कॉरपोरेट मीडिया

पत्रकारिता के माथे का कलंक
 

पत्रकारिता के माथे का कलंक

आईबीएन समूह के सर्वेसर्वा राजदीप सरदेसाई अगर ब्रिटेन या अन्य यूरोपीय देशों में होते तो निश्चित मानिए कि उनकी जगह जेल होती और उनके न्यूज चैनल आईबीएन पर ताला जड़ गया होता। सामाजिक जलालत अलग से झेंलनी पड़ती। कानूनों की घेरेबंदी में इनकी ईमानदारी के पचखडे उड़ गये होते। इनकी पेज थ्री संस्कृति जमींदोज हो जाती। सड़कों पर चलने के दौरान इनके उपर अंडे-टमाटरों की बरसात होती। इनकी ज्ञात और अज्ञात संपति भी अपराध की श्रेणी में खड़ी होती। लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हुआ है जिसका मतलब है कि अनैतिक, पतनशील और भ्रष्ट सत्ता वाली व्यवस्था के अंतर्गत ही राजदीप सरदेसाई जैसी संस्कृति जन्म ले सकती है और फल-फूल सकती है। ... Full story

पतन प्रदेश का जनसंदेश
 

पतन प्रदेश का जनसंदेश

ये उत्तर प्रदेश नहीं पतन प्रदेश है। इस पतन प्रदेश में मीडिया की हिस्सेदारी किसी भी राजनैतिक पार्टी से कहीं ज्यादा है। भ्रष्ट सरकार, अतिभ्रष्ट नौकरशाहों के इस प्रदेश में मीडिया की नयी फसल तैयार है। इस फसल में आपको पत्रकार भी मिलेंगे, अखबार भी मिलेंगे और वो सभी साजो समान भी मिलेंगे जिनसे अखबार सिर्फ और सिर्फ बाजार की चीज बनकर रह जाता है। यकीन न आये तो लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स और डेली न्यूज एक्टिविस्ट में पिछले एक सप्ताह से छापी जा रही प्रथम पेज की ख़बरों को देख लें। ... Full story

अखबार मुकाबिल हो तो अखबार निकालो
 

अखबार मुकाबिल हो तो अखबार निकालो

पता नहीं जनता जनार्दन को याद है या नहीं लेकिन जिन दिन उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर से मायावती द्वारा वित्त पोषित जनसंदेश टाइम्स का प्रकाशन शुरू हुआ था हमने अपनी आपत्ति दर्ज करते हुए कहा था कि यह गलत परंपरा पड़ रही है. अगर सरकारें अब अखबार भी निकालेंगी तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में बड़ी खलल पैदा हो जाएगी. खलल पैदा होनी शुरू हो गयी. अखबार िजस काम के लिए निकला था, जब उसने उसे अंजाम देना शुरू किया तो विवाद ने आकार लेना शुरू कर दिया. ... Full story

फेसबुक माइनस, गूगल प्लस
 

फेसबुक माइनस, गूगल प्लस

इंटरनेट की आक्रामक तेजी के बीच फेसबुक की चढ़ती बढ़त को रोकने के लिए आखिरकार गूगल के लैरी पेज ने नुख्सा खोज ही लिया. इसी साल फेसबुक और गूगल के बीच जो झगड़ा शुरू हुआ था उसका चरम यह हुआ कि गूगल ने फेसबुक को अपने ईमेल उपलब्ध कराने बंद कर दिये. मजबूरन फेसबुक ने अपनी सोशल नेटवर्किंग साइट पर चैट की सुविधा की साथ साथ इमेल एकाउण्ट देना भी शुरू कर दिया. गूगल ने जब तक ईमेल उपलब्ध न करवाने का यह निर्णय लिया फेसबुक दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी वेबसाइट बन चुकी थी. गेंद फेसबुक के पाले में थी और फेशबुक ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए गूगल की कई सेवाओं को कड़ी टक्कर देनी शुरू कर दी थी. ... Full story

