धर्म अधर्म
Jan
28
2012
धर्मांतरण के लिए सरकारी निमंत्रण
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हालांकि मंत्री जी ने कहा कि वह कैरिटस के बारे में कैथोलिक संगठन के रुप में नहीं बल्कि कैथोलिक संचालित सामाजिक संगठन के रुप में बात कर रहे है। कैरिटस जलापूर्ति, आवास, पुनर्वास और प्राकृतिक आपदाओं के शिकार लोगों के लिए कार्य करता है। जयराम रमेश ने छतीसगढ़ के नरायणपुर जिले में रामकृष्ण मिशन द्वारा किए गए विकास कार्यो का जिक्र करते हुए कहा कि ग्रामीण विकास मंत्रालय झारखंड, छतीसगढ़ और ओडिशा में कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में दीर्घकालीन आधार पर ‘कैरिटस इंडिया’ के साथ इस तरह की भागीदारी कर सकता है आपको महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभानी है बशर्ते आप कुछ लक्ष्मण रेखा का सम्मान करते हो।
अगले रोज ही कश्मीर से आती एक ताजा खबर इसी ‘लक्ष्मण रेखा’ के एक और आयाम को रेखांकित करती है। वहां की एक शरीयत अदालत ने धर्मांतरण विवाद पर पादरी सी एम खन्ना, गयूर मसीह, चंद्रकांता खन्ना और पादरी जिम ब्रेस्ट के राज्य में प्रवेश पर पाबन्दी का फैसला सुनाया और इसी के साथ घाटी के मिशनरी स्कूलों की निगरानी के साथ वहां इस्लामिक शिक्षा देने की पहल करने को भी कहा हैं श्रीनगर स्थित आल इंडिया सेंटस चर्च के पादरी सीएम खन्ना पर मुस्लिम युवकों को ‘प्रलोभन’ देकर धर्मांतरण कराने के आरोप लगे
Dec
22
2011
अपनी ही मुक्ति की आस में निराश
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भारत उपमहाद्वीप में ईसाइयत का आगमन ईसा मसीह के शिष्य संत थॉमस द्वारा अरब की खाड़ी पार कर भारत में आने के साथ ही शुरु हो गया था। केरल और तमिलनाडु के कई परिवारों द्वारा ईसाइयत को अपनाने के बावजूद यह सुदूर दक्षिण के अलावा आगे नही बढ़ पाया था। 14वीं सदी में पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा तथा उसके साथ आये धर्म-प्रचारकों ने ईसाइयत को आक्रमक तरीके से फैलाने का कार्य हाथ में ले लिया। यहां पहले से मौजूद केरल के ईसाई सीरियाई पद्धति से अपना कार्य करते थे। वे पोप की सत्ता के आधीन नही थे। वास्कोडिगामा तथा उसके साथ आये धर्म-प्रचारकों का पहला सामना केरल की ईसाई पद्धति से हुआ। पाश्चात्य पद्धति के धर्मप्रचारकों ने अत्यंत आक्रोशपूर्ण एवं आक्रामक तरीके से सीरियाई ईसाइयों को पोप की सत्ता को मानने पर मजबूर कर दिया। लम्बे उतार-चढाव के बीच पाश्चात्य तथा भारतीय सीरियाई पद्धतियां यह मानने पर मजबूर हो गई कि ईसाइयत को फैलाने के लिये उनका एक साथ रहना जरुरी है।
इतना सब होने के बावजूद भी ईसायत को वह सफलता नही मिल पाई जिसकी आशा वास्कोडिगामा के साथ आये धर्मप्रचारकों ने की थी। 17वीं सदी में चर्च ने पाश्चात्य पद्धति के साथ साथ हिंदू उपासना पद्धतियों और प्रथाओं
Oct
22
2011
छद्म वेश, कुटिल संदेश
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क्या वेटिकन और उसके पदाधिकारियों को इस बात की जानकारी नही है कि भारत में कैथोलिक चर्च और ईसाइयों को उतनी ही धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है जितनी यहां के बहूसंख्यक हिंदुओं को। इसी स्वतंत्रता का प्रमाण है कि पोप बेनडिक्ट 16वें के भारत में प्रतिनिधी बिशप स्लवाटोर पान्शियों (वेटिकन द्वारा भारत में नियुक्त राजदूत) बिना किसी अवरोध के पोप की सहमति से भारतीय बिशपों को नियुक्त करते जा रहे है। बिना किसी अवरोध के नये चर्चो एवं स्कूलों का निर्माण कराया और उन्हें अल्पसंख्यक अधिकारों के तहत चलाया जा रहा है। इतना सब होने के बावजूद आखिर वेटिकन को चर्च के लिए और कैसी धार्मिक स्वतंत्रता चाहिए?
