आमने-सामने
Feb
21
2012
भाजपा को कुशवाहा भा गये तो हम क्या करें?
By
सवाल-उत्तर प्रदेश में जदयू का भाजपा से चुनावी गठबंधन क्यों नहीं हो पाया?
जवाब-जो बीत गया, सो बीत गया। जदयू का भाजपा से गठबंधन नहीं हो पाया तो इसके लिए हम भाजपा को धन्यवाद देना चाहते ह
से पूरे उत्तर प्रदेश में जो भी जदयू के पुराने कार्यकर्ता थे हम उनके साथ चुनाव मैदान में हैं। अब फैसला जनता के हाथों में है।
सवाल- क्या अब भाजपा से गठबंधन चुनाव के बाद होगा या इसकी कोई संभावना नहीं है?
जवाब-अभी राजग (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) है। आगे भी रहेगा। इसलिए किसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकत
सवाल-ऐसा कहा जा रहा है कि भाजपा-जदयू गठबंधन टूट के कगार पर है?
जवाब- नहीं-नहीं, इस बात में कोई दम नहीं है। राजनीति में ऐसा होता है। कहीं हम एक साथ लड़ते
कहीं हम एक साथ नहीं लड़ते। हमने पहले पांच सूबों में भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा है। कर्नाटक, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में हमने साथ मिलकर लड़ा है। अब भाजपा इस बार उत्तर प्रदेश में हमारे साथ नहीं लड़ना चाहती। वह बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह जैसे लोगों के साथ लड़ना चाहती है। अब वे जॉर्ज फर्नांडिस, नीतीश कुमार और शरद यादव के साथ नहीं चलना
Jan
31
2012
माया साहब को समझना है तो बाबा साहब को समझो
By
सवाल- मायावती की सरकारी खर्चे पर अपनी मूर्ति बनवाने से लेकर मूर्ति ढकवाने के चुनाव आयोग के निर्णय के बाद आई उनकी प्रतिक्रिया को देखते हुए, उन्हें तानाशाह शासक कहना उचित नहीं होगा?
जवाब- मायावती इस समय सभी दलों के लिए चिन्ता बनी हुई हैं। एक दलित परिवार से आकर कोई महिला इतनी तरक्की कर जाए, इसे हजम कर पाना लोगों के लिए मुष्किल हो रहा है। पूरे देष के लिए वे चर्चा का विशय बन गईं हैं। उनकी छोटी से छोटी बात को मीडिया में बड़ा करके दिखाया जा रहा है। इसके पीछ कहीं उनकी छवि जनता के बीच खराब करने की मंशा का ही अनुमान होता है।
सवाल- मायावती पर तो भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे हैं, अन्ना के आंदोलन के समय भी वह अप
ष को लेकर मुखर नजर नहीं आईं, इसका क्या अर्थ निकाला जाए?
जवाब- लोकपाल और जन लोकपाल विधेयक को लेकर ऐसा नहीं था कि मायावती बोली
सवाल- क्या मायावती लोकपाल के समर्थन में हैं?
जवाब- मायावती लल के अन्तर्गत सीबीआई को लाने के पक्ष में हैं। मायावती मानती हैं कि कितना भी कड़ा से कड़ा
Dec
16
2011
वहशी, दरिंदा और मानसिक रोगी है चिन्मयानंद
By
अब आप साध्वी हैं या गौतम की पत्नी?
मैं साध्वी भी हूं और गौतम की पत्नी भी्ण परमहंस विवाहित थे, उन्होंने न सिर्फ अपना जीवन ईश्वर निष्ठा में बिताया, बल्कि नरेंद्र को संन्यास की दीक्षा भी दी। ऐसे कई और उदाहरण हैं। इसके अलावा केवल शंकराचार्य परंपरा में अविवाहित रहने का नियम है और उसमें महिलाओं की दीक्षा वर्जित है। संन्यासी का स्त्रैण शब्द साध्वी नहीं है। यह साधु का स्त्रैण शब्द है। जो स्वयं को साधता है, साधु है। साध्वी है
शादी करने की कोई मजबूरी?