छिछोरी और गटरछाप पत्रकारिता का अंत
 

छिछोरी और गटरछाप पत्रकारिता का अंत

इस अखबार के छपते हुए अगर आप इसके बारे में नहीं जानते थे तो इसके बंद होते समय ही सही लेकिन इसके बारे में जानिए। यह अखबार 168 साल पुराना है। अखबार की पहली प्रति 1843 में प्रकाशित हुई थी. इस अखबार के प्रकाशन की खासियत यह थी कि उस दौर में यह सबसे सस्ता अखबार था जिसका मकसद था कम कीमत पर ज्यादा लोगों तक समाचार पहुंचाना। लेकिन 1969 में मीडिया मुगल कहे जाने वाले व्यापारी रूपर्ट मर्डोक ने इसे खरीद लिया। रुपर्ट मर्डोक ने न्यूज आफ वर्ल्ड के जरिए ऐसी पत्रकारिता की जिसे मीडिया विशेषज्ञ आनंद प्रधान गटरछाप पत्रकारिता करार दे रहे हैं. आनंद प्रधान मानते हैं कि 10 जुलाई को इस अखबार के प्रकाश का बंद होना मर्डोक के आर्थिक साम्राज्य की सोची समझी कवायद भर है। ... Full story

ग्लैमर की चकाचौंध में गुम होते सामाजिक सरोकार
 

ग्लैमर की चकाचौंध में गुम होते सामाजिक सरोकार

प्रबंधन के पारंपरिक पाठ्यक्रमों में सिखाया जाता रहा है कि हर धंधे की नैतिकता होती है। प्रबंधन का पारंपरिक तरीका नहीं अब नहीं रहा, 1991 में शुरू हुए उदारीकरण ने धंधा शब्द को भी प्रोफेशन के बतौर स्थापित कर दिया है। लिहाजा प्रोफेशन की मान्यताएं भी बदल गई हैं। उदारीकरण और वैश्वीकरण की शुरूआत के दौर में इसके नफे-नुकसान को लेकर बहसों का जो दौर चल रहा था, उसमें एक सवाल प्रमुखता से उठा था। वह था प्रोफेशन की नैतिकता और सांस्कृतिक गिरावट का। जानकारों को आशंका थी कि उदारीकरण के दौर में पैसा बनाने के लिए नैतिकता और वर्जनाओं की सीमाएं टूटेंगी। जो निश्चित रूप से सामाजिक जीवन के लिए अच्छा नहीं होगा। नीरज ग्रोवर की हत्या के आरोप से छूट गई कन्नड़ अभिनेत्री मारिया सुसईराज को कलर्स चैनल के बहुप्रचारित शो बिग बॉस से ऑफर मिलने और उसके बदले में पांच करोड़ रूपए की भारी-भरकम रकम देने की खबर उदारीकरण के शुरूआती दौर की उन्हीं आशंकाओं को ही सही साबित कर रही है। ... Full story

मालदार मारन को मार गया मीडिया
 

मालदार मारन को मार गया मीडिया

पहले तहलका। उसके बाद इकोनॉमिक टाइम्स। उनके साथ पूरे देश का मीडिया। फिर सीबीआई। और अब इस देश में सबकी माई ‘बाप’ सुप्रीम कोर्ट। दयानिधि मारन की हवा टाइट है। अब बोलती बंद है। लेकिन कुछ दिन पहले तक बहुत फां-फूं कर रहे थे। तहलका ने जब सबसे पहले मामला सामने लाया तो उसको मानहानि का दावा ठोंकने की धौंस दिखाई। इकोनॉमिक टाइम्स ने खबर छापी तो उसको भी डराने की कोशिश की। मगर पहले भारत सरकार के कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल यानी सीएजी ने मारन के चोर होने की बात कही तो दयानिधि की सांस हलक में ही अटक गईं। और अब जब, सीबीआई ने इस देश में सबकी माई ‘बाप’ सुप्रीम कोर्ट में कहा कि मारन ने बहुत माल कमाया है, तो बोलती बिल्कुल बंद हो गई है। मीडिया ने आईना दिखाया तो, आंख दिखा रहे थे। मानहानि की धोंस दिखाई। कोर्ट में घसीटने के नोटिस दे दिए। अब क्या सीएजी और सीबीआई को भी कोर्ट में घसीटोगे ? और सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया तो उसको कौनसी कोर्ट में बुलाओगे मारन ! ... Full story