वेटिकन का मानना है कि पिछले कुछ समय से ईसाइयों को हिंदू अतिवादियों के कारण हिंसा और उत्पीड़न की घटनाओं का सामना करना पड़ा है। कई राज्यों में कानून के कारण धर्म प्रचारकों को काम करने में दिक्कतें आ रही है। लेकिन वेटिकन को यह भी समझना चाहिए कि हालही के वर्षो में जो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं कुछ राज्यों में घटी है उनके पीछे के मूल कारण ‘धर्मांतरण’ और दूसरों की ‘आस्था और विश्वास’ में कुछ धर्म प्रचारकों का अनावश्यक हस्तक्षेप ही था। इस तथ्य की तरफ इशारा उड़ीसा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश आदि
Sep
12
2011
आदिवासी संस्कृति के लिए संकट बना चर्च
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परसंस्कृति ग्रहण की समस्या ने आदिवासी समाज को एक ऐसे दोराहे पर खड़ा कर दिया है, जहां से न तो वह अपनी संस्कृति को बचा पा रहा है और न ही आधुनिकता से लैस होकर राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हो पा रहा है। बीच की स्थिति के कारण ही उनके जीवन और संस्कृति पर खतरा मंडरा रहा है। यह सब कुछ उनके जीवन में बाहरी हस्तक्षेप के कारण हुआ है।
पिछले दिनों दिल्ली में विभिन्न राज्यों से आए आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों के चेहरो पर अपनी संस्कृति से लगातार कटते जाने की पीड़ा साफ दिखाई दे रही थी। यह प्रतिनिधि राजधानी में फोरम फॉर सोशल जस्टिस द्वारा आयोजित भारतीय जनजातियों के सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक जीवन पर धर्मप्रचार के प्रभाव पर एक जनसुनवाई एवं कार्यशाला में शामिल होने के लिए आए थे। इस जनसुनवाई में देश के बारह राज्यों के सौ से ज्यादा आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों को गुजरात उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश सुरेश सोनी, जस्टिस डीएस तेवतिया
्टिस वीके गुप्ता, पूर्व पुलिस आयुक्त केपीएस गिल, पूर्व राजदूत प्रभात शुक्ला साहित 14 सदस्यों की जूरी ने सुना।भारत में ब्रिटिश शासन के समय सबसे पहले जनजातियों के संस्कृतिक जीवन में हस्तक्षेप की प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी। जनजातियों की
Sep
12
2011
दो वक्त की रोटी के लिए धर्म बदलने का दर्द
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मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के अधिकतर आदिवासियों ने तो पहले ही अपना धर्म बदल लिया था। जो बचे हैं, वे भी महंगाई की मार से धर्म बदलने को मजबूर हैं। गोपालपुरा का ‘झीतरा’ अब ‘थॉमस’ बन गया है। झीतरा पहले भूखों मर रहा था, थॉमस बनने के बाद अब उसे दो जून की रोटी मिल रही है। यह भोजन उसे कब तक मिलेगा, नहीं कह सकते, लेकिन उसे उम्मीद है कि मिशनरी उसे आगे भी जिंदा रखेगी। बीमार झीतरा के बच्चों को अब दवाएं भी मिल रही हैं। दवा और अनाज के बदले उसे कुछ नकदी भी मिली। झीतरा डंके की चोट पर कहता है, ‘ये धर्म क्या होता है। जो धर्म हमें जिंदा रखे, वही सही है। धर्म बदलने के बाद भी हमारी जाति, तो बदली नहीं, केवल धर्म बदल गया।’ इसी जिले के भगौर की टिहिया अब मरियम बन गई है। ऐसा नहीं है कि टिहिया कोई पहली आदिवासी महिला है, जिसने धर्म परिवर्तन किया है। पिछले कुछ सालों में हजारों महिलाओं ने धर्म परिवर्तन किया है, लेकिन टिहिया का किस्सा कुछ अलग ही है। टिहिया एक पखवाड़े से बीमार थी। न घर में खाने को अनाज, न शरीर ढकने को कपड़े और न ही दवा-दारू के
