द संडे इंडियन

Nov

02

2011

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सर्वाइवल आफ द वीकेस्ट

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सर्वाइवल आफ द वीकेस्ट

भविष्य में पूंजीवाद का स्वरूप क्या होगा...? मैंने हमेशा माना है कि सिर्फ मुनाफा देखकर किसी संस्थान को चलाना ठीक वैसा ही है, जैसे सिर्फ 'रियर व्यू मिरर' में देखकर कार चलाना, जो कि आपको वह रास्ता दिखता है जिससे आप गुजर चुके हैं, लेकिन वह आगे की राह के बारे में कुछ नहीं बताता. आजकल के उद्यमी, नेता और व्यवसायी अगर दुनिया को आगे ले जाना चाहते हैं, तो उन्हें छोटे-छोटे फायदों से ऊपर उठकर सोचना होगा. भविष्य इस बात में निहित है, जिसे मैं सरवाइवल ऑफ द वीकेस्ट (सबसे कमजोर की उत्तरजीविता) में विश्वास कहता हूं (जैसा कि डॉक्टर मलय चौधरी और मैंने अपनी किताब द ग्रेट इंडियन ड्रीम में जिक्र किया है), न कि आजकल प्रचलित सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट में.

अर्थशास्त्री, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के लिए लंबे समय से डार्विन के सिद्धांत 'सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट' पर नीति वचन के रूप में, आंख मूंद कर विश्वास करते आए हैं. यही सभी समस्याओं की जड़ है. समस्या यह है कि वे भूल जाते हैं कि किसी अर्थव्यवस्था की कार्य पद्धति का उद्देश्य अस्तित्व के लिए अधिक सभ्य स्तर की ओर बढऩा भी है. मानव सभ्यता इस बात की गवाह है कि मनुष्य जंगल से निकल कर आज के

Aug

24

2011

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लोकतंत्र का लचीला रुख अपनाएं अन्ना

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लोकतंत्र का लचीला रुख अपनाएं अन्ना

मैं तब इतना छोटा था कि सचमुच सारी बातें ठीक-ठीक याद नहीं हैं. लेकिन मैंने बहुत से लोगों से सुना है कि अन्ना हजारे की गिरफ्तारी के बाद देश में जैसा जनविरोध हुआ, वह ठीक वैसा ही है, जैसा 1970 के दशक की शुरुआत में जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए संपूर्ण क्रांति आंदोलन में दिखा था. वास्तव में, यह संपूर्ण क्रांति और उसके बाद पैदा हुई अव्यवस्था ही थी, जिसकी वजह से इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लगाने जैसी ऐतिहासिक भूल कर दी. बहुत से लोग आज के हालात की तुलना आपातकाल के दौर से कर रहे हैं.

भारत के लोग भ्रष्टाचार तथा सड़े व भ्रष्ट तंत्र से इस कदर ऊबे और चिढ़े हुए हैं कि विरोध की यह लहर हमें आश्चर्यचकित नहीं करती. मैंने सार्वजनिक रूप से कई बार कहा है कि भारत में जनतंत्र नहीं वरन दानवतंत्र है, जहां धूर्त राजनेता और उनके अपराधी साथी खुलेआम देश को लूटने पर आमादा हैं. उन्हें यह बात अच्छी तरह पता है कि निष्क्रिय न्यायिक व्यवस्था उन्हें बच निकलने का पूरा मौका देगी. तकरीबन हर मामले में वे बच निकले हैं, इसलिए उनमें लुटेरों जैसा अहंकार आ गया है और वे यह मानने लगे हैं कि कानून से

Aug

20

2011

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मीडिया के बिना भी चल सकता है अन्ना का आंदोलन

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मीडिया के बिना भी चल सकता है अन्ना का आंदोलन

वे द संडे इंडियन की ओर से आयोजित मीडिया सेमिनार में बोल रहे थे. सेमिनार का विषय था कि - क्‍या अन्‍ना की हीरो की छवि मीडिया ने गढ़ी है. इस सेमिनार में राहुल देव के अलावा बीबीसी ऑनलाइन हिन्‍दी की पूर्व संपादक सलमा जैदी, जी न्‍यूज के संपादक सतीश के. सिंह, वरिष्‍ठ पत्रकार सीमा मुस्‍तफा, द संडे इंडियन के सैबल चटर्जी और मीडिया वॉच मैगजीन के संपादक रोहित मनचंदा भी शामिल थे. कार्यक्रम का संचालन वरिष्‍ठ पत्रकार सीमा मुस्‍तफा ने किया. इसके साथ ही इस सेमिनार में मीडिया के इस खबर के रिपोर्टिंग के तरीके. अन्‍य खबरों की कम तवज्‍जो और खबरों के एजेंडे तय करने समेत कई अहम मुद्दों को लेकर चर्चा की गयी.
 
