पर्यावरण
Jan
20
2012
शहर के पानी की बदबूदार कहानी
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इसमें हमारे किसी भी योजनाकार को कोई शक नहीं है कि शहरीकरण जिस गति से बढ़ रहा है उसमें और अधिक तेजी आयेगी. लेकिन इस तेज गति से बढ़ते शहरों को पानी कहां से मिलेगा और वे अपने सीवेज का निष्पादन कैसे करेंगे? जिस रिपोर्ट का हम यहां जिक्र कर रहे हैं उस रिपोर्ट में सीएसई ने इसी सबसे महत्वपूर्ण सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है. लेकिन अपनी पड़ताल के दौरान हमें बहुत आश्चर्य हुआ कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश में न तो कहीं ठीक से डाटा उपलब्ध है, न ही इस बारे में कोई महत्वपूर्ण शोध हुए हैं और सोच के स्तर पर भी गजब का खालीपन है. शहर में रहनेवाले लोगों को पानी उनके घर के अंदर मिल जाता है. वे पानी का उपयोग करने के बाद जो सीवेज निर्मित करते हैं वह नदियों के हवाले कर दिया जाता है जिससे वही नदियां मरने लगती हैं जो शहरों को अपना पानी देकर जीवित रखती हैं. लेकिन हमारा शहरी समाज पानी और नदी के बीच इतना सा भी संबंध जोड़ना नहीं जानता है कि टायलेट फ्लश करने से नदी के मरने का क्या संबंध है? वे जानना तो नहीं चाहते लेकिन उन्हें जानने की जरूरत है.
Dec
24
2011
सुनिए मधुमक्खी का संदेश
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लेकिन जिसे विकसित मनुष्य कह सकते हैं उसने जो कुछ किया उससे केवल पशुओं के अस्तित्व पर ही नहीं बल्कि वनस्पतियों के अस्तित्व पर भी संकट आ गया है. पहले मनुष्य ने पशुओं को मारा होगा लेकिन पशु उससे दूर नहीं भागे थे. लेकिन आज प्रकृति में मौजूद जीव धीरे-धीरे मनुष्य से दूर होते जा रहे हैं. याद करिए आखिरी बार आपने कब किसी घोसले को देखा था? याद करिए कि आपने अपने आस-पास किसी मधुमक्खी के छत्ते को कब देखा था?
प्रकृति का संदेश देने का तरीका मनुष्य द्वारा ईजाद किये गये तरीकों से श्रेष्ठ है ही. इस पर तो शायद ही कोई सवाल उठाये. इंसानों की पिछली पीढ़िया जब विज्ञान को इतने अवैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल नहीं करती थीं तब हम प्रकृति के उपकरणों के सहारे प्रकृति के संदेशों को ज्यादा आसानी से समझ लेते थे. लेकिन हम जितने वैज्ञानिक हुए उतना ही हमने अपने उपकरणों पर भरोसा करना शुरू कर दिया. इंतहा तो तब हो जाती है जब हम भावनात्मक रोगों को मापने के लिए भी मशीनों का इस्तेमल करने लगते हैं. क्या भावनाओं को मशीन से नापा जा सकता है? लेकिन पिछली एक सदी को आप देखिए तो हमारे विकास की वैज्ञानिक सोच ने
Nov
29
2011
बर्बादी के कगार पर बारहसिंघा
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विश्व की दुर्लभतम वन्यजीवों की प्रजातियों में से एक ‘बारहसिंघा’ पिछली सदी तक उत्तर भारत तथा दक्षिण नेपाल में पाया जाता था। वैसे हिमालय की तलहटी के साथ ही आसाम से लेकर पूर्व में सुन्दरवन व पश्चिम में सिन्धु नदी के बाढ़युक्त मैदानों एवं दक्षिण में गोदावरी तक इनकी उपस्थिति के प्रमाण मिले हैं। भारतीय द्वीप में बारहसिंघों की तीन उप प्रजातियां पायी जाती है। जीववैज्ञानिकों में ‘सरबस डुबासोली’ नाम से प्रसिद्ध इस जन्तु को अंग्रेजी में ‘स्वॉप डियर’ भी कहते हैं। भारत-नेपाल सीमावर्ती उत्तर प्रदेश के जिला लखीमपुर-खीरी के विश्व पर्यटन मानचित्र पर स्थापित विख्यात दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र में ‘सरबस डुबासोली’ तथा मध्यप्रदेश के कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में ‘सरबस ब्राडेरी’ के साथ ही आसाम में रंजीत सिंगी प्रजाति मिलती है। लगभग 180 किलो वजन तथा 54 इंच ऊंचे (कंन्धे से) इस मृग (हिरन) के संीग करीब 5 इंच व्यास तथा 30 इंच तक लम्बे होते हैं। वैसे भारत से सटे नेपाल के दक्षिण भाग में भी कुछ बारहसिंघे दिखाई पड़ जाते हैं। नर बारहसिंघों के सिर पर सींगों का जहां खूबसूरत मुकुट होता है वहीं मादा के सिर पर सींग नहीं पाये जाते हैं इसके सींग प्रत्येक साल प्रजननकाल समाप्त होते ही झड़ जाते हैं लेकिन अगला प्रजनन
Nov
11
2011
बाघ के लिए त्रासदी बना इंसान
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इसमें पिछली गणना में सुंदर वन को शामिल नहीं किया गया था जबकि इसबार सुंदर बन के बाघ शामिल हैं। फिर बाघों की संख्या कैसे बढ़ गई यह स्वयं में विचारणीय प्रश्न है। आंकड़े भले ही देश में बाघों की संख्या बढ़ा रहे हों किंतु हकीकत एकदम से बिपरीत है। भारत में बाघों की दुनिया सिमटती ही जा रही है। इसका प्रमुख कारण है कि पिछले कुछेक सालों में मानव और बाघों के बीच शुरू हुआ संघर्ष। बढती आवादी के साथ प्राकृतिक संपदा एवं जंगलों का दोहन और अनियोजित विकास वनराज को अपनी सल्तनत छोड़ने के लिए विवश होना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के पूरे तराई क्षेत्र का जंगल हो अथवा उत्तरांचल का वनक्षेत्र हो या फिर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्, उड़ीसा आदि प्रदेशों के जंगल हों उसमें से बाहर निकलने वाले बाध चारों तरफ अक्सर अपना आतंक फैलाते रहते हैं और वेकसूर ग्रामीण उनका निवाला बन रहे हैं। बाध और मानव के बीच संधर्ष क्यो बढ़ रहा है? और बाघ जंगल के बाहर निकलने के लिए क्यों बिवश हैं? इस विकट समस्या का समय रहते समाधान किया जाना आवश्यक है। वैसे भी पूरे विश्व में बाघों की दुनिया सिमटती जा रही है। ऐसी स्थिति में भारतीय वन क्षेत्र के
Oct
27
2011
गरीब पर गिरेगी अमीर के अय्याशी की गाज
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जिस रिपोर्ट के हवाले से यह खबर आई है कि पर्यावरण में होनेवाले बदलाव के कारण दुनिया के सर्वाधिक गरीब देश सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे वह लंदन की एक रिसर्च संस्था है मेपलक्राफ्ट. मेपलक्राफ्ट बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक के लिए ठेके पर रिसर्च करती है और अपने शोध के लिए विश्वसनीय होने का दावा करती है. इसी शोध संस्था ने पर्यावरण में होनेवाले बदलाव का एक एटलस जारी किया है जिसका नाम है क्लाइमेट चेंज-फोर्थ ग्लोबल एटलस रिपोर्ट. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व के बिगड़ते पर्यावरण का सबसे अधिक प्रभाव एशिया और अफ्रीका के देशों पर होगा. शोधकर्ता मानते हैं कि जिन अफ्रीकी और एशियाई देशों में बिगड़ते पर्यावरण का सबसे बुरा प्रभाव होगा उसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं क्योंकि जीवन के न्यूननत मानक उन्हें पूरे नहीं किये है जिसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ेगा. ये मानक मुख्यरूप से शहरी जीवन और औद्योगिक उत्पादन पर आधारित हैं.
यह शहरी जीवन और औद्योगिक उत्पादन अफ्रीकी और एशियाई देशों तक कैसे पहुंचा यह दार्शनिक विषय है इसलिए रिपोर्ट इस बारे में कुछ नहीं क र बनाकर ही विश्लेषण किये गये हैं. मेपलक्राफ्ट मानता है कि "बेतहाशा जनसंख्या वृद्धि, कमजोर प्रशासन, भ्रष्टाचार, गरीबी और अन्य
Oct
09
2011
गैंडों को बसाएंगे पर हाथी कहां जाएंगे?
