देश विदेश
Feb
21
2012
डेमोक्रेसी के लिए पार्लियामेन्ट्री डिप्लोमेसी
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मीरा कुमार को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसूफ रजा गीलानी ने भी पाकिस्तान आने की दावत दिया था. इसके पहले लोकसभा का कोई भी स्पीकर कभी भी पाकिस्तान की यात्रा पर नहीं गया है. यह बहुत ही दिलचस्प संयोग है कि भारत और पाकिस्तान, दोनों ही देशों में आजकल संसद के निचले सदन की पीठासीन अधिकारी महिलायें हैं.
दरअसल पाकिस्तानी कौमी असेम्बली की स्पीकर डॉ फहमीदा मिर्ज़ा तो किसी भी एशियाई देश की पहली महिला स्पीकर हैं. मीरा कुमार २००९ में लोकसभा की अध्यक्ष बनीं जबकि फहमीदा मिर्ज़ा २००८ में ही पाकिस्तान की कौमी असेम्बली की स्पीकर बन चुकी थीं. मीरा कुमार और डॉ फहमीदा मिर्ज़ा के बीच निजी तौर पर भी बहुत अच्छे सम्बन्ध हैं. मीरा कुमार को लिखे एक पत्र में फहमीदा मिर्ज़ा ने कहा था कि हमारे दोनों ही देशों के लोग चाहते हैं कि इस इलाके में शान्ति और सम्पन्नता हो. यह उनका हक भी
हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उनकी आकांक्षा को हकीकत बनाने में मदद करें. हमारे दोनों ही मुल्क पड़ोसी तो हैं ही वे गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और अभाव के भी शिकार हैं. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि दो महिला स्पीकर साथ साथ काम करके अपने क्षेत्र में लोगों की, ख़ासकर महिलाओं की तरक्की कोJan
28
2012
लोकतंत्र को सेना की सलामी
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इस खबर का ज़िक्र करने का मतलब यह है कि जहाँ पाकिस्तानी फौज और आईएसआई देश की सबसे ताक़तवर संस्थाएं मानी जाती थीं और अगर किसी नवाज़ शरीफ या किसी ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने उसका हुक्म नहीं माना तो उसे सत्ता से बेदखल कर दिया जाता था, उसी पाकिस्तान में प्रधानमंत्री युसूफ रज़ा गीलानी के सख्त तेवर के बाद आईएसआई और फौज का मुखिया राजकाज के मामलों की चर्चा में शामिल होने के लिए प्रधान मंत्री के यहाँ हाजिरी लगा रहा है. पाकिस्तान के पिछले साठ साल के इतिहास को जानने वाले जानते हैं कि फौज का मुखिया डांट खाने के बाद कभी किसी भी सिविलियन सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए ही उसके दफतर जाता है .लेकिन पाकिस्तान में भी हालात बदल रहे हैं. चारों तरफ से लोकतंत्र की मजबूती की खबरें आ रही हैं जो पाकिस्तान के लिए तो बहुत अच्छा है ही, भारत और अफगानिस्तान के लिए बहुत अच्छा है, बाकी दुनिया के लिए बहुत अच्छा है.
पाकिस्तान के बारे में पिछले कुछ महीनों से अजीब खबरें आ रही थीं. पाकिस्तानी मामलों के भारत में मौजूद लाल बुझक्कड़ अक्सर बताते रहते हैं कि बहुत जल्द पाकिस्तान में फौजी हुकूमत कायम होने वाली है. लेकिन ऐसा
Jan
20
2012
बांग्लादेश में सेना की साजिश का सच
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गुरूवार को ढाका कैण्टोनमेन्ट में सेना ने प्रेस कांफ्रेस की उसके अनुसार सेना के गुप्तचर विभाग में काम कर चुके लेफ्टिनेन्ट कर्नल एहसान युसुफ ने रिटायर्ड मेजर जाकिर के साथ मिलकर बांग्लादेश में तख्तापलट की योजना बनाई थी जिसे सेना निरस्त कर दिया है. पूरी प्रेस कांफ्रेस का लब्बोलुआब यह था कि सेना ने बड़ी चतुराई से कर्नल एहसान युसुफ के प्लाट को फेल कर दिया है. सेना के अनुसार तख्तापलट की इस योजना में बांग्लादेशी सेना के ही 12 से 15 आफिसर, कुछ कट्टरपंथी पार्टियों और संस्थाओं से जुड़े और एनआरबी (प्रवासी बांग्लादेशी) शामिल थे.