मुझे पता चल गया कि मुझे संन्यास नहीं मिलना है, तो त्रिशंकु जीवन जीने से क्या फायदा! मैंने वैदिक रीति से विवाह किया और इसकी सार्वजनिक घोषणा की।
आपने 10 सालों तक स्वामी का साथ दिया। फिर अचानक इतना बड़ा कांड कैसे हुआ?
देखिए मैं स्वामी के पास संन्यास ग्रहण करने गई थी। हम असफल रहे। स्वामी मुझसे गृहिणी की तरह आश्रम की देखभाल कराना चाहते थे। आगंतुकोें की सेवा करना और उनकी सेवा करना। फिर मैंने जब राजनीति में जाने की बात की, तो वे भड़क गए और मुझे आश्रम छोड़ने को कह दिया।r />केवल वहां से निकली ही नहीं, स्वामी को बदनाम भी किया। आरोप लगाए?
Dec
13
2011
मुझे न्याय के नाम पर कुर्बान किया जा रहा है
By
वहम तब टूटा, जब उसने महसूस किया कि पाकिस्तान और भारत दोनों ही अपने-अपने राजनीतिक मकसद के लिए कश्मीर के बेचैन नौजवानों को मोहरा बना रहे हैं. 1993-94 में उसने सीमा सुरक्षा बल के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, पर उसके बाद उसका जीना और भी मुहाल हो गया. लोग उसे नीची नजरों से देखते और अपने लोगों के मकसद से धोखा देने वाला मानते थे. उधर, सरकार के स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने जैसे यह ठान लिया था कि आत्मसमर्पण करने वाले किसी भी व्यक्ति को वह आम लोगों की तरह इज्जत की जिंदगी बसर नहीं करने देगी. इसकी वजह यह थी कि वे उन्हें मुखबिर बनाना चाहती थी.
एसटीएफ ने उसे और समर्पण करने वाले दूसरे लोगों को शिविर में बुलाकर मुखबिर बनने के लिए मारा, सताया और बेइज्जत किया. अफजल उस समय आंदोलन से जुड़ा नहीं था, लिहाजा वह मुखबिर नहीं बनना चाहता था. उसके मुताबिक सताने के लिए उसे निर्वस्त्र किया गया, उल्टा लटकाया गया, गुदा में पेट्रोल डाला गया और कश्मीर की जमा देने वाली सर्दी में बर्फीले पानी में डुबाया गया. अफजल दावा करता है कि उसके गुप्तांगों में बिजली के झटके दिए गए और बेरहमी से कोड़े मारे गए. अफजल बताता है कि इन्हीं
Aug
01
2011
नेताओं के पिछलग्गू होते हैं नौकरशाह- पीएल पुनिया
By
सवाल- एक लंम्बे समय तक आप प्रशासनिक सेवा में रहे और अब सांसद की भूमिका में है, ज्यादा मजा किसमें आया ?
सवाल मजे का नहीं है, ये एक मौका है सेवा करने का। हमने नौकरी में भी जन सेवा को प्राथमिक दी। पोस्टिंग ख़राब हो या अच्छी मेरी कार्यशैली हमेशा एक जनता के हित में काम करता रहा। पांच जिलों में जिलाधिकारी रहा तो सबसे पहले ऑफिस में वो पट्टी हटवाता था जिसपर मिलने का समय लिखा रहता था। मेरा मानना है कि छोटे अधिकारियों से मिलने में ही जब इतनी परेशानी होती है तभी कोई जिलाधिकारी आवास पर आता है और फिर वहां भी बंदिश ये ठीक नहीं।
सवाल- आपने कई मुख्यमंत्रियों के साथ काम किया है। मुलायम सिंह के साथ भी रहे फिर मायावती के करीबी रहे और अब कांग्रेस के सांसद है ? आम तौर पर ऐसा नहीं होता आपने कैसे मैनेज किया?
जवाब- देखिये जब तक नौकरी में रहा सरकार ने पोस्टिंग दी फिर रिटायर होने के बाद स्वतंत्र निर्णय लिया। पोस्टिंग मेरे निर्णय से नही होती मुलायम सिंह सरकार को जब बर्खाश्त किया गया तब मैं मुलायम सिंह का प्रमुख सचिव था फिर मायावती आय
उन्होंने कहा आप समाज के हैं आप साथ
Apr
19
2011
पॉलिटिकल चैनल होगा न्यूज एक्सप्रेस-मुकेश कुमार
By
सवाल- भारत में न्यूज चैनलों का क्या भविष्य देखते हैं आप?
