जंतर मंतर
Dec
11
2011
अन्ना के अनशन का आठवां आयाम
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जार्ज पंचम ने आज से सौ साल पहले दिल्ली के एक छोर पर दरबार लगाया था. वह भी 11 दिसंबर ही था और यह भी 11 दिसंबर ही है जब अन्ना का दरबार लगा है. सौ साल तो नहीं लगे लेकिन बीते एक साल में इस जंतर मंतर ने एक अदद अन्ना हजारे को आंधी और दूसरा गांधी जरूर बना दिया है. पिछले साल नवंबर दिसंबर में यही अन्ना हजारे यहां आये थे तो उनके इर्द गिर्द कुल जमा दो पांच सौ लोग थे. लेकिन आज साल भर बाद न केवल जंतर मंतर अन्ना हजारे के जलवे देख रहा है बल्कि राजनीति भी लुटियन्स जोन से निकलकर जंतर मंतर पर दस्तक दे रही है. अप्रैल के अनशन में जिन अन्ना हजारे के समर्थकों ने नेताओं को अनशन स्थल पर आने से मना कर दिया था, और जो आ गये थे उन्हें अपमानित करके भगा दिया था, आज वही अनशनकारी उन्हीं नेताओं के भाषण सुन रहे हैं.
सुना हुआ भाषण पूरा हजम नहीं हो रहा है इसलिए अगली पंक्तियों में बैठे लोग बीच बीच में मनमाफिक बात न होने पर विरोध में हाथ भी लहरा रहे हैं लेकिन ऊधर मंच से नेताओं का भाषण जारी रहता है. इधर विरोध के हाथ
Nov
14
2011
खबर नरक से नहीं बुंदेलखण्ड से है
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अहिंसक आंदोलन कर रहे ग्रामीणों की माँग है कि जुझार पहाड़ के खनन को तुरंत रोका जाए। 700 एकड़ में फैला यह पहाड़ बड़ा पहाड़ के नाम से भी जाना जाता है। ग्रामीणों के विद्रोह तेवर देख प्रशासन के भी हाथ-पाँव फूले हुए हैं। मीडिया में खबर आने के बाद एसडीएम सदर विन्ध्यवासिनी राय, सीओ अखिलेश्वर पांडेय व माइन्स सर्वेयर आरएन यादव ने गाँव का दौरा किया और ग्रामीणों की परेशानी जानने की कोशिश की। उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व श्रम मंत्री बादशाह सिंह भी गाँव वालों के समर्थन में धरने पर बैठ चुके हैं।
....जैसे नरक में रह रहे हों
जुझार पहाड़ ग्रामीणों की धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा है, पहाड़ पर लाला हरदौल और महेश्वरी देवी का मन्दिर है। सबसे अनोखी बात यह है कि पहाड़ पर एक कुँआ है। पहाड़ पर पानी होना विलक्षण माना जाता है। लोगों के अनुसार यह कुँआ 850 वर्ष पुराना है और अब भी दुरूस्त है। लेकिन खनन माफियाओं की मनमानी और कारगुजारियों के चलते प्रकृति के गोद में बसा बरी और जुझार गाँव नरक बन गया है। लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हैं। लगातार और तेज धमाकों से यहाँ कोई भी निर्माण करना संभव नहीं है। गाँव के सारे भवनों
Aug
04
2011
अन्ना फिर उतरो मैदान में
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मनमोहन सरकार पहले भी गलत थी और दुबारा मुगालते में है। पिछली बार जब अन्ना हजारे ने अनशन की बात कहीं थी तब भी डा मनमोहनसिंह ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। सबने सोचा कुछ नहीं होगा। अन्ना हजारे फालतू आदमी है। फालतू आदमी की धमकी फालतू है। पर वह फालतू आदमी अनशन से राष्ट्रनायक बना। मनमोहन सरकार सोई हुई पाई गई। फिर वहीं हो रहा है। सरकार और कांग्रेस गलतफहमी में है कि अन्ना हजारे फेल होगे। उनका अनशन