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यह स्वयं में विचारणीय प्रश्न है। यद्यपि गैंडा एवं हाथी एक साथ रह सकते हैं यह भी सर्वविदित है लेकिन इनके बीच होने वाले संघर्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इन सभी परिस्थियिों पर अध्ययन और विचार विमर्श के बाद ऐसी दूरगामी परियोजना पर कार्य किया जाना हितकर होगा जिसमें दोंनों प्रजाति के वनपशु सुरक्षित रह सकें। कहीं ऐसा न हो कि अति उत्साह में गैंडा परियोजना का विस्तार कर दिया जाए और दुधवा के जंगल में रहने वाले हाथी पलायन को मजबूर हो जाए। जंगल के बीच भादीताल इलाका में रहने वाले हाथी अपने प्राकृतिक वासस्थल से विस्थापित होगें तो वह बाहर भागेंगे ऐसी दशा में वनवर्ती क्षेत्रों में मानव तथा हाथियों के बीच होने वाले संघर्ष से इंकार नहीं किया जा सकता है, ऐसी दशा में घाटा हाथियों और गैंडों के ही हिस्से में आएगा।
दुधवा नेशनल पार्क में ‘गैंडा पुनर्वास परियोजना‘ शुरू होने से पहले योजनाकारों ने यह तय किया था कि यहां की समिष्टि में तीस गैंडों को बाहर से लाकर बसाया जाएगा। इनकी संख्या जब पूरी हो जाएगी तब सभी गैंडों को ऊर्जाबाड़ के संरक्षित इलाका से निकालकर खुले जंगल में छोड़ दिया जाएगा। योजनाकारों का यह सपना तो साकार नहीं हो
Aug
09
2011
पतित पावनी गंगा और काइली का ‘कचराघर’
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काइली ने पतित पावनी गंगा को कचराघर कहकर लाखों-करोड़ों हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। ये कड़वी सच्चाई है कि अपनी मूर्तिवत् स्थिति और धार्मिक धरोहर के बावजूद आज गंगा प्रदूशण-संबंधी भारी दबावों का सामना कर रही है और इसकी जैव-विविधता तथा पर्यावरण-संबंधी व्यावहारिकता (सस्टेनबिलिटी) को इनसे पैदा होने वाले खतरों का सामना करना पड़ रहा है। लगातार बढ़ती हुई आबादी, अनियोजित शहरीकरण और उद्योगीकरण की वजह से नदी के जल की गुणवत्ता पर असर पड़ा है। आज गंगा के जल में सीवेज के साथ-साथ सॉलिड वेस्ट और औद्योगिक वेस्ट की भरमार है, जो इसके किनारे रहने वाले लोगों तथा यहां होने वाली आर्थिक गतिविधियों की देन है। आज तो मानवीय दखलंदाजी इतनी बढ़ गई है कि गौमुख में पर्यटकों द्वारा छोड़ा गया प्लास्टिक अटका पड़ा रहता है।
गौरतलब है कि दुनिया भर में बसे हिन्दुओं के लिए गंगा मात्र एक नदी नहीं बल्कि जीवनधारा है। हिन्दुओं के बहुत से पवित्र तीर्थस्थल गंगा नदी के किनारे बसे हुये हैं जिनमें वाराणसी, हरिद्वार सबसे प्रमुख हैं। गंगा में डुबकी लगाने का मतलब पाप से छुटाकारा समझा जाता है। गंगा का उदगम हिमालय से भागीरथी के रुप मे गंगोत्री हिमनद से उत्तरांचल में होता है। इसके विशाल बेसिन में देश के
Jun
23
2011
गढ़ में ही गायब हो रहे बाघ
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नई गणना आने के पहले तक वन विभाग आश्वस्त था कि यहां बाघों की संख्या बढ़ी है, पर रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया। वन विभाग का कहना है कि केंद्र सरकार की रिपोर्ट से हम संतुष्ट नहीं हैं। राज्य के वन मंत्री सरताज सिंह कहते हैं, भारतीय वन्य जीव संस्थान को जितने बीटों की जानकारी दी गई थी, उन सभी को गणना में शामिल नहीं किया गया। हमने 493 बीट भेजे थे, पर गणना में 423 बीट ही लिए गए। दरअसल वन विभाग, जिन बीटों की गणना नहीं किए जाने का दावा कर रहा है, वे टाइगर रिजर्व के बाहर के हैं। बाघों की संख्या में सबसे यादा गिरावट कान्हा एवं पेच उद्यान में आई है।
