आदमीनामा
Feb
21
2012
वे रवीन्द्र शाह थे...
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दैनिक भास्कर के दिल्ली ब्यूरो के नए संपादक। उसके पहले दिल्ली ब्यूरो की जिम्मेदारी शरद द्विवेदी के जिम्मे थी। जैसा कि अक्सर होता है...बदलाव के वक्त रवींद्र शाह कुछ लोगों को भले लगे और कुछ के लिए बहुत अक्खड़ और बदतमीज। संपादक बनते ही रवींद्र शाह ने सबसे पहला फरमान ये सुनाया कि सब लोग ब्यूरो में दस बजे आएं...क्योंकि मीटिंग तभी होगी। इसके पहले तक लोगों को ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे दफ्तर आने की आदत थी। रवींद्र शाह ने दूसरा फरमान सुनाया- सबके वीकली ऑफ फिलहाल खत्म। सवाल उठे तो जवाब था-अब तक दिल्ली ब्यूरो काम नहीं कर रहा था। अब काम करेगा। अगले दिन उनका एक नया फरमान, दिल्ली ब्यूरो राजनीतिक खबरें छोड़कर ऑफ बीट स्टोरी करे। राजनीति कवर करने की आदत विकसित कर चुके ब्यूरो के पत्रकारों के लिए ये परेशानी भरा फैसला था। लेकिन झक मारकर सबको वही करना पड़ा, जो रवींद्र शाह एसाइन करते। लोग गुस्साते...उनकी आलोचना करते...लेकिन काम करना ही पड़ता। इस तरह उनके बारे में एक धारणा विकसित होती जा रही थी कि उन्हें पत्रकारिता की समझ नहीं है, वे बदतमीज हैं और वे राजनीतिक ब्यूरो को गड़बड़ करने आए हैं।
रवींद्र शाह के नहीं रहने के बाद जाड़े का वह दिन याद आता
Feb
12
2012
राजनीति का बदनाम व्यापारी: पोंटी चड्ढा
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लहर उठाना पोंटी चड्ढा का जुनून है. शायद इसीलिए कुछ समय पहले जब दिल्ली से एक न्यूज चैनल लांच हुआ तो उसने भी अपने टैगलाइन लिखी कि लहर तो उठेगी. बताते हैं कि लहर उठानेवाले इस चैनल में भी पोंटी चड्ढा का पैसा लगा हुआ था. लेकिन ऐसा नहीं है कि केवल चैनल ही लहर उठा रहा था. शायद यह चैनल में पोंटी चड्ढा का इफेक्ट था कि चैनल भी लहर उठाने से अपने आपको रोक नहीं पाया. वैसे भी पोंटी चड्ढा एक लहर का ही नाम है. उसे लहरों से लगाव भी है शायद इसीलिए उसकी कंपनियों की मदर कंपनी वेव इंक है. आज जिस पोंडी चड्ढा को हम सुनामी के रूप में देख रहे हैं, पिछले एक दशक से उसका पचरम चारों ओर लहरा रहा है. क्या पंजाब, क्या उत्तर प्रदेश और क्या उत्तराखण्ड. पोंटी का परचम चारों तरफ है.