सबसे पहले यह सवाल उठा कि क्‍या मीडिया ने अन्‍ना को हीरो बना दिया है. सेमिनार में मौजूद सभी लोग इस बात से असहमत नजर आए. लेकिन, इस आंदोलन को इस मुकाम तक पहुंचाने में मीडिया की भू‍मिका की भी तारीफ की गई. राहुल देव ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि आज से करीब 25 साल पहले जब वे अन्‍ना के गांव रालेगांव सिद्धि गए थे, तो उस वक्‍त भी अन्‍ना उस गांव के लिए हीरो थे. 15 साल

Jun

30

2011

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चार आने का चले जाना

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चार आने का चले जाना

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने आधिकारिक तौर पर सूचित कर दिया है कि 25 पैसे का सिक्का यानी आम लोगों की चवन्नी पहली जुलाई के बाद बाजार में नहीं चलेगी. चवन्नी का हमारे बीच से चला जाना लगभग तय था. सरकार इस बारे में बहुत पहले ही सोच चुकी थी, क्योंकि चवन्नी को ढालने में जो लागत आती है, वह इस पर अंकित मूल्य से कहीं अधिक है. लेकिन यह वह सिक्का है, जिसका 'सिक्का' भारतीय समाज के तमाम लोकव्यवहारों, मुहावरों में खूब चलता था. देश के सांस्कृतिक संदर्भ में छोटी-सी चवन्नी का महत्व बहुत बड़ा है.

1958 में प्रदर्शित हास्य फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' में एक बेहद मजेदार सीन है. किशोर कुमार अपने खास हंसोड़ अंदाज में गाना गाते हुए मधुबाला के सामने घिघियाते हैं कि वह उसके पांच रुपैया बारह आना (पांच रुपये और 12 आना, दूसरे शब्दों में, 5.75 रुपये) वापस कर दे. दरअसल वह उस समय देश की पैसा प्रणाली की अनूठी विशेषता बता रहे होते हैं. किसी भी चलन को भाषा जल्द ही अपना लेती है. यह टकसाली सिक्कों के बारे में भी यह बात उतनी ही सच है. तभी तो लोगों का सौ फीसदी सच के लिए 'सोलहो आना सच' या

Jun

13

2011

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गांधी जी की धरती पर चापलूसों की तानाशाही

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गांधी जी की धरती पर चापलूसों की तानाशाही

बाबा रामदेव ने आमतौर पर राष्ट्रीय सरोकारों के बहुत प्रासंगिक मुद्दों को ही उठाया है. उन्होंने हजार रुपये के नोट पर प्रतिबंध लगाने के लिए कहने से लेकर (इससे कालेधन की जमाखोरी दस गुना कहीं ज्यादा आसान हो जाती है. यही कारण है कि अमेरिका और ब्रिटेन में सबसे बड़ी मुद्रा 100 ही है) स्विस बैंकों में छुपा कर रखे गए 1.4 ट्रिलियन डॉलर को वापस लाने तक की मांग भारत सरकार के समक्ष उठाई है. (भारत ऐसा देश है, जो विदेश में काला धन रखने के मामले में सबसे आगे है. दूसरे नंबर पर 400 बिलियन डॉलर के साथ रूस, तीसरे पर यूके, चौथे पर यूक्रेन और 96 बिलियन के साथ चीन पांचवें स्थान पर है.) बाबा रामदेव अकेले ऐसे जननेता हैं, जिनके देशभर में अनुयायी हैं और जिनके  नुस्खों से लाखों भारतीयों को लाभ पहुंचा है. वे वास्तव में उनकी कसमें खाते हैं. इस तरह की भी चर्चाएं थीं कि भाजपा से असंतोष के चलते संघ से बाबा की नजदीकियां बढ़ रही हैं. स्वाभाविक रूप से सरकार के पास डरने की वजहें थीं. सरकार बुरी तरह से भयभीत थी. खासतौर पर तब, जबकि समूचे संसार में नागरिक समाज की त्योरियां चढ़ी हुई हैं. ऐसे समय में, इस आंदोलन

Jun

13

2011

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माकपा मंत्री के घर से मिले नरकंकाल

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माकपा मंत्री के घर से मिले नरकंकाल

दिल्ली से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका द संडे इंडियन ने माकपा मंत्री के घर से मिले नरकंकालों को कवर स्टोरी बनाते हुए लिखा है कि "मंत्री सुशांता घोष के घर के आस पास घनी झाड़ियों में ये नरकंकाल बरामद किये गये हैं. पुलिस सूत्रों के मुताबिक नरकंकालों के जो अवशेष मिले हैं वे तृणमूल कार्यकर्ताओं के हैं. 22 सितंबर 2002 को उन्हें घरों से घसीट लिया गया था. बाद में उनकी निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी गयी थी."

