कॉरपोरेट मीडिया
Feb
14
2012
जागरण ने पेश किया पेड न्यूज का नायाब उदाहरण
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15 फरवरी को इस क्षेत्र में मतदान से पूर्व जागरण में छपे ये दो विज्ञापन संकेत करते हैं कि चुनाव आयोग की सख्ती के बावजूद भी अखबारों ने पेड न्यूज के नये नये तरीके इजाद कर लिये और कारोबार को अंजाम दिया. लोकसभा चुनाव में अखबारों से जो सबसे बड़ी शिकायत थी वह यह कि जो कन्टेन्ट लिखा गया उसमें विज्ञापन शब्द नहीं लिखा गया इसलिए उससे यह समझने में मुश्किल हुई कि अखबार में छपी सामग्री समाचार है या विज्ञापन. तो इसका तोड़ जागरण ने कुछ यूं निकाला है कि सामग्री तो विज्ञापन है लेकिन विज्ञापन के अंदर जो लिखा है वह समाचार है.
ये दोनों विज्ञापन दो अलग अलग उम्मीदवारों के हैं. इसमें एक उम्मीदवार रोहनिया से बसपा के प्रत्याशी रमाकांत सिंह पिन्टू का है तो दूसरा विज्ञापन पिण्डरा से निवर्तमान विधायक और दबंग माफिया अजय राय का है. वैसे तो इन दोनों ही विज्ञापनों में बहुत छोटे अक्षरों में advt लिखकर विज्ञापन होने का संकेत किया गया लेकिन इन विज्ञापनों में ही असली खेल है. विज्ञापन के साथ ही यह भी लिखा हुआ है कि यह संबंधित प्रत्याशी द्वारा जारी किया गया है. जाहिर है, ऐसा करने से विज्ञापन का खर्च प्रत्याशी के खाते में जुड़ जाएगा
Feb
10
2012
पेड न्यूज की हिन्दुस्तानी पाठशाला
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यह जो हिन्दुस्तान अखबार है उसके साथ आजादी के आंदोलन की कई यादें जुड़ी हुई हैं. इसके संपादकों का अपना एक इतिहास रहा है इसलिए अगर यह अखबार दावा करे कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को समझाने का जिम्मा उसका है तो उसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं नजर आती. अतीत के अलावा वर्तमान में भी अखबार दावा करता है कि वह देश का सबसे तेजी से बढ़ता अखबार है। लेकिन तेजी से बढ़ने वाला यह अखबार अपने पाठकों को किस तरह गफलत में डाल रहा है इसका अंदाजा आपको इस तफ्शीस से लग जाएगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों का अगर कवरेज आप देखेंगे तो पायेंगे कि वह न सिर्फ लोकतंत्र के साथ बल्कि अपने पाठकों के साथ भी धोखाधड़ी कर रहा है। विधानसभा चुनाव के पहले इस अखबार ने आओ राजनीति करें नाम से एक बड़े कैम्पेन की शुरूआत की थी। कहा गया था कि कैम्पेन से यूथ को राजनीति से जोड़ेगे और राजनीति को धो पोछकर चिकना चुपड़ा बना देंगे। यही शशि शेखर ने लंबे चौड़े लेखों में बड़े बड़े दावे किये थे। अखबार ने पहले पेज पर एक संकल्प छापा था कि वह चुनाव को निष्पक्ष तरिके से कवरेज करेगा और पेड न्यूज से अपने आपको दूर रखेगा लेकिन इस संकल्प
Feb
07
2012
गांधी परिवार का मीडिया परिवार
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उनकी हर बात बल्कि वही बात बार बार दिखाई जा रही है। अब प्रियंका गांधी ने तो नहीं कहा होगा कि आइये हमारे पीछे-पीछे चलिये। मीडिया खुद ही दरी बिछाकर लेटने के लिए तैयार है तो क्या किया जा सकता है। प्रियंका की राजनीतिक अहमियत तो समझ आती है मगर रॉबर्ट वाड्रा को भी कवरेज की कमी महसूस नहीं हुई होगी। राबर्ट वाड्रा पर मीडिया टूट और टूटा पड़ा रहा।
राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के बीच प्रियंका गांधी एक ख़बर ज़रूर हैं। लेकिन जब यह ज़रूरत निष्ठा में घुलने मिलने लगती है तब समस्या होती है। समस्या उन चिरकुट पत्रकारों को ही होती है जो सत्ता के साथ चुपचाप तालमेल बिठाकर नहीं रहना जानते। अगर आप टीवी पर कवरेज का प्रतिशत निकालें तो प्रियंका के आने के बाद से यह संतुलन गांधी परिवार के पक्ष में ही बैठता है। जितना राहुल को दिखाया जाता है उतना अखिलेश या मायावती को नहीं। मुलायम तो शायद ही कभी-कभी। अजित सिंह भी नज़र नहीं आते। अब इसके लिए गांधी परिवार को क्यों दोष दें? उन्होंने
र्कुलर तो जारी नहीं किया होगा कि अरे भाई आओ,हमीं को दिखाओ। मीडिया सचमुच इस परिवार की सत्ता को सह्रदय स्वीकार करता है। इसलिए नहीं कि
Jan
16
2012
फॉलो मी! ड्यूड
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ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की इस रिपोर्ट के नतीजे सकारात्मक बदलाव की ओर संकेत कर कर रहे हैं। इस अध्ययन के मुताबिक राजनेताओं और पत्रकारों ने यह सीख लिया है कि सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट का इस्तेमाल कैसे किया जाए। इन वेबसाइटों की वजह से पिछली छह मई को ब्रिटेन में हुए आम चुनावों के दौरान 18 से 24 साल की नौजवानों ने मतदान में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। जबकि ब्रिटेन के युवाओं में मतदान को लेकर हाल के दिनों में भारी गिरावट देखने को मिल रही थी। बहरहाल ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने यह सर्वे तीन से आठ मई के बीच कराया था। जिसका मकसद चुनावी रुझानों की जानकारी हासिल करना था। हालांकि राष्ट्रव्यापी अध्ययन के मुताबिक 18 से 24 साल के युवाओं ने माना कि उन्होंने आम चुनाव पर टिप्पणी के लिये सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल किया। उनमें से 81 प्रतिशत ने चुनाव अभियान में अपनी दिलचस्पी दिखाई। इस सर्वे के मुताबिक इस आयु वर्ग के युवा मतदाताओं ने राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ी ज्यादातर सूचनाएं ऑनलाइन मीडिया के जरिये हासिल की। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म की ओर से प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक फेसबुक जैसे सोशल मीडिया से जुड़ने और टीवी एवं रेडियो पर विज्ञापनों से प्रभावित होकर
Jan
14
2012
नेट के बारे में बदनीयत सरकार
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दिल्ली के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट सुदेश कुमार से समक्ष रखी गई दो पेज की रिपोर्ट में विभाग ने कहा, “प्राधिकृत अधिकारी ने निजी तौर पर अपने सामने रखे गए सारे रिकॉर्ड व सामग्रियों का निरीक्षण किया और उन्हें देखने-परखने के बाद संतुष्ट हुए कि आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के अनुच्छेद 153-ए, 153-बी व 295-ए के अंतर्गत मुकदमा चलाने का पर्याप्त आधार बनता है।”
यह रिपोर्ट तब पेश की गई जब अदालत ने विदेश मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वह विदेश में स्थित दस कंपनियों तक समन पहुंचाने की व्यवस्था करे। अदालत ने 23 दिसंबर को कुल 21 सोशल नेटवर्किंग साइटों के नाम समन जारी किए थे। इनमें 11 के दफ्तर भारत में हैं। बाकी दस के विदेश में। अदालत ने इन पर आपराधिक साजिश और युवा लोगों को अश्लील किताबों व सामग्रियों की बिक्री का आरोप लगाया था। उसने कहा था कि इन कंपनियों के खिलाफ प्रथमदृष्टया वर्गों के बीच दुश्मनी फैलाने, राष्ट्रीय अखंडता के प्रति पूर्वाग्रह पैदा करने और किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक मत को अपमानित करने का मामला