Sep
08
2011
इस्लामिक आतंकवाद का खूनी नजरिया
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22 करोड़ की यह विशेष आबादी अब देश को लेबनान/इथोपिया/सोमालिया जैसे संस्करण में तब्दील करने के लिए तैयार बैठी हुई है। यह कहना कि सच नहीं है पूरी विशेष आबादी समस्या का घोत्तक नहीं हो सकती है और उसे जिम्मेदार ठहराना न्यायिक नहीं है। पर प्रश्न यह उठता है कि आखिर यह विशेष आबादी अपने आतंकवादियों व रक्तपिशाचुओं से अलगाव क्यों नहीं रखती है? उन्हें छुपने की जगह क्यों देती है? उस विशेष आबादी को हर चीज और हर मुद्दे पर अपना मजहब की संकट में क्यों दिखता है? हर जगह इन्हें जेहाद की पाठशाला चलाने और अलग मजहबी श्रृखंलाएं क्यों चाहिए? आतंकवाद का मीनार ओसामा बिन लादेन मारा जाता है पर उबाल भारत की विशेष आबादी में उठता है। कश्मीर की बात अलग है पर लखनऊ/कोलकाता/हैदराबाद/पटना/गुवाहाटी आदि शहरों में ओसामा बिन लादेन को शहीद घोषित कर अमेरिका विरोधी प्रदर्शन क्यों होते हैं? फिर भी सत्ता चुपचाप तमाशबीन होती है। कोई अरूधंती राय/महेश भट्ट /तीश्ता सीतलवाड़ के मुंह नहीं खुलते? आखिर क्यों? कठोरतम निष्कर्ष पर जाना ही होगा कि इस्लाम हिटलर के नाजी सेना की तुलना में रक्त बहाने में कई कोस आगे निकल चुका है। नाजियों का निशाना तो सिर्फ यूहुदी थे। इस्लाम का निशाना सभी गैर इस्लामिक धर्मावलम्बी
Jul
19
2011
चर्च के चक्रव्यूह में धर्मांतरित ईसाई
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धर्मांतरित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने की मांग सबसे पहले पूना पैक्ट के बाद 1936 में उठाई गई थी, जब ब्रिटिश शासन के दौरान अनुसूचित जातियों की पहली सूची प्रकाशित की गई थी। ब्रिटिश सरकार ने यह कहते हुए, इस मांग को खारिज कर दिया था कि ‘‘कोई भी भारतीय ईसाई अनुसूचित जाति की श्रेणी की मांग करने का हकदार नही है।’’ क्योंकि ईसाइयत में जातिवाद का कोई स्थान नही है, अतः ब्रिटिश सरकार ने इस मांग को अंतिम रुप से अस्वीकृत कर दिया था।
संविधान सभा में चर्चा के दौरान धर्मांतरितों को आरक्षण देने मुद्दा एक बार फिर उठाया गया यह ब्रिटिश सरकार के ‘कम्युनल अवार्ड’, 1935 से जुड़ा हुआ था जिसके अंतर्गत कुछ धार्मिक वर्गो के लिए विधायिका में सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया था। संविधान सभा के अधिक्तर सदस्यों डा. अम्बेदकर, श्री जवाहरलाल नेहरु, सरदार पटेल, सी गोपालाचारी, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि नेताओं ने इस मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि हिन्दु समाज में निम्न माने जाने वाले वर्गो को छोड़कर किसी अन्य धर्म के अनुयायी को यह सुविधा नही दी सकती क्योंकि तथाकथित अनुसूचित जातियां शताब्दियों से छूआछात और सामाजिक भेदभाव की पीड़ा को
Jul
08
2011
खतरे में भगवान का खजाना