पोंटी ने अपनी जिंदगी में जो कुछ किया है वह डंके की चोट पर किया है. उसने दिल्ली से दुबई तक अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है. जो लोग आज उसे मायावती का करीबी बता रहे हैं उन्हें यह भी जान लेना चाहिए कि वह कल्याण सिंह का भी करीबी रहा है और कलराज मिश्र का भी. वह
Feb
09
2012
नयी सोच का समाजवाद
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दोनों को राजनीति विरासत में मिली है. एक नेहरू-गांधी की विरासत वाली देश की सबसे पुरानी उस कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव है, जिसे देश की उदार और धर्मनिरपेक्ष पार्टी के रूप में जाना जाता है तो, दूसरी उस समाजवादी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष है जिस पर "जातिवादी" और "गुंडो-बदमाशों" की पार्टी होने का आरोप लगता रहा है. दोनों युवराजों की अपनी चुनौतियां हैं लेकिन अखिलेश के लिए चुनौती कहीं ज्यादा बड़ी है. राहुल की चुनौती उत्तर प्रदेश में पार्टी की जड़ों को मजबूत करना है तो आस्ट्रेलिया से इंजीनियरिंग की उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले 38 वर्षीय अखिलेश यादव के लिए चुनौती केवल सपा की "गुंडापार्टी" की छवि को बदलना ही नहीं है, बल्कि पार्टी की सत्ता में वापसी भी है. अखिलेश की चुनावी यात्राओं के प्रमुख और पार्टी के यूथ विंग के मुखिया डा. संजय लाठरा कहते हैं, "सपा एक मात्र ऐसी पार्टी है जिसने उत्तर प्रदेश में इस बार बड़े पैमाने पर युवाओं और महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारा है. करीब 122 ऐसे युवाओं को टिकट दिया है, जो उच्च शिक्षा प्राप्त हैं और पहली बार चुनाव मैदान में उतर रहे हैं. इनमें से 75 फीसदी लोग छात्र संघों के पदाधिकारी रहे हैं. तो पहली बार
Jan
23
2012
समाजवादी राजनीति का शलाका पुरूष
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सुबह अचानक तबियत बिगडऩे पर उन्हें लखनऊ के पीजीआई ले जाने की सलाह दी गई क्योंकि उनका ब्रेन हैमरेज हुआ था. शहर से बाहर भी नहीं निकल पाए थे कि आखरी वक्त आ गया और समाजवादी राजनीति के शलाका पुरूष ने हमेशा के लिए कूच कर दिया और इस तरह से उसी इलाहाबाद में उन्होंने अपने आपको समाहित कर दिया जहां की क्षिति, जल, पावक और वायु उनके रोम-रोम में समाया हुआ था.
उनको गये हुए दो साल बीच गये और अबकी 22 जनवरी आई और चली गई किसी को जनेश्वर जी की याद नहीं आई. लेकिन आज भले ही जनेश्वर जी इतनी जल्दी अतीत के गर्त में ढकेले जा रहे हों, अतीत में लौटकर देंखे तो जनेश्वर मिश्र ने मूर्तिभंजन की कला की बुनियादी समझ से हमारी पीढी के बहुत सारे लोगों को अवगत कराया था. किसी भी विचारधारा को नेता के कहने पर स्वीकार कर लेने की बात के वे सख्त विरोधी थे. वे इतने बड़े इंसान थे कि अपना विरोध करने वालों को भी प्रोत्साहित करते थे. आज देश में कोई भी ऐसा राजनेता नहीं है जिसको उसके सामने बैठ कर ललकारा जाय और
हस की प्रणाली से अपना बचाव करे. अब तो विरोध करने वालों कोJan
07
2012
समाजवाद के सौर मंडल का नया सितारा
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”जाओ,चुनाव में तुम विजई होगे, तुम्हें लोकसभा में पहुंचने से कोई रोक नहीं सकेगा।” यह बात दिवंगत समाजवादी लोहिया के अनुयाई जनेश्वर मिश्र ने अखिलेश यादव से उस समय कही थी जब वे कन्नौज चुनाव मे उतरने के बाद आशिर्वाद लेने के लिये उनके घर पर गये थे। यह बात 1998 में कन्नौज के लोकसभा उपचुनाव मे उतरने के बाद कही गई थी. इस बात का आज पर जिक्र करना बेहद जरूरी इसलिए बन पड़ा है क्योंकि अखिलेश यादव आज न केवल कई बार विजयी हो चुके है बल्कि जीत की कई ऐसी मिसालें कायम कर चुके हैं जो उनके कद को इतना बड़ा कर देता है जिसकी कल्पना मात्र ही की जा सकती है।
अखिलेश यादव ! यह नाम वैसे तो किसी भी पहचान का मोहताज नही है क्योंकि उनका नाम जहां समाजवादी पार्टी के जमीनी नेता मुलायम सिंह यादव के बेटे के तौर पर जाना ही जाता है। अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश ईकाई के प्रमुख होने के साथ साथ सांसद भी है। समाजवाद की नई परिभाषा अब अखिलेश यादव की अगुवाई मे गढी जा रही है तभी तो समाजवादी आकाश का नया स्वरूप हर किसी को दिखलाई दे रहा है। अखिलेश यादव समाजवादी आकाश के
Dec
26
2011
जैविक जनकवि थे अदम गोंडवी
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ज़िन्दगी भर मीडिया और साहित्यिकों की नज़रों से ओझल रहे अदम, मरने के बाद सोसल नेटवर्किंग और मीडिया में विवाद के विषय बन गए. कुछ लोग, उनकी अराजक जीवन शैली और मयनवोशी के बहाने उन पर आत्मघात का आरोप लगा रहे हैं. लुछ अन्य लोग उनके साथ हुई उपेक्षाओं और अन्याय का ज़िक्र करके, दया भाव से उन्हें संतों की कोटि में बिठाना चाहते हैं. काश अदम जी होते तो दो टूक जवाब देते खांटी गोंडवी अंदाज में.
