जनता दरबार
Feb
22
2012
महामाया की महाछाया
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गाजियाबाद के एक हिस्से को अलग करके मायावती ने ही इसे गौतमबुद्धनगर जिला बनाया था. इसी गौतमबुद्ध नगर में उत्तर प्रदेश के दो सबसे तेज विकसित होते उपनगर स्थित हैं. एक ह नोएडा और दूसरा है ग्रेटर नोएडा. इस नोएडा और ग्रेटर नोएडा के बीच में जहां मायावती की सभा रखी गई थी वहां इतना विशाल मैदान था कि दो तीन लाख लोगों की सभा हो सकती थी. लेकिन मैदान को कांट छांटकर कई हिस्सों में विभाजित कर दिया था जिसमें एक हिस्से में उनकी सभा हुई. जितने बड़े हिस्से को उनकी सभा के लिए आरक्षित किया गया था लगभग उतने ही बड़े हिस्से को उनके हेलिकाप्टर के लिए हैलीपैड बनाया गया था. अगर एक तराजू लेकर दोनों हिस्सों को तौलते तो तोले माशे का ही फर्क शायद पड़ता. मायावती के समर्पित सिपाही उनके भाषण को सुनने के लिए उतनी ही जगह भर पाये जितना उनके हेलिकॉप्टर को उतरने के लिए जगह चाहिए थी.
अब ये दो विरोधाभाषी दृश्य हैं या फिर इसे मायावती के राजनीति का अनिवार्य सच मान लें लेकिन जो दृश्य वहां दिखा उससे लग रहा था कि वहां मौजूद लोगों को मायावती से ज्यादा उनके हैलिकॉप्टर में रुचि थी. जैसे ही मायावती अपना करीब 45 मिनट
Feb
21
2012
निर्विवाद जीत के महानायक
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जिस दिन शिवसेनाप्रमुख ठाणे के सेंट्रल मैदान पर अपनी पहली चुनावी सभा में गए, उनके हरफनमौला वत्कृत्व ने शिवसेना के लहर की आगाज उसी दिन कर दी। जब बांद्रा-कुर्ला कांप्लेक्स मैदान पर उनकी दूसरी सभा हुई तब तो भगवा लहर तूफान का स्वरूप ले चुका था। चुनाव परिणाम आए तो विरोधियों को भी स्वीकार करना पड़ा कि शिवसेना और शिवसेनाप्रमुख एकमेवाद्वितीय संगठन और व्यक्तित्व हैं। कोई कितनी भी नकल कर ले उनके महाव्यक्तित्व के समक्ष वह माशा-तोला भी नहीं ठहरता।
शिवसेना द्रोहियों का छल: इस तथ्य को फिलवक्त स्वीकारना हर चुनावी विश्लेषक की मजबूरी है। पर इस विजय के बाद भी शिवसेना द्रोही एक छल करने से बाज नहीं आ रहे हैं शिवसेना कार्याध्यक्ष उद्धव ठाकरे की भूमिका के मूल्यांकन का। मुंबई महानगरपालिका के इतिहास को खंगालने पर भी मुझे ऐसा कोई नाम नहीं मिलता जिसके सांगठनिक कौशल के बल पर किसी भी राजनीतिक दल को सतत् 4 बार अपने संगठन को मुंबई मनपा का चुनाव जितवाने में सफलता हासिल हुई हो। आजादी के बाद का दृश्य देखें। मुंबई मनपा के चुनाव कांग्रेस पार्टी बी.जी. खेर, मोरारजी देसाई, सदोबा पाटील, रजनी पटेल, मुरली देवड़ा और गुरुदास कामत के नेतृत्व में लड़ती रही है। सदोबा पाटील, रजनी पटेल और मुरली देवड़ा
Feb
17
2012
भ्रष्टाचार क्यों नहीं बना मुख्य चुनावी मुद्दा ?