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उसने आस्था के विष्णु देवता की दौलत को जस का तस सहज भाव सहेजे रखा। आधुनिक भारत में जनता की दुहाई देने वाले राजा ने लूटा और गुजरे जमाने के राजा ने ट्रस्टशिपी के भरोसे को कायम रखा। तब और अब के इस फर्क पर जरूर सोचे। यह बहुत जरूरी है। इसलिए क्योंकि हिंदू मंदिर पर आधुनिक भारत की प्रोग्रेसिव जमात की गिद्ध निगाहे लग चुकी है। नेता, अफसर, अदालत और प्रोग्रेसिव जमात अपने कुतर्को से हिंदू मंदिर के खजाने के दोहन में जुटेगें। नेताओं, सरकार और अदालती बिरादरी में मांग उठ गई है कि अमीर पदमनाभन मंदिर का राष्ट्रीयकरण हो। मंदिर की संपत्ति सरकार के खजाने में आए। ताकि नेताओं-अफसरों के लिए खजाना खुले। इस तरह की मांग के कई मायने है।इस तरह की मांगों का सख्त विरोध होना चाहिए कि मंदिर का पैसा जनता के काम आएं। आस्थावान देवी-देवता को जो चढाते है उसके उपयोग और देखभाल का दायित्व ट्रस्टी या पुजारी का ही होता है। जिस राजपरिवार ने मंदिर की दौलत बचाए रखी उससे छीनने की गिद्द निगाहों का विरोध होना चाहिए।
याद रहे भारत का इतिहास बर्बरताओं से भरा हुआ है। जिन्होंने इतिहास नहीं पढ़ा है, वे भी जानते हैं कि भारत के मंदिरों पर कैसे
Jun
24
2011
संतों की संपत्ति पर बेवजह सवाल
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सरकारी डंडा चलने के बाद बाबा रामदेव ने खुद घोषणा की है कि उनके पास 1100 करोड़ रुपये की संपत्ति है। इसी तरह सत्य साई बाबा के नाम पर दुनियाभर में करीब चालीस हजार करोड़ की संपत्ति का अनुमान लगाया गया है। तीन साल पहले श्रीश्री रविशंकर की संपत्ति 400 करोड़ रुपये, आसाराम बापू की 350 करोड़ रुपये, माता अमृतानंदमयी की 400 करोड़ रूपये, सुधांशु महाराज की 300 करोड़ रुपये, मोरारी बापू की 150 करोड़ रुपये आंकी गई थी। जिसे माना जा रहा है कि आज के दौर में उनकी कुल संपत्ति इनसे चार गुनी ज्यादा हो चुकी हैं।
इसी तरह एक आकलन के मुताबिक, इस देश में करीब दस लाख मंदिर हैं। हर मंदिर की अपनी कुछ न कुछ कमाई जरूर है, लेकिन देश में करीब 100 मंदिर ऐसे हैं, जिनकी पूरी संपत्ति देश के टॉप के पांच सौ रईसों से भी ज्यादा है। माना जाता है कि तिरूपति का बालाजी मंदिर कमाई के मामले में देश में पहले नंबर पर है। यह भी सच है कि देश में मंदिरों को मिलने वाले दान और चढ़ावे पर कोई टैक्स नहीं लगता। यह भी सच है कि कुछ मंदिरों और धर्मगुरुओं के आश्रम में अनाचार की खबरें भी आई हैं,
Jun
10
2011
हिन्दू आतंकवाद पर हद से आगे
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मैं यहां अच्छी नीयत वाले अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और ऐसे चुनिंदा झोलाछाप लोगों की बात कर रहा हूं जो यह मानकर चलते हैं कि हर तरह के नीतिगत मुद्दों पर यूपीए सरकार को राय देने का अधिकार उन्हें स्वयं ईश्वर ने दिया है. ऐसे भलेमानुसों की लंबी कतार में सबसे ऊपर उन लोगों को रखा जाएगा जो सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) के सदस्य हैं. एनएसी के सदस्यों की भारत के आम आदमी के हितों के लिए काम करने की प्रतिबद्धता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता. मुझे यह कहने में भी कोई हिचक नहीं है कि देश को एक नया रास्ता दिखाने वाले कई प्रयोग; जैसे सूचना का अधिकार कानून, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और शिक्षा का अधिकार जैसे कानून का श्रेय भी एनएसी को ही जाता है. यह देखकर भी बहुत अच्छा लगा कि एनएसी के सदस्यों ने खाद्य सुरक्षा कानून को लेकर सरकार के असंवेदनशील और कठोर रवैये के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई थी.
ऊपर बताए गए सभी मामलों में भलेमानुसों ने भारत के उन गरीबों और वंचितों के अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ सार्थक काम किया जिसकी भलाई के नाम पर किसी भी सरकार ने जबानी जमाखर्च से