सेना जो लंबा चौड़ा विवरण दिया है उसके अनुसार लेफ्टिनेन्ट कर्नल युसुफ ने सेना में कार्यरत एक मेजर से संपर्क किया और उसे तख्तापलट में शामिल होने के लिए निमंत्रित किया. युसुफ बांग्लादेश में सेना के जरिए जेहाद करके वहां इस्लामिक गणराज्य स्थापित करना चाहता है इसलिए उसने सेना से ही कुछ लोगों को चुनने का निश्चय किया. लेकिन 13 दिसंबर को जिस दिन कर्नल ने मेजर को इस बारे में बात की उसी दिन मेजर ने अपने ऊपर के अधिकारियों को इस घटना के बारे में बता दिया और लेफ्टिनेन्ट कर्नल को तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद एक और रिटायर्ड मेजर
Jan
19
2012
खत्म होने के कगार पर खड़ा पाकिस्तान
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दुनिया में अगर इस्लामी आतंकवाद का बाप सऊदी अरब है तो उसकी सरोगेट मां है पाकिस्तान। 1970 के दशक मे जब सोवियत संघ और अमेरिका के बीच शीतयुद्ध चरम पर पहुंचा तब यूरोप और अमेरिका के बुद्धिजीवियों ने दोनों को द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर यूरोप द्वारा लिया गया संकल्प याद दिलाया कि ‘भविष्य में कोई युद्ध यूरोप की धरती पर नहीं होना चाहिए।’ यूरोप भलीभांति जानता था कि वर्चस्व की होड़ अगर जंग में तब्दील हो गई तो यूरोप अवश्य नष्ट हो जाएगा। सो युद्ध का खेल शुरू कर सरकारवाद बनाम बाजारवाद की लड़ाई को अंतिम चरण में पहुंचाने के लिए मध्य एशिया के देश अफगानिस्तान को चुना गया।
सऊदी अरब की ख्वाहिश
अफगानिस्तान पर सोवियत संघ ने चढ़ाई कर दी तो अमेरिका ने सऊदी अरब के प्रश्रय से पाकिस्तान को इस्लाम का रखवाला नियुक्त करने का झांसा देकर जंग की ललकार भर दी। सऊदी अरब 1960 से 1970 के दशक में पेट्रो डॉलर के बल पर अमेरिका का सबसे प्रिय साथी बन चुका था। सऊदी अरब मक्का और मदीना का देश होकर भी बीते कई सौ वर्षो में भी इस्लाम का नेतृत्व नहीं कर पाया था। सो पेट्रो डॉलर की ताकत के साथ उसमें सऊदी अरब के पंथ
Jan
16
2012
पाकिस्तान में डेमोक्रेसी को डर कैसा?
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शायद हां, लेकिन शायद नहीं. पाकिस्तान में जो ताजा विवाद पैदा हुआ है उसके मूल में अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत हुसैन हक्कानी के एक मेमो से जुड़ा हुआ है जिसमें कथित तौर पऱ उन्होंने अमेरिका को कहा है कि ओसामा के मारे जाने के बाद अमेरिका पाकिस्तानी सेना को काबू करने में पाकिस्तानी सरकार की मदद करे. विवाद शुरू हुआ अक्टूबर 2011 में जब अमेरिका में रहनेवाले एक व्यापारी मंसूर एजाज ने दावा किया कि उसे हक्कानी ने एक बिना हस्ताक्षर वाला मेमो दिया था और कहा था कि उसे मंसूर एजाज माइक मुलेन तक पहुंचा दे जो कि अमेरिका के ज्वाइंट चीफ आफ आर्मी स्टाफ हैं. एक ब्रिटिश अखबार फाइनेन्सियल टाइम्स में लिखे गये इस लेख के बाद पाकिस्तान में सियासी बवाल आ गया.