है। लेकिन केंद्र या राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट के पूर्व अनुमति के बिना समन तो तामील नहीं किया जा सकता।
अब केंद्र
Jan
07
2012
छत्तीसगढ़ के चक्रव्यूह में फंसा मीडिया
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गुजरे 2011 (राज्य में पत्रकारों के लिये सबसे असुरक्षित वर्ष) को छोड़ दें तो रमन-राज के सात सालों तक मीडिया और मुख्यमंत्री के बीच गुड़ी-गुड़ी चलता रहा. सरकार और उनके मंत्रियों से जुड़ी हर अच्छी-बुरी खबरें, उपलब्धियांं, पुरस्कार और योजनाओं ने खूब सुर्खियां बटोरी. मासिक अखबारों से लेकर अन्तरराष्ट्रीय स्तर तक के अखबारों में रमन का सुशासन चर्चित रहा. यहां तक कि कई सर्वेक्षणों में उन्हें देश का उम्दा मुख्यमंत्री तक बताया गया. छत्तीसगढ़ के पत्रकारों ने उन्हें सर आंखों पर बैठाया और मुख्यमंत्री का ताजा दुबारा हासिल करने में खासी मदद की. मीडिया ने इसकी परवाह नहीं की कि स्वामी अगिनवेश या विनायक सेन की पैरोकारी करने वाले लोग उस पर मुख्यमंत्री के हाथों बिकने के आरोप लगा रहे हैं. आश्चर्य यह कि खुद मुख्यमंत्री ने ऐसे आरोपों का कई मंचों से करारा जवाब दिया. यह कहने में गुरेज नहीं कि मुख्यमंंत्री ने पत्रकारों को ना तो कभी दबाया और ना ही धमकाया. उनकी प्रवृत्ति भी नहीं है. उन्हीं के शब्दों में सुन लीजिये : मैं दुनिया का सबसे अहिंसक आदमी हूं. आज तक किसी को एक झापड़ नहीं मारा.
फिर ऐसा क्या हुआ कि एक प्रेस कांफे्रेंस में मुख्यमंत्री ने कुछ मीडिया संस्थानों को ‘देख लूंगा’ जैसी
Dec
13
2011
छत्तीसगढ़ में पत्रिका बनाम पत्रकारिता
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जब माधवराव सप्रे ने छत्तीसगढ़ मित्र का प्रकाशन शुरू किया था तब वो समय था जब सच्चे अर्थों में अखबार, तोप के मुकाबिल ही हुआ करती थी. जब किसी संपादक का वेतन उसे छ: महीने या साल भर जेल की सज़ा के रूप में मिल सकता है, ऐसा विज्ञापित होने पर भी उस काटों का ताज पहनने को अपनी अच्छी कमाई-धमाई का काम छोड़कर विद्वतजन पिल पड़ते थे.
प्रदेश ने ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ से लेकर ‘छत्तीसगढ़’ हो जाने तक पत्रकारिता के विभिन्न आयामों को छुआ है, समेटा है, नया मानदंड तय किया है. लेकिन कई बार यहां की संस्कृति से सरोकार या कम से कम, स्नेह भी नहीं रखने वाले कुछ पत्रकारों ने प्रदेश को लांछित करने का भी काम किया है. प्रदेश बन जाने के बाद यहां ऐसे तीन ऐसी मुख्य वाकये का जिक्र किया जा सकता है जब सम्प्रेषकों ने शोषक की भूमिका अख्तियार कर मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी थी. पहले एक साहित्यिक कहे जाने वाले
का द्वारा प्रदेश के सबसे ख़ूबसूरत अंचल बस्तर को हबशियों का स्वर्ग बता कर खुद के विश्वासघात को महिमामंडित करना. दूसरा एक राष्ट्रीय कहे जाने वाले चैनल द्वारा एक नकली एमएमएस दिखा कर उसे एक उभरती नेत्री से जोड़ कर
Dec
09
2011
मीडिया पर भी लगाओ लोकपाल की लगाम
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मीडिया के चरित्र को लेकर अभी बवाल मचा हुआ है। बयानों को लेकर कोहराम है। उंगलियां दोनों ओर उठ रही हैं। यह तब हुआ जब उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश और फिलहाल प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कडेय काटजू ने भारतीय मीडिया की कुछ खामियों को सामने लाया है। मार्कडेय मानते है कि, ‘हमारा मीडिया फासिस्ट है इस पर नजर रखना जरूरी है। उनकी राय में, ’‘भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा खासतौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जनता के हितों को पूरा नहीं करता, वास्तव में इनमें से कुछ यकीनन जनविरोधी है। भारतीय मीडिया में दोष हैं। जिन्हें मैं रेखांकित करना चाहता हूँ। मीडिया अक्सर लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दों की ओर से अ-वास्तविक मुद्दों की ओर भटकाता है। मीडिया अक्सर लोगों को विभाजित करता है’’(देखें- इंडियन एक्सप्रेस 4 नवम्बर 2011)। श्री काटजू के स्टेटमेंट पर विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बौखलाहट देखी गयी। देखा जाय तो श्री काटजू ने उन्हीं चीजों की तरफ इशारा किया है, जो मीडिया को भ्रष्टाचार में लवरेज करने से परहेज नहीं करता, बल्कि सुनिश्चित करता है। एक दौर था जब पत्रकारिता की बागडोर वैसे पत्रकारों के हाथ में थी जो इसे मिशन के तौर पर अपनाये हुए, थे वे आज इतिहास के पन्नों में कैद हैं। वहीं
Dec
08
2011
साख पर लगता सवालिया निशान
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पत्रकार को पत्रकार होने या कहने से बचने के लिये मीडिया शब्द से ही हर कोई काम चला रहा है, जिसे संयोग से इस दौर में इंडस्ट्री मान लिया गया है और खुले तौर पर शब्द भी मीडिया इंडस्ट्री का ही प्रयोग किया जा रहा है। तो मीडिया इंडस्ट्री पर कुछ कहने से पहले जरा पत्रकारीय काम को समझ लें। जो मुंबई में मिड डे के पत्रकार जे डे की हत्या के बाद एशियन ऐज की पत्रकार जिगना वोरा की मकोका में गिरफ्तारी के बाद उठा है। पुलिस फाइलों में दर्ज नोटिंग्स बताती हैं कि मिड डे के पत्रकार जे डे की हत्या अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन ने इसलिये करवायी क्योंकि जे डे छोटा राजन के बारे में जानकारी अंडरवर्ल्ड के एक दूसरे डॉन दाउद इब्राहिम को दे रहा था। एशियन ऐज की पत्रकार जिगना वोरा ने छोटा राजन को जेडे के बारे में फोन पर जानकारी इसलिये बिना हिचक दी क्योंकि उसे अंडरवर्ल्ड की खबरों को बताने-दिखाने में अपना कद जेडे से भी बड़ा करना था। दरअसल, पत्रकारीय हुनर में विश्वसनीयता समेटे जो पत्रकार सबसे पहले खबर दे दे, उसका कद बड़ा माना ही जाता है। जब मलेशिया में छोटा राजन पर जानलेवा हमला हुआ और हमला दाउद इब्राहिम
Dec
01
2011
अपराधी हो गये अपराध को रिपोर्ट करते करते
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जिग्ना वोरा अपने जीवन में जो चाहती थी, वह मुकाम उसे मिल गया। वह खबरों में रहना चाहती थी, खबरों को जीना चाहती थी और अपराध की खबरों के जरिए प्रचार पाकर अपराध की खबरों में छा जाना चाहती थी। वह छा गई। खबर लिखकर जीते जी अमर हो जाने की कोशिश में उसने जो किया, उसी की वजह से वह अब खबरों में है। लेकिन उसने जो कुछ किया, या शुभचिंतकों की बात मानकर यह कहें कि उससे जो भी हो गया, उसका अंजाम जेल के अलावा कुछ और हो ही नहीं सकता था, यह तो वह जानती ही थी। और नहीं जानती थी, तो वह बेवकूफ थी। वैसे भी, अपराध की दुनिया की तासीर यही है कि उसे करनेवाला, करवानेवाला और किए हुए को जीनेवाला भले ही वह समझदार हो या भोंदू, अंतत: खुद भी उसी के तानेबाने का अटूट हिस्सा बन जाता है। अपराध कवर करते करते लोग अपराध के अंजाम में पूरी तरह समा भले ही नहीं जाते तो, उसका हिस्सा तो बन ही जाते हैं। कई सारे खबरी भी बन जाते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे राजनीतिक पत्रकारिता करते करते हमारे बहुत सारे साथी राजनीति में आ गए। संजय निरुपम, राजीव शुक्ला और अरुण शौरी