2002 में मिदनापुर जिले के पलासिया गांव के दस तृणमूल कार्यकर्ता प्रचार के लिए घरों से निकले थे लेकिन वापस घर नहीं लौटे. तब से लेकर आज तक यह रहस्य बना रहा कि वे मिसिंग लोग आखिर गये कहां. तृणमूल आरोप लगाती रही कि उन कार्यकर्ताओं को मार दिया गया है लेकिन सीपीएम ने इस घटना की एफआईआर तक दर्ज नहीं की. अब जबकि राज्य में सत्ता परिवर्तन हो चुका है, तब जाकर पुलिस ने पूर्व मंत्री सहित 39 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया है.पुलिस ने बरामद नरकंकाल मिदनापुर जिला मुख्यालय में परीक्षण के लिए भेज दिया है.

इस घटना पर पत्रिका के प्रबंध संपादक शुतनु गुरू कहते हैं-"सच कहिए तो इस तरह की खोज में मैं जरा भी हैरान नहीं ह

मुझे

Jun

03

2011

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आईआईएम में आखिर सही क्या है?

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आईआईएम में आखिर सही क्या है?

फिर भी पाठ्य सामग्री की नकल की जा सकती है. वह काफी हद तक मानकीकृत है-कम से कम दुनिया के सबसे श्रेष्ठतम संस्थानों के बीच. ऐसे में संकाय सबसे अहम और विशिष्ट कारक बन जाता है. विभिन्न संकायों के लिए विभिन्न तरह के संकाय विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है. प्रबंधन शिक्षा के लिए ऐसे संकाय सदस्यों की जरूरत होती है, उदाहरण के लिए जिनमें शानदार संचार कौशल हो, सलाह देने का माद्दा हो, उद्योग से बेहतर तालमेल हो, और स्वाभाविक तौर पर नियमित शोध और लेखन हो. ठीक इसी तरह इंजीनियरिंग में संचार और शिक्षण की क्षमता जैसी दूसरी चीजों की तुलना में सबसे ज्यादा जरूरी होता है शोध. और इसी जगह पर आईआईटी और आईआईएम को सबसे ज्यादा परेशानी होती है (तमाम दूसरी बड़ी परेशानियों के अलावा, मसलन ग्लोबल एक्सपोजर की क मी या आईआईएम में छात्रों के चयन का गलत मापदंड, जिसमें अपेक्षाकृत बेहतर भावनात्मक लब्धि वाले वाणिज्य और कला स्नातकों की तुलना में पुरुष इंजीनियरों को वरीयता दी जाती है-जबकि बेहतर प्रबंधक होने के लिए उच्च बुद्धिलब्धता की तुलना में यह कहीं अधिक अहम मापदंड होता है.).

तो फिर आईआईएम और आईआईटी संकाय के साथ वास्तविक समस्या क्या है? पहली और सबसे बड़ी समस्या यह है

May

18

2011

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यह बंगाल में मार्क्सवाद के साथ दुष्कर्म का अंत है

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यह बंगाल में मार्क्सवाद के साथ दुष्कर्म का अंत है

बंगाल को जिन पर सबसे अधिक गर्व है वे हैं रवींद्र नाथ टैगोर.  उनकी कविताएं और लेखन, जो दबे-कुचलों की भावनाओं से ओतप्रोत हैं. इससे अलग ग्रामीण रोजगार, आत्मनिर्भरता और शांति निकेतन में किए जाने वाले वास्तविक कार्यों पर उनके विचार, मार्क्सवादी विचार प्रक्रिया से बहुत मेल खाते हैं. इसलिए अगर आप बंगाली हैं, तो माक्र्सवादी विचार आपको स्वाभाविक तौर पर पसंद आएंगे. इसी पसंद की वजह से ही माकपा तीन दशक पहले सत्ता में आई. जिस तरह माकपा सत्ता में आई वह कई मायने में ऐतिहासिक था. वस्तुत: ऐसा पहली बार हुआ जब लोकतांत्रिक प्रकिया के जरिए इतने बड़े पैमाने पर एक कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई. तमाम तरीकों से बंगाल के लोग घर से बाहर निकले और बड़ी उम्मीद व भरोसे के साथ परिवर्तन को वोट दिया.