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पूरा देश इस वक़्त भ्रष्टाचार से त्रस्त है। निचले स्तर से लेकर शीर्ष तक; सर्वत्र भ्रष्टाचार ने अपनी जडें मजबूत की हैं। भ्रष्टाचार को लेकर देश की छवि वैश्विक परिदृश्य में कितनी खराब हुई है यह इस बात से समझा जा सकता है कि बीते वर्ष हांगकांग स्थित एक प्रमुख व्यापारिक सलाहकार संस्थान ने अपने सर्वे में भारत को एशिया-प्रशांत के १६ देशों के बीच चौथा सबसे भ्रष्ट देश बताया था। हालांकि इस तरह के सर्वेक्षणों पर संशय के बादल हमेशा रहते हैं मगर इस तथ्य को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि हमारे देश में भ्रष्टाचार एक ऐसा नासूर बन चुका है जिसे जड़समूल समाप्त करना किसी के बस में नहीं है। विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और भ्रष्टाचार से पीड़ित; बड़ा अजीब सा लगता है। चूँकि लोकतंत्र में असली ताकत जनता के हाथों होती है इसलिए भारत में भी बढ़ते भ्रष्टाचार के लिए एक हद तक जनता को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि राजनेताओं की कारगुजारियों ने भी भ्रष्टाचार को बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। देश में व्याप्त राजनीतिक शून्यता के कारण वर्तमान राजनीति दिग्भ्रमित होती जा रही है। कोई भी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आम आदमी के
Feb
17
2012
कांग्रेस की खुशी सोनिया का गम
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उत्तर प्रदेश में खुर्शीद ने एक चुनावी सभा में कहा, ‘जिस वक्त बाटला हाउस एनकाउंटर हुआ था उस समय मैं हुकुमत में नहीं था, बावजूद एक वकील की हैसियत से मैं कपिल सिब्बल और दिग्विजय सिंह के साथ सोनिया जी के पास गया और उन्हें मुठभेड़ की तस्वीरें दिखाईं तो वह रोने लगीं और प्रधानमंत्री के पास जाने को कहा था।’ खुर्शीद के इस नाटकीय बयान पर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता विनय कटियार ने पूछा कि ‘क्या बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा और संसद हमले में मारे गए सुरक्षाकर्मियों के लिए भी सोनिया के आंसू फूट पड़े थे।’
दरअसल कांग्रेस बाटला हाउस के जख्मों को जान बूझकर छेड़ती रहती है और इस मुद्दे से उपजी सहानुभूति को वोटों में बदलने की फिराक में रहती है। पार्टी आला कमान की शै पर ही पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह ने बाटला हाउस मुठभेड़ के दौरान आजमगढ़ के संजरपुर जाकर सरकार की परेशानियां बढ़ा दी थीं। बाटला हाउस पर एक के बाद एक नाटकीय बयान देने वाले कांग्रेस नेता भूल जाते हैं कि खुद कांग्रेसी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री इसे जायज ठहरा चुके हैं। तो सवाल है कि सनसनी खेज बयानबाजियों के बहकावे में यूपी का
Feb
11
2012
धन के राजनीतिक धन्धेबाज
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उत्तर प्रदेश में सात सालों में अर्थव्यवस्था अन्य सामान्य राज्यों की तुलना में बद से बदतर हो गई है, जबकि इन्हीं सालों में केंद्र से लेकर सूबे में राजनीति करने वाली तमाम बड़ी राजनीतिक पार्टियों का कोष लबालब भर गया है। आप इस पूरे प्रकरण को सरकारी और निजी क्षेत्रों से तुलना कर सकते हैं। जिस प्रकार एक सरकारी उपक्रम लूट का शिकार होकर घाटे में चला जाता है और उसी क्षेत्र का निजी उपक्रम दिन-दूनी रात-चौगुनी की रफ्तार से दौड़ता रहता है, उसी तर्ज पर प्रदेश के सारे उद्योग धंधे या तो बंद हो गए हैं या बंदी के कगार पर हैं, लेकिन यहां चुनाव लड़ रहीं सभी राजनीतिक पार्टियां मालामाल हो रही हैं।
सूबे की 13 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रहीं लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के मुखिया और समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर कहते हैं, ‘जो पार्टियां आज चुनाव के समय बेहतर सरकार देने की बात कर रही हैं, वही पार्टियां सालों से प्रदेश को लूट भी रही हैं। जनता की आंखों पर पट्टी बांध दी गई है। राजनीतिक दल के पास जो फंड आ रहा है, वे सारा भ्रष्टाचार की ही तो है। जनता से लूटे गए पैसों से ही राजनीतिक पार्टियां फिर चुनाव लड़ रही