सेना के लिए यह निश्चित रूप से असह्य है कि उनकी सरकार उन्हें काबू में करने के लिए अमेरिका की मदद ले. अब यह बात बहुत छिपी हुई नहीं है कि ओसामा बिन लादेन सेना के संरक्षण में ही पाकिस्तान में रह रहा था जिसे पाकिस्तान में घुसकर अमेरिकी कमाण्डों ने मार गिराया था. जिस तरह से पाकिस्तानी सेना और सरकार ने बाद के दिनों में अमेरिका और नाटो फौज के खिलाफ कड़ा रुख
Jan
16
2012
अब मुश्किल है फौज की मौज
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यह प्रधानमंत्री गिलानी ही हैं जिन्होंने अपने दम पर पाकिस्तान में एक नये किस्म की बहस को जन्म दिया. वह बहस है लोकतंत्र बनाम तानाशाही की बहस. पाकिस्तान में पिछले कुछ दिनों में वह हुआ है जो अब तक कभी नहीं हुआ. देश की संसद में यह तय हो रहा है कि देश में लोकतंत्र का निजाम रहना है कि एक बार फिर तानाशाही कायम होनी है. अब तक तो होता यह था कि कोई फौजी जनरल आकर सिविलियन सरकारों को बता देता था कि भाई बहुत हुआ अब चलो, हम राजकाज संभालेगें. सिविलियन हुकूमत वाले जब ज्यादा लोकशाही की बात करते थे तो उन्हें दुरुस्त कर दिया जाता था. चाहे ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो रहे हों या लियाकत अली खां और या फिर नवाज़ शरीफ रहे हों. सब को फौज ने अपमानित ही किया, लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि पूरे देश में आजकल लोकतंत्र बनाम तानाशाही की बहस चल रही है. हालांकि मौजूदा सरकार की लोकप्रियता और भ्रष्टाचार के हवाले से उसे हटाने का राग चारों तरफ से सुनाई पड़ने लगा है लेकिन लगता है कि अब पुरानी बातें नहीं चलने वाली हैं. सरकार जाएगी भी तो सरकार ही आयेगी कोई फौजी तानाशाह नहीं आयेगा.
प्रधानमंत्री युसूफ
Jan
16
2012
प्रतिबंध की पॉलिटिक्स और अतिवादी अमेरिका
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इसे एक कानून (एच.आर 1540 में राष्ट्रपति का वक्तव्य, जैसा कि वह व्हाइट हाउस की वेबसाइट पर दिखता है) बना दिया और कहा गया, ‘कुल 500 पन्नों पर सैकड़ों खंडों में लिखे गए इस कानून में वह तमाम महत्वपूर्ण प्रशासनिक पहल भी शामिल हैं, जिनसे रक्षा विभाग की तेजी से बढ़ती हुई स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतें नियंत्रित की जा सकें, विदेशों में आतंकवाद विरोधी प्रणाली विकसित की जा सके, सहयोगियों की सुरक्षा क्षमता का विकास किया जा सके, बल का आधुनिकीकरण हो सके और विश्व भर में सेना की दक्षता और प्रभाव बढ़ाया जा सके.’ इस पूरे वक्तव्य में ‘सेना’ शब्द का प्रयोग 19 बार किया गया है जबकि ‘रक्षा’ केवल नौ बार, जो कानून के उद्देश्य को बहुत स्पष्ट बना देता है. अब तक ईरान पर 15 से ज्यादा प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं.
प्रतिबंध के बाद ईरान की राष्ट्रीय मुद्रा रियाल का मूल्य तुरंत 15-20 प्रतिशत तक घट गया और अब तो यह आज तक के सबसे कम यानी 17,000-17,500 रियाल के बदले एक डॉलर के स्तर तक पहुंच गया है. इस प्रतिबंध के कारण दूसरे देश भी ईरान से कच्चा तेल नहीं खरीद सकेंगे क्योंकि ऐसा कोई चैनल या पार्टी ही नहीं होगी जिसके माध्यम से भुगतान
Jan
10
2012
चोट करे चीन और घाव सलहाए हम