अपने शासन के आखिरी दौर में कुख्यात बन चुके वाम मोर्चे ने शुरुआती दस सालों में पूरी ईमानदारी के साथ काम किया. लेकिन एक दशक बीतने के साथ ही बंगाल के साथ विश्वासघात की शुरुआत हो गयी. पिछले 24 सालों में उन्होंने सबकुछ बिगाड़ दिया. हेराफेरी, हत्या, बाहुबल, पुलिस का दुरुपयोग, जमीनी स्तर पर तानाशाही और दुनिया भर की तानाशाही को शर्मसार करते हुए माकपा ने सत्ता में बने

May

11

2011

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दुष्ट पाकिस्तान, महादुष्ट अमेरिका

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दुष्ट पाकिस्तान, महादुष्ट अमेरिका

बहुत दिन नहीं हुए, पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने सीएनएन को दिए एक साक्षात्कार में कहा था, 'मेरे हिसाब से, साफ-साफ कहूं तो वह (ओसामा बिन लादेन) मर चुका है, क्योंकि वह गुर्दे का मरीज था. मुझे नहीं लगता कि अफगानिस्तान में अभी भी उसका इलाज चल रहा है. और टेलीविजन पर दिखाई गई तस्वीर में वह बहुत कमजोर नजर आ रहा था. मैं इस बात पर जोर दूंगा कि वह मर गया है, दूसरी प्राथमिकता इसको कि वह अफगानिस्तान में कहीं जिंदा है." लेकिन मुशर्ऱफ के इस अंदेशे के थोड़े ही दिन बाद ओसामा मारा गया, पाकिस्तान के किसी सुदूरवर्ती कबीलाई इलाके के पनाहगार में नहीं, बल्कि एबटाबाद में, जो कि पाकिस्तान की सैन्य अकादमी से चंद किलोमीटर और इस्लामाबाद से महज 60 मील की दूरी पर स्थित है। इतना ही नहीं, पूरे इलाके को आतंकवादियों, खासतौर पर अल-कायदा का गढ़ माना जाता है. इस साल मार्च में, अलकायदा से संबंध रखने वाले इंडोनेशियाई आतंकवादी उमर पाटेक को इसी इलाके में पकड़ा गया था. वह बाली बमबारी में शामिल था. इसके अलावा, जेमा इस्लामिया ताहिर शहजाद (अलकायदा का सहयोगी) के अहम सदस्य को भी इसी इलाके में देखा गया था.

घटनाओं का सिलसिला और इस्लामाबाद व पाकिस्तान

May

05

2011

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जातिमेव जयते!

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जातिमेव जयते!

पिछले चुनाव में बसपा ने सपा के पिछड़े और मुस्लिम वोट बैंक के अलावा भाजपा के सवर्ण वोट बैंक में जबरदस्त सेंध लगाया था. लिहाजा तब उसने करीब 31 फीसदी वोट हासिल कर विधानसभा की 403 सीटों में से 206 सीटें कब्जाते हुए जबरदस्त सफलता हासिल की थी और दो तिहाई बहुमत से सरकार बनाई थी. लेकिन इस बार सभी विपक्षी दल जातीय समीकरण की ऐसी व्यूह रचना करने में जुटे हैं जिससे बहन जी के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को ध्वस्त किया जा सके. यही वजह है कि टिकट बंटवारे में इस बार विपक्षी दल जातीय समीकरण के आधार पर जिताऊ उम्मीदवारों को तवज्जो दे रहे हैं. सपा अपने मुस्लिम वोटों को हासिल कर 'माई फैक्टर' यानी यादव-मुस्लिम गठजोड़ को फिर से कायम करना चाहती है तो कांग्रेस और भाजपा उसके दलित वोट बैंक में ही सेंध लगाने में जुट गए हैं.

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव सत्तारूढ़ बसपा का ही नहीं, प्रमुख विपक्षी पार्टी सपा और लगातार हाशिए पर जा रही भाजपा और कांग्रेस का भी भविष्य तय करेंगे. यह चुनाव केवल प्रदेश की राजनीति की दिशा ही तय नहीं करेगा, बल्कि आने वाले समय में दिल्ली की राजनीति किस रास्ते से हो कर

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