पीटेगा। रामदेव के फ्लाप शौ से सरकार कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास में है। अन्ना हजारे को अनशन पर नहीं बैठने देने वाले हालात बनाने की कोशिश है। क्या ऐसा होगा? दरअसल अन्ना हजारे का पिचके गुब्बारे की थीसिस देने वाले तर्क देते है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढा करती। अन्ना हजारे को मीडिया ने बनाया है। अब मीडिया व नेता बिरादरी को सिविल सोसायटी की अराजकता के खतरे समझ में आ गए है। ये बातें आम आदमी की सोच से विपरित है। मध्य वर्ग हो, नौजवान हो या गरीब, वह अन्ना हजारे को अपनी उम्मीद मान चुका है। अन्ना इसलिए नायक है क्योंकि वे जनता की भाषा बोल रहे है, उसकी तकलीफ बता रहे है। इसलिए सरकार वापिस
Jun
13
2011
अनशन के साथ ही टूट गया विश्वास
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हमें उम्मीद थी कि जैसे दिल्ली में लोगों की भारी भीड़ के कारण कानून व्यवस्था के अस्त व्यस्त होने का खतरा पैदा हो गया था, वैसा ही कुछ हरिद्वार में भी होगा. इसलिए हम तीन साथी दिल्ली से शनिवार की सुबह तीन बजे ही बाबा रामदेव के आश्रम के लिए निकल पड़े थे। जैसी हमें उम्मीद थी कि रास्ते जाम मिलेंगे, हुआ भी वैसा ही लेकिन कारण बाबा का सत्याग्रह नहीं बल्कि गंगा दशहरा का होना साबित हुआ. शनिवार को गंगा दशहरा का त्योहार था इसलिए यह भ्रम हुआ कि रास्ते में जो भीड़ मिल रही है, वह हरिद्वार नहीं बाबा रामदेव के द्वार जा रही है। रुड़की में जब हमारे जाने का रास्ता बदल दिया गया तो इस बात की पुष्टी हो गई कि बाबा रामदेव का आंदोलन उफान पर है. लेकिन शायद ऐसा नहीं था.
जाम और थोड़ी बहुत अपनी गल्तियों और आराम तलबी के कारण छह सात घंटों का सफर हमने तेरह-चौदह घंटे में पूरी किया. हरिद्वार पहुंचकर हम सीधे बाबा के आश्रम गए. दोस्त शंभू ने कहा भी कि वहां जाने का कोई फायदा नहीं है, वहां कुछ नहीं मिलने वाला. बाबा तो अस्पताल में होंगे. फिर कौन मिलेगा पातंजली योगपीठ में?
शंभू के इस तर्क
Jun
09
2011
अनशन की छीनाझपटी में अन्ना निकले आगे
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अन्ना से अनशन का आइडिया लपककर जो बाबा रामदेव अपने सितारे बुलंद करना चाहते थे उसी आइडिया से उनके सितारे गर्दिश में चले गये हैं. न रामदेव अनशन करने रामलीला मैदान आते, न कांग्रेस से उनका पाला पड़ता और न उन्हें वह सब भुगतना पड़ता जिसे वे आज भुगत रहे हैं. एक जून को विशेष विमान से इंदौर से दिल्ली पहुंचे रामदेव का रुतबा तब आसमान पर जा टिका जब केन्द्र के चार वरिष्ठ मंत्री उनकी सेवा में एयरपोर्ट पहुंच गये. हालांकि खबर यह भी है कि वारंट लेकर पुलिसवाले भी वहां पहुंचे थे लेकिन उस दिन रामदेव को गिरफ्तार इसलिए नहीं किया क्योंकि सरकार को लगा कि अभी गीदड़ को शहर के और अंदर तक आ जाने दो. लेकिन चार दिन पहले जो सरकार एयरपोर्ट पर उनके चरणों में बिछी दिख रही थी, चार दिन बाद उसी सरकार ने रामदेव को जनाने कपड़े में घसीटकर पहले एम्बुलेंस में भरा फिर एक जहाज में भरकर देहरादून छोड़ आयी. देहरादून से हरिद्वार पहुंचे तो पहली बार एक सच बोला कि सरकार उनको अन्ना हजारे के खिलाफ इस्तेमाल करना चाह रही थी.