यह इस बात का भी प्रतीक है कि प्रदेश से टाइगर स्टेट का दर्जा छिनने के बावजूद बाघों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। वन विभाग की सुस्ती के चलते बाघों का शिकार बदस्तूर जारी है। हाल ही में स्पेशल टास्क फोर्स ने सागर में एक महिला को बाघ की खाल के साथ गिरफ्तार किया है। स्थिति यह है कि बाघ संरक्षित क्षेत्रों के अलावा देवास, खंडवा, हरदा जैसे असंरक्षित क्षेत्रों में भी बाघों के शिकार के लिए जानी जाने वाली
May
12
2011
तानाशाह की नदी
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लीबिया की गिनती दुनिया के कुछ सबसे सूखे माने गए देशों में की जाती है। देश का क्षेत्रफल भी कोई कम नहीं। बगल में समुद्र, नीचे भूजल खूब खारा और ऊपर आकाश में बादल लगभग नहीं के बराबर। ऐसे देश में भी एक नई नदी अचानक बह गई। लीबिया में पहले कभी कोई नदी नहीं थी। लेकिन यह नई नदी दो हजार किलोमीटर लंबी है, और हमारे अपने समय में ही इसका अवतरण हुआ है! लेकिन यह नदी या कहें विशाल नद बहुत ही विचित्र है। इसके किनारे पर आप बैठकर इसे निहार नहीं सकते। इसका कलकल बहता पानी न आप देख सकते हैं और न उसकी ध्वनि सुन सकते हैं। इसका नामकरण लीबिया की भाषा में एक बहुत ही बड़े उत्सव के दौरान किया गया था। नाम का हिंदी अनुवाद करें तो वह कुछ ऐसा होगा- महा जन नद।
हमारी नदियां पुराण में मिलने वाले किस्सों से अवतरित हुई हैं। इस देश की धरती पर न जाने कितने त्याग, तपस्या, भगीरथ प्रयत्नों के बाद वे उतरी हैं। लेकिन लीबिया का यह महा जन नद सन् 1960 से पहले बहा ही नहीं था। लीबिया के नेता कर्नल मूंमारअल गद्दाफी ने सन् 1969 में सत्ता प्राप्त की थी। तभी उनको
Apr
11
2011
बाघ की बाढ़ हो, न जीना अपाढ़ हो
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ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि इस अवधि में ज्यादातर बाघ संरक्षित क्षेत्रों से निराशजनक तथ्य ही ज्यादा बाहर आए थे। इस दौरान बाघों की संख्या में भारी कमी की आशंका जताने वाले तथाकथित गैर सरकारी संगठनों और वन्य जीव विशेषज्ञों की कमी नहीं थी। ऐसे निराशजनक माहौल में यदि बाघों को बचाने के अभियान ने यदि मामूली सफलता भी हासिल की है, तो इसकी तारीफ होनी चाहिए। हमारे यहां बाघ संरक्षण हमेशा से विवाद का विषय रहा है। कभी बाघों की गणना पर तो कभी इनके संरक्षण के तौर-तरीकों पर सवाल उठते रहे हैं। चूंकि इस बार गणना अत्याधुनिक वैज्ञानिक तरीके से की गई है, इसलिए इस पर सवाल खड़ा करना न्यायसंगत नहीं होगा। हां, संरक्षण की दिशा और दशा पर अभी भी मंथन की व्यापक गुंजाइश है।
पर्यावरण व वन मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों पर गौर करें तो साफ हो जाता है कि बाघ संरक्षण के अभियान में कील-कांटों की कमी नहीं है। सबसे ज्यादा चिंता की बात है बाघों के प्रवास का क्षेत्र निंरतर कम होना। 2006 में जहां बाघ 93,600 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विचरण करते थे, वहीं अब यह क्षेत्र 72,800 वर्ग किलोमीटर ही रह गया है। इसी का नतीजा है कि कुल बाघों


