जंतर मंतर

कशमकश में कर्नल: कोई बताए कि अब घर कैसे जाया जाये?
 

कशमकश में कर्नल: कोई बताए कि अब घर कैसे जाया जाये?

पीलूपुरा पार्ट-2 में घटता जनबल मनोबल को तोड़ रहा है। कर्नल बैंसला बार बार समाज के नाम की दुहाई देकर लोगों से प्रदेश भर में आन्दोलन को लगातार तेज करने मनुहार कर रहे है। लेकिन कहीं से भी किसी कवायद की कोई खबर उन्हें जोश नहीं दिला पा रही है। मीडिया से हुई बदसलूकी के बाद कवरेज में भी कमी आई हैं। इलैक्ट्रोनिक चैनलों से आये सुधि रिपोर्टरों को कोई मसाला नहीं मिल रहा है। हालात ऐसे ही रहे तो जल्दी ही लोग कूच कर जायेगें। ... Full story

दोहा दौर का दोहरा संकट
 

दोहा दौर का दोहरा संकट

तीन सितंबर से नई दिल्ली में शुरू हुए दो दिन के मिनी मिनिस्टीरियल कांफ्रेस और उसका विरोध दोनों शुरू हुए. दिल्ली में हो रही इस दो दिवसीय मिनी मिनिस्टीरियल कांफ्रेस का हजारों किसानों और प्रदर्शनकारियों ने विरोध किया और भारत सरकार से किसी भी कीमत पर दोहा दौर से समझौता न करने की मांग की. ... Full story

नरेगा के प्याले में कर्मचारियों का तूफान
 

नरेगा के प्याले में कर्मचारियों का तूफान

मजदूरों को काम का अधिकार देने वाले नरेगा कानून से अब उसके कार्मिक ही खफा हो गये है। राजस्थान भर में 15 हजार नरेगा कर्मचारियों ने कलमबंद हड़ताल कर रखी है। 17 जुलाई के राज्य सरकार के एक आदेश ने इन कार्मिकों की परेशानियॉ बढा दी है। सरकार की ओर से कर्मचारियों को उनके संविदा नियमों से हटकर प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से लगाने की योजना है। जबकि कर्मचारी नियमित नियुक्ति के सपने पाले हुऐ थे। देश भर में काम के हिसाब से नंबर वन राजस्थान में नरेगा भ्रष्टाचार और शिकायतों में भी नंबर वन ही है। ... Full story

काजू को मिल गई जमीन
 

काजू को मिल गई जमीन

आखिरकार उड़ीसा के कोरापुट जिले में पिछले 24 सालों से चला आ रहा आदिवासियों का आंदोलन थम गया है। आदिवासियों का यह आंदोलन काजू फल की खेती को लेकर था जिसमें वे फसल उगाने के लिए जमीन पर अधिकारों की मांग कर रहे थे। देश में उड़ीसा काजू के उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। सबसे पहले इस आंदोलन की पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है। उड़ीसा में 20 जिले ऐसे हैं जहां काजू की खेती बहुतायत में होती है। आदिवासी और दलित बहुल इस राज्य में काजू के उत्पादन पर इन दोनों वर्गों का अधिपत्य रहा है, लेकिन खेती-गृहस्ती का इनका सिलसिला बहुत दिनों तक चल नहीं पाया। ... Full story

जूता मारो आंदोलन के जनक
 

जूता मारो आंदोलन के जनक

जब जनरैल सिंह ने गृहमंत्री चिदम्बरम की ओर जूता उछाला था तब हम जा पहुंचे थे जंतर मंतर जहां महीनों से मछिन्द्र नाथ जूता मारो आंदोलन की कुटिया छवाये बैठे थे. वह अप्रैल 2009 था. यह जनवरी 2011 है. तब एक चिदम्बरम निशाने पर थे अब हर नेता निशाने पर है. ताजा मामला राहुल गांधी का आया है. उस वक्त मछिन्द्र नाथ ने कहा था कि हमारे लोकतंत्र की हर समस्या का जवाब इस जूता मारो आंदोलन में छिपा है. आज करीब दो साल बाद जिस तरह से जूतामार घटनाएं बढ़ रही है उससे लगता है कि मछिन्द्रनाथ सही कहते थे, शायद. अब तो जंतर मंतर पर न मछिन्द्रनाथ हैं और न उनका जूता मारो आंदोलन. दोनों वहां से हटा दिये गये हैं. फिर भी, एक बार मछिन्द्रनाथ की ओर दुबारा देख लेते हैं शायद क्याोंकि शायद वे ही ऐसे आदमी हैं जो इस आंदोलन के अगुआ कहे जा सकते हैं. ... Full story