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ज़रा देखिए कि इस चीनी वीज़ा की मनाई पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया क्या है? भारत सरकार की खाल इतनी मोटी है कि कैप्टन पांगिंग को हटाकर वह इस फौजी टीम को चीन भेज रही है। पहले वह 30 लोगों को भेजनेवाली थी, अब सिर्फ 15 जाएंगे याने पांगिंग की वजह से शेष 14 लोग भी कट गए। उन्हें तो वीज़ा मिल गया था। आप उन्हें जाने से क्यों रोक रहे हैं? शायद यह बताने के लिए कि हम तो 15 सदस्यों को ही प्रतिनिधि मंडल में भेजना चाहते थे। 30 लोगों के पासपोर्ट गलती से भेज दिए गए, उसमें पांगिंग का पासपोर्ट भी शामिल था। अपनी नाक बचाने का यह कौनसा तरीका है? क्या किसी संप्रभु राष्ट्र की सरकार के लिए ऐसी बहानेबाजी शोभनीय है? किसी सरकारी प्रवक्ता ने यह सफाई भी दी है कि रक्षा मंत्रालय ने 30 पासपोर्ट जल्दबाजी में भेज दिए। ये नाम अभी तक ‘सचिवों की कमेटी’ ने पास ही नहीं किए थे। याने सचिवों की कमेटी के सामने यह मामला आता तो वह पांगिंग का नाम खुद ही हटवा देती। भला, चीन को नाराज़ करने की हिमाकत कैसे करती? क्या इस तर्क से भी भारत सरकार की इज्जत बढ़ती है? बेहतर तो यह होता
Dec
25
2011
सद्दाम को खोने का दाम
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गौरतलब है कि सद्दाम हुसैन अरब सुन्नी समुदाय से संबंध रखने वाले एक सैन्य तानाशाह थे जिन्होंने अहमद हसन अलबक़र से 16 जुलाई 1979 को सत्ता संभालने के बाद अपनी सैन्य शक्ति के बल पर 9 अप्रैल 2003 तक इराक पर शासन किया। इराक में शिया मुस्लिम समुदाय के लेगों की आबादी 60 प्रतिशत है जबकि सुन्नी समुदाय की आबादी 31 प्रतिशत है। अपने शासनकाल के दौरान सद्दामहुसैन ने न ही शिया समुदाय के लोगों को सिर उठाने दिया न ही सुन्नी वकुर्द समुदाय के अपने राजनैतिक विरोधियों के किसी भी प्रकार केविरोध को सिर उठाने दिया। जि़द्दी स्वभाव के सद्दाम हुसैन ने 24 वर्षों तक अपनी तानाशाही प्रवृति व क्रूरता के बल पर अपने सभी विरोधियों को बखूबी बलपूर्वक कुचला।
बहरहाल,सद्दाम हुसैन की इसी क्रूरता व तानाशाही प्रवृति ने अमेरिका को एक उपयुक्तबहाना उपलब्ध करा दिया और आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध छेडऩे वालाअमेरिका अफगानिस्तान से होते हुए इराक तक जा पहुंचा। निश्चित रूप से2003 से लेकर अब तक इराक में लाखों लोग हिंसा के शिकर हो चुकेहैं। सद्दाम के सत्ता से हटते ही तथा अमेरिकी फौजों की इराक मेंमौजूदगी के दौरान ही बड़ी से बड़ी तमाम सांप्रदायिक हिंसक घटनाएं हो चुकी हैं। क्या भीड़ भरे बाज़ार, क्या धार्मिक जलसा
Nov
12
2011
इराक के बाद अब ईरान की बारी
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हर बार की तरह इस बार भी अमरीका संयुक्त राष्ट्र को अपने हित में इस्तेमाल करने की योजना बना चुका है.अमरीकी अखबारों में पिछले एक हफ्ते से सनसनीखेज़ बनाकर खबरें छापी जा रही हैं कि अंतर राष्ट्रीय परमाणु एनर्जी एजेंसी के पास ऐसे दस्तावेजी सबूत हैं जिसके आधार पर साबित किया जा सके कि ईरान अब परमाणु हथियार विकसित कर सकता है. इस कथित इंटेलिजेंस में वही पुराने राग अलापे जा रहे हैं. मसलन यह कहा जा रहा है कि सोवियत संघ में हथियारों को बनाने वाले वैज्ञानिकों की सेवाएँ ली जा रही हैं, उत्तरी कोरिया वालों से मदद ली जा रही है और पाकिस्तानी परमाणु स्मगलर ए क्यू खां से भी इस प्रोजेक्ट में मदद ली गयी है.ज़ाहिर है कि यह सब बहाने हैं. लेकिन इन सबके हवाले से अमरीका छुप कर हमला करने की अपनी नीति को अंजाम तक पंहुचाने की कोशिश कर रहा है.
ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने अमरीका की संयुक्त राष्ट्र के ज़रिये ईरान को बदनाम करने के नाटक को अनुचित बताया है. अहमदीनेजाद ने संयुक्त राष्ट्र की कथित रिपोर्ट की चर्चा शुरू होने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा है कि अमरीका की कोशिश है कि वह ईरान सहित बाकी विकास शील