जब पांच जून को रामदेव पतंजलि योगपीठ को सुपुर्द हो चुके थे तो अब पांच जून को अन्ना हजारे दिल्ली
Jun
05
2011
प्रहसन का पीड़ादायी पटाक्षेप
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तकनीकि रूप से चार जून बीत चुकी थी. दिनभर चली राजनीतिक उठा पटक और पोल खोल ने बाबा रामदेव के सत्याग्रह को पहले ही महत्वहीन कर दिया था. केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने शाम को ही बाबा रामदेव के साथी आचार्य बालकृष्ण की एक चिट्ठी सार्वजनिक कर दी जिसमें सत्याग्रह शुरू होने से पहले ही उसे खत्म करने का आश्वासन दे दिया गया था. सत्याग्रह की विश्वसनीयता पर यह सबसे बड़ा कुठाराघात था. लेकिन इससे बड़ा कुठाराघात रात के एक बजे हुआ. करीब दो घण्टे की सफाई के बाद थके हारे बाबा रामदेव और उनके सत्याग्रही अपनी अपनी जगह विश्राम में चले गये थे. कुछ सत्याग्रही शाम को ही वापस भी लौट गये थे, जो बचे थे वे विश्राम मे थे. रात करीब 11 बजे रामलीला मैदान के चारों ओर पुलिस की करीब पांच हजार की फौज घेरा डालकर खड़ी हो गयी थी. नई दिल्ली स्टेशन की तरफ, अजमेरी गेट की ओर, तुर्कमान गेट की तरफ और जाकिर हुसैन कालेज के चौगिर्द पुलिस की बसे भर भरकर खड़ी कर दी गयीं. रामलीला मैदान की चारों ओर से बैरिकेटिंग कर दी गयी. रामलीला मैदान तक पहुंचनेवाली हर रोड पर नाकेबंदी करके रास्तों को बदल दिया गया था. रात के
May
31
2011
जेपी लूट रहा है जमीन
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दिल्ली से आगरा के रास्ते में ही पता चला कि जन सुनवाई राजा की मंडी के पास जिस जगह पर होनी थी, वहां जिला प्रशासन ने उसकी अनुमति देने से मना कर दिया है. यही नहीं, यह भी खबर मिली कि जिला प्रशासन गावों में किसानों को जन सुनवाई में हिस्सा लेने पर देख लेने की धमकी दे रहा है. किसानों को आतंकित करने और धमकाने के अलावा उन्हें फुसलाया जा रहा है. आयोजकों ने बताया और बाद में पीड़ित किसानों की बात सुनते हुए इसकी पुष्टि भी हुई कि पूरे इलाके में जबरदस्त आतंक का माहौल है.
किसी तरह जल्दी में यूथ हास्टल के सभागार में जन सुनवाई का इंतजाम किया गया. सुनवाई में कोई डेढ़ सौ के आसपास किसान पहुंचे थे. लेकिन वे सभी एक वे एक तरह से अलग-अलग गावों के प्रतिनिधि थे. कोई 12 बजे से शुरू हुई जन सुनवाई 5 बजे तक चली. इसके बाद शुरू हुई किसानों की एक के बाद आपबीती. सबके पास अपना और अपने गांव के दूसरे साथियों का वह दुखड़ा था जिसमें एक्सप्रेसवे और टाउनशिप के नाम पर जबरिया जमीन अधिग्रहण और उसके लिए अपनाए तौर-तरीकों का मार्मिक ब्यौरा था.