जवाब- यह तो निर्विवाद है कि माध्यम के रूप में टीवी का भविष्य बहुत उज्ज् िन टीवी पर पत्रकारिता का भविष्य बहुत उज्जवल है इसे बहुत विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता. क्योंकि जिस तरह से एक तरफ सरकार ने और दूसरी तरफ बाजार ने पत्रकारिता का गला पकड़ रखा है उसमें उसकी मुखरता पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है. इसलिए टीवी माध्यम के विकास की संभावनाएं बहुत प्रबल हैं लेकिन टीवी पत्रकारिता की संभावनाएं बहुत दुर्बल हैं.
सवाल- यह विरोधाभास क्यों है?
जवाब- विरोधाभास इसलिए क्योंकि जब सारी चीजें खरीद, फरोख्त और नफा नुकसान के आधार पर तय होगी तो जिन मूल्यों पर पत्रकारिता खड़ी होती है और चलती है वह खतरे में पड़ जाती है. उसके विकास की संभावनाएं कुंद पड़ने लगती हैं. पिछले दो दशकों से हम इसे अपनी आंखों से देख रहे हैं. उससे पहले हालात बहुत अच्छे थे ऐसा नहीं कहा जा सकता लेकिन पिछले दो दशक में स्थितियां बद से बदतर हुई हैं.
सवाल- क्या इन्फोटेनमेन्ट का दौर भी चला गया?
जवाब- अभी वह दौर ख
नहीं हुआ है.सवलेकिन इस इन्फोटेनमेन्ट में इन्फार्मेशन कहां है?
जवाब- इन्फार्मेशन है. लेकिन
Mar
29
2011
यह परिवार क्रांति है- विजय कौशल
By
सवाल- मंगलमय परिवार की अवधारणा क्या है?
जवाब- मंगलमय परिवार एक विचार है. यह कोई संस्थानहीं है. हम पूरे समाज को बदलने के लिए काम नहीं कर रहे हैं. लेकिन हम इतना जरूर कर रहे हैं जो सदाचारी और करूणावान लोग हैं उनको आदर्श के रूप में स्थापित किया ताकि उनके आलोक में शेष समाज अपना मार्ग देख सके. इसी को कहा है कि महाजनो येन गतः स पंथा. आप देखिए, चारों ओर कैक्टस की खेती की जा रही है. मैं उस खेती को समूल नष्ट तो नहीं कर सकता लेकिन कुछ आंगन में आनंद के, धर्म के, प्रसन्नता के, सदाचार के रूप में कुछ फूल खिला दूं यही हमारा काम है.
सवाल- कोई आध्यात्मिक गुरू आध्यात्म की बजाय जब परिवार की बात करता है तो लोगों की क्या प्रतिक्रिया होती है? आपके इस मंगलमय परिवार की ग्राह्यता कितनी है?
जवाब- ग्राह्यता पूरे देश में है. सर्वत्र एक ही बात सुनने में आयी है कि पहली बार किसी साधु के मुख से धर्म, मोक्ष, ज्ञान, भगवत साक्षात्कार की बात से हटकर परिवार की बात सुनने को मिल रही है. परिवार भारतीय समाज व्यवस्था की मूल इकाई है. जैसे दुनिया में हर जगह व्यक्तिनिष्ठ जीवन को बढ़ावा मिला है
Mar
22
2011
हमारे लिए वे कोई महत्व नहीं रखते जो हमें धमकी देते हैं
By
प्रणव रॉय- तुमसे पूरी दुनिया नाराज है. तुम्हारा अपना देश आष्ट्रेलिया तुम्हें अपने यहां नहीं आने दे रहा है. अमेरिका तुम्हें गिरफ्तार करना चाहता है. स्वीडेन में तुम्हारे ऊपर बलात्कार का मामला दर्ज है. पश्चिमी देश कानून के शासन पर गर्व करते हैं. ऐसे में तुम्हें डर नहीं लगता कि ये तुम्हारे ऊपर हमला कर सकते है?
