बात करामात
Feb
22
2012
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
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उल्लेख्नीय है कि बंगलादेश के भाषाई आन्दोलन के शहीदों की याद में संयुक्त राष्ट्र संघ ने नवम्बर १९९९ में २१ फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूम में मनाने की घोषणा की. तब से यह दिन दुनिया भर में मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है लेकिन इस दिन को लेकर जैसा उत्साह और उत्सवधर्मिता तथा जागरूकता एवं आम जनता की भागीदारी बांग्लादेश में दिखाई देती है वैसी अन्यत्र दुर्लभ है. भारत में तो इस दिवस को शायद लोग जानते भी नहीं है. भारतीय जनता के लिए यह दिवस वैसे ही लगभग अनजाना है जैसे अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस (२ अक्टूबर). हो सकता है कि बौद्धिक और शासक वर्ग इन ‘दिवसों’ से परिचित हो लेकिन आम जनता को बिल्कुल इनसे कोई सरोकार नहीं दिखाई देता. उत्सवधर्मिता और उत्साह तो दूर की बातें हैं. ऐसा भी नहीं है कि भारतीय मातृभाषाओं के सामने कोई खतरा मौजूद नहीं है इसलिए भारतवासी इन ‘दिवसों’ की औपचारिकता को अपने लिए निरर्थक मानते हों. और आयोजनों और उत्सवों से दूर रहते हों.
लेकिन, बांग्लादेश में २१ फरवरी का दिन राष्ट्रीय उत्सव की तरह से मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा २१ फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में घोषित करने की पृष्ठभूमि में
Feb
12
2012
गोपन को ओपन करती तकनीकि
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ज्ञातव्य है जोधपुर की भंवरीदेवी के लापता होने और हफ्तों तक सरकार की खामोशी से नाराज राजस्थान हाईकोर्ट की फटकार से राजस्थान सरकार की सुस्ती दूर हुई तथा जाट नेता महिपाल मदेरणा को बर्खास्त कर दिया गया और तीन महीने बाद गिरफ्तार कर लिया गया ! 1992 के अजमेर के अश्लील फोटो ब्लैकमेल कांड में युवक कांग्रेस के तत्कालीन जिला अध्यक्ष फारूख चिश्ती को सजा सुनाते समय कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि “ये घिनौनेपन और नैतिक पतन की पराकाष्ठा है! आपराधिकता का ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं मिले !” कर्नाटक की विधानसभा में "ब्लू फिल्म" देखने के चलते कृष्णा पालेमर, लक्ष्मण सावदी और सीसी पाटिल को इस्तीफ़ा देना पड़ा! एन .डी. तिवारी के "पैत्रिक-जाँच" को लेकर कोर्ट का आदेश किसी से छुपा हुआ नहीं है !
बाजार और सेक्स के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे नैतिक मूल्यों को पीछे छोड़ दिया है! फिल्म, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चैनल मुद्रित माध्यमों अर्थात "एडवरटाइजमेंट" पर ही निर्भर है ! प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ‘प्लेबाय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है! यह कहना गलत ना होगा कि आज मनुष्य बाजारू संस्कृति
Feb
11
2012
खुले में शौच जाये तो शर्म क्यों आये?