शहीदों के नाम पर शहीदों का अपमान
 

शहीदों के नाम पर शहीदों का अपमान

इंडिया गेट पर जिन सिपाहियों के नाम दर्ज हैं उनमें से ज्यादातर ब्रिटिश हुकूमत की ओर से अफगानों से लड़ते हुए मारे गये थे. उनकी ही याद में ब्रिटिश हुकूमत ने एक स्मारक बनाने का निर्णय लिया था. इंडिया गेट की नींव १० फरवरी १९२१ को डाली गयी थी. जिस साल भारतीय आजादी के तीन सपूतों राजगुरू, सुखदेव और भगत सिंह को फांसी दी गयी उसी साल १९३१ में इन शहीदों के हत्यारे लार्ड इरविन ने इण्डिया गेट को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दे दिया था. ... Full story

राजा जनक की दरिद्र मिथिला
 

राजा जनक की दरिद्र मिथिला

ऐसी पौराणिक मान्यता है कि एक बार इंद्रदेव राजा जनक के मिथिला राज्य की संपन्नता देखने आये थे. एक सेवक के घर की संपन्नता देखकर उन्होंने उसे ही राजमहल समझ लिया था. यह मिथिला की संपन्नता का ऐसा उदाहरण था जिसके किस्से आज भी कहे जाते हैं. लेकिन आज का मिथिला बिहार राज्य का एक हिस्सा है. आज के मिथिला की सच्ची तस्वीर देखनी हो तो अलग मिथिला राज्य के लिए आंदोलन चलानेवाले धनाकर ठाकुर के शब्दों में देख लीजिए. ... Full story

बंद होती विरोध की एकल खिड़की
 

बंद होती विरोध की एकल खिड़की

आज सभी खदान परियोजनाओं को बगैर किसी रूकावट के पास करने का दबाव पैदा हो गया है। देश के विकास के लिए बिजली चाहिए। इसीलिए बिजली घरों को तो पर्यावरण नियमों से पूरी तरह मुक्त करने की आवाजें उठने लगी हैं। और तो और, जमीन-जायजाद का ताकतवर गुट भी अब मॉल, आवासीय कालोनियों व अन्य किस्म की शहरी परियोजनाओं को पर्यावरण विभाग से प्रमाणित करवाने जैसी बेमतलब की झंझटों से मुक्त करने की मांग करने लगा है। ... Full story

जमीन की जंग में सब नाजायज
 

जमीन की जंग में सब नाजायज

क्या आंदोलन और खून-खराबे के बाद सरकार किसानों की मांग मानने की आदी हो चुकी है या फिर किसान दमनकारी नीतियों के सामने घुटने टेक देते हैं? आखिर क्यों किसान थोड़े से लालच में अपनी सभी मांगों को भूल शांत बैठ जाते हैं? उत्तर प्रदेश के जनपद गौतमबुद्ध नगर में स्थित मुख्यमंत्री मायावती के पैतृक गांव`बादलपुर´ और `दादरी´ विधान सभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत `घोड़ी-बछेड़ा´ के छह गांवों के किसानों का शासन से समझौता करने के बाद उनके आंदोलन का अंत निश्चित रूप से यह सवाल पैदा करता है। ... Full story

पेट काटकर कार के लिए रास्ता
 

पेट काटकर कार के लिए रास्ता

सियासी चालों और कारोबारी नैनों के बीच चल रहे कार और पेट के इस खेल में जीत शायद कार की हो जाए, पर यह जीत देश के करोड़ों गरीबों को किसी नैनो के तले कुचलने जैसे अपराध से कमतर हरगिज न होगी। नेताओ, बस इतना जवाब दे दो-चुनाव नैनो के मसले पर पर लड़ते हो या पेट और भूख के मसले पर... ... Full story

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Diwakar Muktibodh

Diwakar Muktibodh

दिवाकर मुक्तिबोध प्रसिद्ध कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के पुत्र और वरिष्ठ पत्रकार हैं. दैनिक भास्कर के रायपुर-विलासपुर संस्करण के संपादक रहे. वर्तमान समय में रायपुर से प्रकाशित एक स्थानीय दैनिक के संपादक. संपादन और लेखन के साथ साथ सामाजिक रूप से भी सक्रिय.