Feb
11
2012
मुलायम में समा रहे हैं माया के लोग
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बदलाव की हवाओं से मीडिया भी अछूता नहीं है, बदलाव के खुशबू सूंघकर मीडिया ने चाल और भाषा बदल दी है। ये चर्चा जनता में भी आम है कि अबकि बदलाव तो जरूर होगा। आम आदमी के मन में यह सवाल उमड़-घुमड़ रहा है कि सत्ता की चाबी किसको मिलेगी। अलग-अलग विचार और गणित हैं, लेकिन बदलाव होगा ये बात तय हो चुकी है।
खुफिया और मीडिया रिपोर्ट के आधार पर नौकरशाह इस बात को सबसे पहले समझ गये कि बहनजी की सरकार बनना मुश्किल है, ऐसे में सत्ता से दूरी बनाने मंमें ही भलाई है। पंचम तल में बैठने वाले बहनजी के खासमखास नौकरशाह ने तो चुनाव की घोषणा से पहले ही समाजवादी पार्टी में लाइजनिंग और मेल-जोल बढ़ाना शुरू कर दिया था, सूत्रों की माने तो नेताजी के दूसरे पुत्र प्रतीक यादव की लखनऊ में आयोजित शादी की रिसेप्शन पार्टी का सारा प्रबंध इसी नौकरशाह के चम्मचों ने किय
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चुनावी शंखनाद के साथ ही बसपा सरकार के डूबते जहाज से कूदने और साथ छोड़ने वाले अफसरों की लाइन ही लग गयी। हालत यह है कि बहनजी की आंख, कान और हाथ माने जाने वाले एक दर्जन से अधिक अफसर बदलाव की सुगबुगाहट के बीच केंद्र
Feb
09
2012
किन्नर मोर्चा का पॉलिटिकल मार्च
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यह भी देखना दिलचस्प है कि इस पार्टी ने विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ने वाले अपने किन्नर प्रत्याशियों में कुछ को भावी मंत्री के तौर पर भी पहले से ही प्रोजेक्ट कर दिया है. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तर प्रदेश के प्रभारी वीरेंद्र कुमार कहते हैं, 'पार्टी 50 किन्नरों को अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से चुनावी मैदान में उतारना चाहती है, जिनमें से 5 किन्नरों के नाम की घोषणा अब तक की जा चुकी है.' उन्होंने बताया कि किन्नर मोर्चा की अध्यक्ष शोभा बुआ को गाजियाबाद की धौलाना सीट से पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया है. इसके अलावा शोभा बुआ को पार्टी ने अपने भावी मुख्यमंत्री के तौर पर भी प्रोजेक्ट कर दिया है. विरेन्द्र का दावा है कि उन्हें किन्नरों और किन्नरों से जुड़े संगठनों के अलावा आम लोगों का भी समर्थन मिल रहा है. उन्होंने बताया कि वर्ष 2009 में मध्यप्रदेश के सागर शहर में कमला बुआ के मेयर पद का चुनाव जीतने और उत्तर प्रदेश में शबनम मौसी के आने के बाद से स्थिति में काफी बदलाव आ चुका है और इसकी झलक उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों में भी दिखाई देगी. विरेन्द्र कहते हैं, 'लोग भ्रष्टाचार से तंग आ चुके हैं और वे लिंग भेद
Feb
07
2012
सत्ता के लिए निर्णायक संघर्ष
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उत्तर प्रदेश में अब तक पहले चरण के मतदान की शुरूआत होने में थोड़ा ही वक्त शेष बचा है. अब तक सभी राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा-पत्र जारी हो चुके हैं. सारे प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतर चुके हैं. सभी दलों के स्टार प्रचारकों ने कमान सम्हाल ली है. सत्ता को निशाने पर रख कमान पर तीर साधे जा चुके हैं, किन्तु छोड़े नहीं जा रहे हैं. इस जमीनी हकीकत की वजह ये है, कोई भी राजनीतिक दल अकेले स्वयं को बहुमत पाने की स्थिति में नहीं पा रहा है. बहुमत की जादुई संख्या पाने का कोई रास्ता दीख नहीं रहा है. मतदाता को लुभाने, खरीदने और धमकाने पर चुनाव आयोग की नजर है. राजनीतिक दलों में भय का कारण मतदाताओं की चुप्पी है, जिसने सूचना-क्रान्ति के युग में ये जरूर जान लिया है की सभी राजनीतिक दलों के अंदर सत्ता को पाने और बनाए रखने की उत्कंठा एक जैसी ही है. इससे बढ़कर बात ये है, सभी दलों में इस सत्ता पर काबिज़ होने के साधनों की पवित्रता को लेकर बहुत ज्यादा अंतर नहीं रह गया है.