जूलियन- मुझे दुख है कि अमेरिका ने अपने ही संस्थापकों द्वारा स्थापित परंपराओं का उल्लंघन किया है. ये महान परंपराएं फ्रेंकलिन और मेडिसन की बनाई हुई है. लेकिन आज आजादी को छीनने के लिए इसी अमेरिका में विधेयक पारित किये जा रहे हैं. इसलिए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि ये बातें झटका देनेवाली नहीं हैं बल्कि इन्हें देखकर सुनकर दुख होता है. पिछले चार पांच सालों से हम विकीलीक्स के लिए अमेरिकी सेना की गतिविधियों पर नजर ऱखे हुए हैं. हम देख सकते हैं कि सुरक्षा का ताना बाना बहुत तेजीा है. यह ताना सिर्फ वाशिंगटन तक सीमित नहीं है. यह सभी पश्चिमी देशों तक फैल चुका है. फिर भी पश्चिमी जगत में एक बड़ा वर्ग सुरक्षा के इस ताने बाने को तोड़ने का काम कर रहा है. विकीलीक्स इसका उदाहरण है. खुलासों के बाद जिस तरह से विकीलीक्स को सामग्री
Jan
30
2011
पूर्ण हो चुका है कश्मीर का भारत में विलय
By
सवाल- जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में विलय के संबंध में उमर अब्दुल्ला के बयान पर आपका क्या कहना है?
जवाब- हां, मैंने भी सुना था। राज्य विधानसभा में सशर्त विलय की बात उमर ने कही थी। लेकिन ऐसा कोई समझौता तो नहीं हुआ था। विलय का अधिकार राज्योओं को था। महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जो एकदम पूर्ण था। यह विलय अन्य राज्यों से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं था। गवर्नर जनरल ने उसको स्वीकार भी कर लिया था। विलय के हस्ताक्षर होने में नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं की कोई भूमिका नहीं थी। साथ ही उस समय के प्रजा मंडल के सदस्यों की भी कोई भूमिका नहीं थी। हालांकि 3 अक्टूबर को श्रीनगर में हुई नेशनल कान्फ्रेंस की बैठक में शेख ने विलय का समर्थन करने का फैसला लिया था। यह जनता की राय थी लेकिन इस बात को उन्होंने उजागर नहीं किया।
विलय पत्र का जो मसौदा तैयार किया गया था उसमें किसी अंग्रेज की भूमिका नहीं थी; बल्कि गृह मंत्रालय ने तैयार किया था। इस मंत्रालय के प्रमुख सरदार पटेल थे। अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पटेल को राज्यों के विलय का विशेष
Jan
25
2011
किसानों को कर्महीन बनाया जा रहा है
By
आवेश तिवारी- आपको क्या लगता है ,पिछले एक दशक के दौरान विदर्भ कितना बदला है और यहाँ कि खेती कितनी बदली है?
शुकदास जी महाराज –सच कहूँ तो विदर्भ में कुछ भी नहीं बदला। यहाँ सिर्फ सोयाबीन की उपज बढ़ी है और बारिश के पानी पर निर्भर उपजों की पैदावार बढ़ी हैच है कि आज भी यहाँ पर पानी के वहीँ परम्परागत साधन मौजूद है जो एक दशक पूर्व थे, चूँकि सिंचाई के संसाधनों को विकसित नहीं किया गया सो खेती किसानी में भी कोई आमूल –चूल परिवर्तन नहीं हुआ।
आवेश तिवारी –विदर्भ के किसान लगातार आत्महत्या कर रहे थे ,क्या आपको लगता है इस स्थिति में परिवर्तन आया है ?
शुकदास जी महाराज –निश्चित तौर पर स्थिति में परिवर्तन आया है ?लेकिन जिन किसानों के पास कृषि के अलावा रोजगार साधन मौजूद हैं वहीँ खुशा
हैं बाकी कृषि पर निर्भर किसानों के हालात में कोई खास परिवर्तन नहीं आया आपको पता है कि महाराष्ट्र में सीलिंग एक्ट लागू है जिसमे हर एक परिवार को ५४ एकड़ दिए जाने का प्रावधान है अफ़सोस ये है कि किसानों के पास मौजूद भूमि पीढ़ी दर पीढ़ी कम होती चली जाती है ,आज महाराष्ट्र में सीमान्त कृषकों की संख्या में तेजी


