगे बढ़ाते रहे।
2- दिनांक 6 जून 2010 को सांयकाल डीएनए में कार्यरत एक वरिष्ठ महिला रिपोर्टर ने मुझे दूरभाष पर अवगत कराया कि समूह सम्पादक श्री देशपाल सिंह पंवार पिछले वर्ष ईद के बाद से ही लगातार शारीरिक व मानसिक शोषण करने और शादी करने के लिए दबाव बना रहे हैं और उनकी यंत्रणा से परेशान होकर रिपोर्टर के शब्दों में मानसिक संतुलन तक डिगने लगा और रिपोर्टर को अस्पताल तक में भर्ती होकर मनोरोग चिकित्सक से अपना इलाज कराना पड़ा। इस गंभीर चारित्रिक शिकायत जिससे पूरा डीएनए परिवार गंभीरता से प्रभावित होता और डीएनए की छवि दागदार होती। मैंने उस महिला रिपोर्टर से अनुरोध किया आपकी जो भी शिकायतें हैं उसे आप लिखित रूप में मुझे उपलब्ध कराएं। तदुपरांत महिला रिपोर्टर ने अपनी शिकायत लिखित रूप में मुझे उपलब्ध कराई। जिसकी स्कैंड कॉपी आपके पास भेज रहा हूं। महिला रिपोर्टर के मान-सम्मान की रक्षा की दृष्टि से रिपोर्टर के नाम को छिपाया गया है। लेकिन जब भी जरूरत पड़ेगी तो उसका खुलासा उपयुक्त समय पर किया जाएगा। महिला रिपोर्टर की लिखित शिकायत प्राप्त होते ही मैंने श्री देशपाल सिंह पंवार को प्रश्नगत दोनों बिंदुओं पर उनका उत्तर चाहा था। लेकिन उन्होंने कोई उत्तर डीएनए प्रबंधन को उपलब्ध नहीं कराया। तदुपरांत डीएनए प्रबंधन ने तात्कालिक प्रभाव से देशपाल सिंह पंवार को समूह संपादक के पद से बर्खास्त कर दिया।
इन दो बातों के अलावा श्री पंवार ने अपने उत्तर में बहुत सारी अनर्गल बातें कहीं है, जिनका न कोई आधार है और न ही कोई तथ्य है। उनमें से किसी भी बात का उत्तर देने की जरूरत मैं नहीं समझता। हां, इस बात का दुख अवश्य है कि ऐसे लोग न केवल अखबार की प्रतिष्ठा को धूल धूसरित करते हैं बल्कि उस संपादक प्रतिष्ठान की गरिमा को भी कम करते हैं जिसकी उम्मीद आम आदमी उनसे करता है.
भवदीय
प्रो. निशीथ राय
चेयरमैन एवं प्रबंध सम्पादक
डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट
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Digg
in tathyan se saf hai ki 9 june ko panwar ko barkhast karne ke bad patr taiyar kiya gaya hai.
sari kahani mangadhant hai.
इन तथ्यां से साफ है की 9 june को पंवार को बर्खास्त करने के बाद पत्र तैयार किया गया है.
साडी कहानी मनगढ़ंत है.
Jahan tak mai nishith rai ji ko janta hun ye bahut hi imandar, ek vachan bolne wale, aur sachchai ki rah per chalnewale wale deshbhakt hai.
Nishith Rai Ji ka bola gaya har statement saboot per adharit hai aur baki kuchh bach hi nahi raha kehne ko.
Mahila Reporter ke sath agar sahi me anyay hua hai to uska hisab samuchi media legi.
Patrakaro per ho rahe julm-o-sitam ka tarikhwar hisab Compound interested adayegi per hoga.
Behtar ye hoga ki is mudde ko issue na banate hue kisi dusre raste se hal kiya jaye.
vikash bhartiya
पत्रकारिता का मीठा जहर रगों में चला जाये तो अनपढ़ लोग भी पत्रकार बन जाते है । आप लोगो को याद होगा ,मैंने अपने गाँव के फर्जी रिपोर्टर छिदू मामा की कहानी सुनाई थी । पत्रकारिता में फर्जी पत्रकारों को फौज खड़ी हो चुकी है । ऐसे पत्रकारों पर लगाम कैसे लगे, यह तो भारत सरकार की समझ से बाहर है । हर जिले - तहसील में टीवी और प्रिंट पत्रकार बसूली करते घूम रहे है । हर टीवी चेंनल और अखबार अपने रिपोर्टर आल इंडिया स्तर पर बनाते है । यह दुकाने गली कूचो में खुलने लगी है । फर्जी पत्रकार अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन देकर फर्जी रिपोर्टर एडिटर बनाकर मोटी कमाई कर रहे है। यह लोग फर्जी पत्रकारों को पैसा उघाने की तालीम भी देते है। यह फर्जी पत्रकार स्टिंग करने से नहीं चूकते है। ऐसे पत्रकार अपनी न्यूज़ साईट खोल कर स्टिंग करने का धंधा कर रहे है । डेल्ही N . C. R में फर्जी पत्रकार अपनी न्यूज़ साईट खोलकर पैसा उघाने का का काम रहे है । इनकी पदाई आठवी तक है परन्तु भेष बदलने में माहिर है । इनके बात करने का ढंग बेहद कुशल -शातिर होता है । यह अपने आपको किसी बड़े पत्रकार से कम नहीं समझते है। कभी कभी मंत्री का नाम लेकर लोगो को चूना लगाने से बाज नहीं आते है । ऐसे पत्रकार साल एक दो बार तिहाड़ जेल की यात्रा कर लेते है । आपको फर्जी पत्रकारों से बचकर रहना होगा ।
www.sakshatkar.com
इसलिए आप कम दोषी नहीं हैं. रही बात महिला की तो पता नहीं 10 साल से वह कहाँ और किस स्तर का काम कर रही थी की अभी भी वह डी.न.अ. जैसे अखबार में अपना शोसन करवा रही थी.
आज हर मोड़ पर पुरुष किसी न किसी महिला को भावनात्मा अघात दे रहा है और जब लड़की को सच का पता चलता है तबतक उसका सब कुछ समाप्त हो चूका होता है और जब वो अपनी बता समाज में ले जाती है तो दूसरा पुरुष कहता है तुम्हारे हे १००% गलती है वो तो पुरुस है तुम्हे नहीं अक्ल थी.. सच यहाँ है यहाँ बात एक महिला ने एक पुरुष को लगाई है.. काश सारी महिलाए सरम हया का जूठ चस्मा उतर कर यदि बाहर आजाये तो इन जैसे अयीयास पुरुसो को मुह छुपकर भगाना पड़ेगा और नितीश जी ने जो किया वो न्यायक है पावर को तो सजा मिलने चाहेये ..एक महिला हो शारीरिक और मानसिक प्रताड़ित करने के जुर्म में , तथा उनपर तो धोखा का भी केस चलना चाहिए न्यायालय में और इनके जैसे सभी को सजा मिलनी चाहेये
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