आईएनएस द्वारा अखबारी घरानों के समर्थन में जारी विज्ञापन
 

मजीठिया आयोग की सिफारिशों का मजाक

पत्रकारों के वेतनमान को लेकर बने मजीठिया आयोग की सिफारिशों को मजाक बनाया जा रहा है. बड़े अखबारी घराने और मीडिया हाउस मजीठिया आयोग के बारे में भ्रामक जानकारियां फैला रहे हैं और उनकी सरगना संस्था इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी इस काम में उनका साथ दे रही है. मसलन अखबारों में विज्ञापन दिये जा रहे हैं कि अगर आयोग की सिफारिशें लागू हो गयीं तो चपरासी को भी चालीस हजार की तनख्वाह देनी पड़ेगी. ये अफवाहें और मजीठिया आयोग की ये सिफारिशें सिर्फ एक हजार करोड़ से ऊपर के कारोबार वाले घराने पर लागू होते हैं. मजीठिया आयोग की सिफारिशों को मजाक बनाये जाने पर आनंद प्रधान का विश्लेषण- ... Full story

संपादकों के साथ मीटिंग करते मनमोहन सिंह
 

मनमोहन की मीडिया

इसे आप मनमोहन का मीडिया मैनेजमेंट कहें तो ज्यादा अच्छा है। देश के प्रधानमंत्री की वरिष्ठ पत्रकारों से मुलाक़ात महज पहले पेज की लीड स्टोरी भर नहीं है ,ये देश भर के छोटे मझोले अख़बारों,जैसे तैसे चलाये जा रहे चैनलों और वैकल्पिक मीडिया के द्वारा भ्रष्ट सरकार के खिलाफ शुरू की गयी उस क्रान्ति को ख़त्म करने की एक बड़ी कोशिश है जिस क्रांति ने कांग्रेस के खिलाफ आपातकाल से भी बड़ा जनमत पैदा करने का काम कर दिखाया है, सिंहासन से खदेड़े जाने से भयभीत सरकार सरकार के पक्ष में खबरिया प्रबंधन के लिए पत्रकारिता की उस वरिष्ठता सूची का इस्तेमाल कर रही है। इस सूची में कभी बरखा दत्त, प्रभु चावला और वीर संघवी भी आते थे। शर्मनाक ये है कि जिस एक वक्त अखबारों को सीधे सीधे सत्ता के खिलाफ नाफ़रमानी का प्रस्ताव पारित करना चाहिए था ठीक उस एक वक्त चाय के प्याले में देश की जनता के आक्रोश और उनकी उतेजना को डुबो देने का काम किया गया। ... Full story

स्थानीय पत्रकार विनय तरुण को याद करने के बहाने स्थानीय पत्रकारिता पर संवाद
 

दोयम दर्जे के न्यूज रूम का दर्द

इसमें कोई दो राय हो ही नहीं सकती कि टेलीवीजन पत्रकारिता ने पूरी पत्रकारिता के स्वरूप को अपनी सुविधा के अनुसार बदला है. इस टेलीवीजन पत्रकारिता के जनक एसपी सिंह कहे जाते हैं जिन्होंने आज तक रूपी एक आधे घण्टे की बुलेटिन का प्रयोग किया और वह इतना सफल हुआ कि देश में टेलीवीजन पत्रकारिता की नींव पड़ गयी. एसपी सिंह कस्बे से आते थे. उन्होंने लोकल रिपोर्टिंग की या नहीं कह नहीं सकते लेकिन टेलीवीजन ने पत्रकारिता में जिस केन्द्रीयकरण को प्रमुख कर दिया है उसका सीधा असर जिले और स्थानीय पत्रकरिता पर हुआ है. अखबारों के मल्टी एडिशन एडिक्शन के दौर में स्थानीय पत्रकारों की दशा और मनोदशा दोनों समझने की जरूरत है. हाल में युवा पत्रकार सचिन श्रीवास्तव ने एक दूसरे युवा पत्रकार विनय तरुण की पुण्यतिथि पर विनय के बहाने स्थानीय पत्रकारिता एक बेहतरीन वक्तव्य दिया. विनय तरूण की 22 जून 2010 को ऑफिस आते हुए ट्रेन हादसे में मौत हो गई थी. स्थानीय पत्रकारिता के सामने मौजूद चुनौतियों और उसकी संभावनाओं पर सचिन श्रीवास्तव का विश्लेषण- ... Full story

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Rajesh Singh

Rajesh Singh

मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.