राजनीतिक दलों के दर्शन और सिद्धांत केवल और केवल उन लोगों के लिए लिखे-पढ़े जाने वाले साहित्यिक शोध-ग्रन्थ हैं, जो इस चुनावी
Feb
07
2012
राजा बनने से पहले रंक हो गये राहुल
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प्रथम चरण की वोटिंग से दो दिन पहले चुनाव अभियान के बीच राहुल का प्रेस कांफ्रेस करना किसी खास रणनीति का हिस्सा है। राहुल ने बड़ी बेबाकी से पत्रकार बंधुओं के सवालों का जवाब दिया, जिससे उनकी पार्टी का ग्राफ ऊपर उठ सकता था, या फिर चुनावों में तात्कालिक लाभ मिल सकता था, लेकिन काले धन के अहम् सवाल पर उन्होंने जिस तरह गोल-मोल जवाब दिया, उससे कांग्रेस की नीति और नीयत दोनों का एकबार फिर खुलासा हो गया। असल में चुनाव के समय काले धन के बड़े सवाल पर राहुल को पार्टी की नीति का खुलासा देश-विदेश की मीडिया के सामने करना चाहिए था, लेकिन राहुल ने लड़कपन में एक बड़ा अवसर हाथ से गंवा दिया। अगर राहुल में थोड़ी सी भी परिपक्वता, राजनीतिक समझ या दूरदर्षिता होती तो राहुल काले धन के सवाल को रामदेव के विरोध या काले झण्डे से जोड़कर नहीं देखते, बल्कि एक जिम्मेदार नेता और देश की सत्ताधारी पार्टी के महासचिव के तौर पर देशहित और आम आदमी से जुड़े कालेधन के मुद्दे पर अपने विचार और नीति का खुलासा करके विरोधियों की हवा बिगाड़ने के साथ देश की जनता का ध्यान भी अपनी ओर खींच सकते थे।
राहुल ने जिस तरह काले धन
Feb
07
2012
आरक्षण का कांग्रेसी पैंतरा
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यदि मंडल आयोग की संस्तुतियों को देखा जाए तो पिछड़ी जातियों की कुल संख्या सम्पूर्ण आबादी का ५२ प्रतिशत हैं| इसमें हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन सभी वर्गों की पिछड़ी जातियां शामिल हैं। इन सभी वर्गों के पिछड़ों को आरक्षण की परिधि में लाकर २७ प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई थी| अब उसी आरक्षण में से ४.५ प्रतिशत आरक्षण अल्पसंख्यक समाज को दे देना समझ से परे है। इस आरक्षण का लाभ अत्यधिक पिछड़े मुस्लिम समाज के लोग कैसे उठा पायेंगे? इसका अधिकाँश लाभ तो ईसाईयों और बौद्धों को मिलता नज़र आ रहा है।
दरअसल सरकार ने बड़ी ही चालाकी से विधानसभा चुनाव पूर्व मुस्लिम समाज को ठगने का काम किया है ताकि मुस्लिम समाज का एकमुश्त वोट-बैंक कांग्रेस की झोली में आ गिरे| जबकि हकीकत यह है कि पंजाब में सिख समुदाय पर आरक्षण का लाभ मिलने का वादा किया गया तो गोवा में ईसाईयों पर दांव लगाया जाएगा। वहीं उत्तर प्रदेश में इसका केंद्र मुस्लिम बन गए हैं। हमेशा की ही तरह इस बार भी कांग्रेस की बाजीगरी मुस्लिमों को ठगने का काम कर रही है। ऐसे में मुस्लिमों के बीच यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि क्या उन्हें मात्र आरक्षण