“फटे कपड़ों में तन ढाँके गुजरता हो जहाँ कोई
समझ लेना वो पगडंडी अदम के गाँव जाती है.”
“घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है”
और इन विद्वानों से कहते :
“मैंने अदब से हाथ उठाया सलाम को
समझा उन्होंने इससे है खतरा निजाम को.”
"ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नजारों में
मुसलसल फन का दम घुँटता है इन अदबी इदारों में ."
लेकिन वरिष्ठ लेखक-कवि मोहन श्रोत्रिय जैसे लोगों ने अदम की कविताओं की धार और प्रहार के पैनेपन के ही प्र
एक तथ्यपरक मूयांकन के साथ श्रधांजलि दी है: "वह अकेले बहुतेरे कवियों से अधिक
Dec
22
2011
‘अदम’ जो आजीवन अदम ही रहे
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जिसने बुलाया हो उसी के घर में बैठकर उसकी बुराइयों पर गरियाना! अदम के सिवा और कौन कर सकता था ऐसी हिमाकत! कहने की आवश्यकता नहीं, सभागार में बैठे प्रधानों ने कितना हल्ला मचाया था।
‘अदम’ जन्म से ठाकुर यानी क्षत्रिय थे। उनका गाँव भी ठाकुरों का ही था। वहीं वे आजीवन रहे भी। अव्यवस्था, शोषण और अन्याय के प्रति उनकी रगों में खौलता हुआ खून ही था जो उन्हें व्यवस्था की भीड़ में घुसकर मारकाट करने पर आमादा कर देता था। प्रधानों की सभा का वाकय
नहीं, ऐसे दर्जनों अवसर थे जब उन्होंने अत्याचारियों के मुंह पर थूका। कल्पना कीजिए कि- ‘‘दिन-दहाड़े इनको डंडों से सुधारा जाएगा, ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा।’’ अपनी मशहूर नज़्म ‘‘मैं चमारों की गली में ले चलूँगा आपको’’ में यह पंक्तियाँ लिखकर वे किस तरह अपने ठाकुर पट्टीदारों के बीच में रहते रहे होंगें? यह अनायास नहीं कि उनकी जाति-बिरादरी के जमे-जमाये लोग उन्हें सनकी कहते थे!अपने मुख्यमंत्रित्व काल में सपा प्रमुख मुलायमसिंह ने अपने गृह स्थान सैफई में ‘सैफई महोत्सव’ का आयोजन शुरु किया था जो सामाजिक-सांस्कृतिक-व्यापारिक गतिविधियों का राष्ट्रव्यापी केन्द्र हुआ करता था। मुलायम सिंह जी ‘अदम’ को बहुत मानते थे और अदम की सोच भी वामपंथी-समाजवादी ही
Dec
19
2011
लावारिश लाशों की तारणहार
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लावारिश लाशों की इस तारणहार को आप बड़ी आसानी से पीजीआई, चंडीगढ़ में ढूंढ़ सकते हैं. उनका मानना है कि ज्यादातर जरूरतमंद और गरीब लोग पीजीआई में ही आते हैं इसी वजह से वे यहां मौजूद रहती हैं, ताकि जिसे भी उनकी जरूरत हों वे समय पर उसके लिए वहां मौजूद रह सकें.
वे पीजीआई में आये गरीबों की हर तरह से मदद करती हैं. जिनके पास इलाज के लिए पैसों की कमी है उसके लिए पैसों की व्यवस्था करवाना. कई लोग ऐसे भी आते हैं जो इलाज कराने में ही इतना चुक जाते हैं कि वापस लौटने का किराया तक नहीं बचता. वे घर तक पहुंच सकें, इसकी चिंता भी वे करती हैं. शायद अपने इन्हीं परोपकारी कार्यों की वजह से वे पीजीआई में डाक्टरों से ज्यादा आशाभरी नजरों से देखी जाती हैं. वे य
े हारे लोगों के लिए हरिनाम हैं. सम्मान तो निश्चित रूप से उनका यहां के डाक्टरों से अधिक है ही.
लेकिन यह सब भी उनको असाधारण महिला नबीं बनाता. जो बात उन्हें असाधारण बनाती है वह है- उन लावारिश लाशों को यथायोग्य अंतिम संस्कार करवान
े उन देहों को सद्गति मिल सके. जिस समाज में शवयात्रा में भी महिलाओं का जाना
Dec
17
2011
इकहत्तर के असली नायक थे बाबूजी
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१६ दिसंबर १९७१ को दोपहर बाद भारत की तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी ने लोकसभा में घोषणा कर दी कि ढाका अब एक स्वतंत्र देश की राजधानी है और बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश है. इस ऐलान के साथ ही एक नए राष्ट्र का जन्म हो चुका था. पाकिस्तान को ज़बरदस्त शिकस्त मिली थी और हमेशा के लिए सिद्ध हो चुका था कि भारत की सेना के सामने पाकिस्तान की फौज की कोई औकात नहीं है. इंदिरा गाँधी की उस घोषणा के ठीक पहले ढाका में पाकिस्तानी सेना ने भारत के पूर्वी कमांड के मुख्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा के सामने समर्पण कर दिया था. उनके साथ करीब एक लाख पाकिस्तानी सैनिक भी युद्ध बंदी के रूप में भारत के कब्जे में आ गए थे .तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में आतंक का राज कायम करने के लिए पाकिस्तानी फौज ने वहां कुछ ऐसे संगठन बना रखे थे जो फौज की मदद करते थे और बंगलादेश में मानवीयअत्याचार के मुख्य खलनायक थे. इस संगठनों में अल बदर, रजाकार और अल शम्स प्रमुख थे. १४ दिन तक चली लड़ाई के बाद भारत की सेना ने दुनिया के सामने यह साबित कर दिया था कि एक महान राष्ट्र के रूप में भारत ने पहला बहुत
Dec
05
2011
जिंदगी का साथ निभाकर चले गये
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दूसरे विश्व युद्ध का ज़माना था. उन्हें मुंबई में फौजी दफ्तर में एक क्लर्क की नौकरी मिल गयी.मुंबई में उन्हीं दिनों महात्मा गाँधी के नाम का तूफ़ान चल रहा था. ख्वाजा अहमद अब्बास की प्रेरणा और प्रयास से इप्टा (इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसियेशन ) की स्थापना हो चुकी थी. चेतन आनंद इप्टा में जुट चुके थे, देव आनंद भी उनके साथ नाटक के ज़रिते जान जागरण के अभियान में जुट गए. वहां उनकी मुलाक़ात होमी भाभा, क्रिशन चंदर ,कैफ़ी आज़मी ,मजरूह सुल्तानपुरी साहिर लुधियानवी ,बलराज साहनी, मोहन सहगल, मुल्क राज आनंद, रोमेश थापर, शैलेन्द्र, प्रेम धवन, इस्मत चुगताई, एके हंगल, हेमंत कुमार, अदी मर्जबान, सलिल चौधरी जैसे कम्युनिस्टों से हुई. एक बेहतरीन कलात्मक जीवन की बुनियाद पड़ चुकी थी. १९४२-४३ में बने यह दोस्त जब तक जीवित रहे, देव आनंद की बुलंदियों को और ऊंचा करने में सहयोग करते रहे. यह सब यह दुनिया छोड़कर जा चुके हैं . अफ़सोस, आज इप्टा का आख़िरी महान कलाकार भी अलविदा कह गया.
नाटकों में तो वे अपने भाई और बलराज साहनी के साथ बहुत कुछ काम करते रहे लेकिन पहला फ़िल्मी ब्रेक उनको १९४६ में मिला जब महान कलाकार, अशोक कुमार ने उन्हें प्रभात टाकीज की फिल्म हम एक हैं