किसानों के बयानों से कई बातें सामने आईं जिनके बारे
May
10
2011
डासना, कासना, टप्पल से अल्फा, गामा, बीटा की ओर
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दिल्ली के वसंत विहार इलाके में एक तीन मंजिला इमारत इस पटकथा के मूल में है. यह इमारत उन जयप्रकाश गौड़ के जेपी समूह का मुख्यालय है जिन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत पीडब्लूडी में बतौर क्लर्क से शुरू की थी. “होनहार” जयप्रकाश गौड़ का साम्राज्य भले ही उत्तर भारत में आज सबसे बड़े उद्योगपति का हो गया हो लेकिन उनके काम करने का अंदाज पीडब्लूडी के क्लर्क का ही है. वे जानते हैं कि सरकारी दफ्तरों में काम काज कैसे किया जाता है और नीचे से लेकर ऊपर तक भ्रष्टाचार का परनाला बहाकर उसमें अपने लाभ की नैया कैसे तैरायी जा सकती है. पहली बार जब ताज एक्सप्रेसवे के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नोटिफिकेशन जारी किया गया उस वक्त उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन था. 24 अप्रैल 2001 को ताज एक्सप्रेसवे के लिए राज्यपाल की ओर से नोटिफिकेशन जारी करते हुए बताया गया कि एक ताज एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेन्ट अथारिटी का गठन किया जा रहा है. ग्यारह सदस्यों वाली इस अथॉरिटी ने अपने पहले नोटिफिकेशन में बताया कि ताज एक्सप्रेसवे बनने से नोएडा और आगरा के बीच एक औद्योगिक कारिडोर विकसित होगा जिसमें आठ गांवों को मिलाकर एक औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया जाएगा. ये सभी आठ गांव गौतमबुद्ध नगर
Apr
30
2011
न जन आये न ज्वार उठा
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29 अक्टूबर को बनारस में भागीरथी के किनारे भ्रष्टाचार के खिलाफ भागीरथ संकल्प लिया जाना था। जंतर मंतर के बाद यह पहला बड़ा कार्यक्रम था। तैयारियॉ अच्छी थी। शहर भर में प्रचार प्रसार भी खूब था। मगर इस बीच खबर आई कि अन्ना हजारे का स्वास्थ्य खराब हो गया है। फिर भी लोगों को उम्मीद थी कि वो आयेगें। वो नही आ पाये। आलम ये रहा कि हजारों की भीड़ को समेट लेने वाला कटिंग मैमोरियल इंटर कॉलेज हजारे की गैरमौजूदगी में एक कोने में ही लोगों को संकल्प दिला पाया। वह भी ज्यादा से ज्यादा तीन हजार लोग ही भ्रष्टाचार के खिलाफ इस शंखनाद में शामिल हो सके। ऐसे में सवाल यह उठचा है कि लोगों की आस्था भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल के बनने में है या फिर अन्ना हजारे के चेहरे और उसके पीछे छिपे नेक इरादों में......
मऊ से आये जयप्रकाश को नहीं पता कि जनलोकपाल क्या बला है। वो तो गॉव से चलकर केवल अन्ना को देखने आया था। उसे लगता था कि अन्ना यहॉ भ्रष्टाचार मिटाने का तरीका बतायेगें। उनके न आने से वो निराश हो गया। वही फिरोजाबाद से चलकर पहुंचे विजयनाथ तिवारी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि अन्ना आये या न
Apr
08
2011
जन आंदोलनों की राह का रोड़ा
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इस सवाल का जवाब ढूंढने से पहले यह समझना जरूरी है कि अरब जगत और भारत के बीच कई समानताओं के बावजूद यह तुलना असंगत और बेमानी है. दोनों के बीच सबसे बड़ा फर्क तो यह है कि भारत में एक कार्यकारी लोकतंत्र है और वह तमाम सीमाओं, दबावों और विसंगतियों के बावजूद राजनीतिक बदलाव और अभिव्यक्ति की आज़ादी की उतनी गुंजाइश छोड़ता है कि लोगों के आक्रोश को संघनित होने और फट पड़ने के आसार कमजोर हो जाते हैं. इसके साथ ही, यह भी मानना पड़ेगा कि साख के गंभीर संकट के बावजूद भारतीय शासक वर्ग ने अभी तक बहुत चतुराई के साथ राजनीतिक चुनौतियों और अंतर्विरोधों को मैनेज किया है.
इसलिए इस प्रश्न में छिपी चिंता और बेचैनी से सहमत होते भी यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जनांदोलन न तो हवा में पैदा होते हैं और न सिर्फ बौद्धिक भावुकता और जुगाली से पैदा होते हैं. हर जनांदोलन अपने देश और काल-परिस्थिति की पैदाइश होता है. यह भी ठीक है कि जनांदोलनों की आग में ही पककर कोई लोकतंत्र और समाज और निखरता है. असल में, जनांदोलन समाज की सामूहिक इच्छा, आकांक्षा, सोच और परिवर्तन की अभिव्यक्ति होते हैं. जब भी कोई समाज और देश राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक