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अक्सर व्यंग में कहा जाता है और शायद आपने पढ़ा भी हो कि हमारे देश में आज संडास से ज्यादा मोबाइल फोन हैं। अगर यहां हर व्यक्ति के पास मल त्यागने के लिए संडास हो तो कैसा रहे? लाखों लोग शहर और कस्बों में शौच की जगह तलाशते हैं और मल के साथ उन्हें अपनी गरिमा भी त्यागनी पड़ती है। महिलाएं जो कठिनाई झेलती हैं उसे बतलाना बहुत ही कठिन है। शर्मसार वो भी होते हैं, जिन्हें दूसरों को खुले में शौच जाते हुए देखना पड़ता है, तो कितना अच्छा हो कि हर किसी को एक संडास मिल जाए और ऐसा करने के लिए कई लोगों ने भरसक कोशिश की भी है। जैसे गुजरात में ईश्वरभाई पटेल का बनाया सफाई विद्यालय और बिंदेश्वरी पाठक के सुलभ शौचालय।
लेकिन अगर हरेक के पास शौचालय हो जाए तो बहुत बुरा होगा। हमारे सारे जल स्रोत-नदियां और उनके मुहाने, छोटे-बड़े तालाब, जो पहले से ही बुरी तरह दूषित हैं- तब तो पूरी तरह तबाह हो जाएंगे। आज तो केवल एक तिहाई आबादी के पास ही शौचालय की सुविधा है। इनमें से जितना मैला पानी गटर में जाता है, उसे साफ करने की व्यवस्था हमारे पास नहीं है। परिणाम आप किसी भी नदी
Jan
31
2012
शैतान की चाहतें
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सलमान रूश्दी के मामले में कांग्रेस के नेतृत्ववाली केंद्र और राजस्थान की सरकार के रवैये से साफ हो गया है कि कांग्रेस एक बार फिर शाहबानो वाले मोड़ पर पहुंच गई है। अंतर सिर्फ इतना है कि 1990 के दशक में जब राजीव गांधी की सरकार ने शाहबानो के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटा था तब उनकी सरकार को संसद में भारत के संसदीय इतिहास का सर्वाधिक बहुमत प्राप्त था। जबकि आज जब स्वर्गीय राजीव गांधी के पुत्र राहुल गांधी की ताजपोशी की कवायद चल रही है तब कांग्रेस संसद में सामान्य बहुमत से भी कोसों दूर है। बावजूद इसके राहुल गांधी और उनकी अम्मा सोनिया गांधी के मुनीम मैनेज मुस्लिमों की दाढ़ी में मक्खनबाजी को ही चुनाव जीतने का श्रेष्ठतम साधन मान रहे हैं।
रूश्दी की पुस्तक को मिला था बुकर पुरस्कार
आश्चर्यजनक रूप से शाहबानो के मामले में इस देश का जो बौद्धिक समुदाय उद्वेलित हुआ था वही राहुल के काल में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के सामने पूंछ हिला रहा है। कहीं से भी सलमान रूश्दी के मामले में संयोजित विरोध के स्वर नहीं उठ रहे हैं। उलटे न्यायमूर्ति (निवृत्त) मार्कंडेय काटजू जैसे प्रचारपीड़ा से ग्रस्त खोखले बुद्धिजीवी सलमान रूश्दी की साहित्यिक क्षमता
Jan
23
2012
मैंने जाकर देखा है उस पार
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बड़ी खूबसूरत बात है, बहुत खूबसूरत स्वार्थ है। कभी इसी स्वार्थ में लोग जीवन के तमाम महत्वपूर्ण वर्ष लगा देते थे। कभी उसमें प्रवेश कर पाते थे, कभी नहीं। पहुंच भी गये तो उसमें बने रहने की लालसा से मुक्त नहीं हो पाते थे। उस पार के अनंत आनंद में जो विकट एकरसता है, जो वैविध्यहीनता है, जो बिलगाव है, उसे सह पाना बहुत कठिन है। उसकी वैयक्तिकता और भी खतरनाक है। कैसे गये, खुद को ही पता नहीं होता। विस्मृति का नैरंतर्य पथज्ञान से वंचित कर देता है। किसी को रास्ता बता नहीं सकते, किसी की मदद नहीं कर सकते। मैंने जाकर देखा है उस पार। अपना होना खत्म करके देखा है। हाँ, वह विरल चैतन्यलोक मुग्ध करता है, उससे बाहर रहने का मन नहीं होता, उसमें बने रहने की उत्कंठा कुछ और करने नहीं देती। तब कुछ नहीं होता फिर भी कुछ होता है। कुछ बड़ा अद्भुत, जो बाहर के जीवन को भी बदल कर रख देता है, सब अच्छा लगने लगता है, सब सुंदर लगने लगता है। कबीर की तरह तो नहीं पर मैंने भी अपना शीश उतार कर देखा। मैं था, मैं नहीं था। कबीर के प्रति कृतज्ञ हूं कि उन्होंने बताया, बेटा यह सही नहीं
Jan
21
2012
मोहनदास और मार्टिन लूथर किंग के अधूरे सपने
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महात्मा गाँधी और डॉ. किंग दोनों स्वप्नद्रष्टा थे। गाँधीजी ने जो सपने देखे थे, उन्हें उन्होंने अपनी पुस्तक ‘मेरे सपनों का भारत’ में लिपिबद्ध भी कर दिया। भारत में सभी धर्मों के अनुयायी रहते हैं। वे इन्सान बनकर आपस में मिलकर रहें, यह गाँधीजी का सपना था। इसके लिए उन्होंने अपने पूरे सामाजिक-राजनैतिक जीवन को लगाया, लम्बे-लम्बे उपवास किये और अपना जीवन भी बलिदान किया। भारतीय समाज में जाति प्रथा का कोढ़ लगा हुआ था। जातिगत भेदभाव मिटें, समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग अछूत, माना जाता था, समाज के इस कलंक को धोने के लिए गाँधीजी ने जीवन भर संघर्ष किया। उनका सपना था कि एक दलित (हरिजन) लड़की भारत की राष्ट्रपति बने। गाँधीजी का एक बड़ा सपना था समता मूलक समाज बनाने का, ऊँच-नीच का भेद समाप्त हो, हर व्यक्ति को काम मिले, धनवान लोग अपनी सम्पत्ति के मालिक नहीं, ट्रस्टी बनें।
डॉ. मार्टिन लूथर किंग ने भी सपने देखे थे। 1963 के ग्रीष्म में अश्वेत लोगों की वाशिंगटन में आयोजित विशाल रैली को सम्बोधित करते हुए उन्होंने घोषणा की थीः आइ हैव ए ड्रीम (मेरा एक सपना है)। उस व्याख्यान ने अश्वेत समाज को झकझोर दिया। अमरीका ने लिबर्टी (स्वातंत्र्य) का स्तम्भ तो लगा लिया, पर वह
Jan
18
2012
कालिख पोतने की सनक
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इन पागलों को मशहूरियत की कीमत में भीड़ के लत्तमजूते का शिकार बनना पडता है। बेहतर होता कि समाज के ये पागल किसी ढेलमारा गोसांई को इजाद कर लेते और समस्तीपुर के चोरों की तरह चौर्य कर्म पर जाने से जूतम पैजार के पैमाने की परख कर लेते। बताते हैं कि समस्तीपुर के ढेलमारा गोसाईं का मंदिर में अब पत्थर या ढेला मारकर सिर्फ चोर ही पूजा नहीं करते बल्कि के इस तरीके का चलन आम भक्तों ने अपना लिया हैं। खास मौकों पर ढेला मारकर पूजा करने वालों की इस मंदिर में भीड़ हुआ करती है। ढेला मारने की परंपरा को अब शगुन या अपशगुन की परख के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है। मतलब ढेल मारा गोसांई पर अब रात के घने अंधेरे में ही नहीं बल्कि भरी दोपहर में भी ढेला मारकर पूजा की जाने लगी है।
पत्थर मारने यानी ढेलेबाजी से पूजा के इस दस्तूर के विस्तार ने बीते साल की शुरूआत में जम्मू-कश्मीर की सरकार को काफी परेशान कर रखा था। बाद में भीड को जब ये बात समझ में आ गई कि पत्थर फेंककर सुरक्षा बलों के हाथों कुटाई के अलावा कुछ हासिल नहीं होता है तो मामला खुद ब खुद शांत
Jan
14
2012
कालिख ने लौटाई चेहरे पर चमक
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बाबा रामदेव हो या अन्ना हजारे ये दोनों ही करप्शन क्रूसेडर मीडिया की उपज और पैदाइश हैं. रामलीला मैदान से भागने के बाद एक दो बार रामदेव दिल्ली आये और काले धन के खिलाफ अलख जगाई लेकिन मानों वे अपनी न्यूज वैल्यू खो चुके थे. मीिडया ने उनको बहुत नोटिस नहीं लिया. लेकिन कालिख कांड का कमाल देखिए कि मकर संक्रांति के दिन बाबा रामदेव ही खबर बने और राजनीतिक दलों के बीच रस्साकसी का मुद्दा भी. एक ओर जहां कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए रामदेव याद आ गये वहीं दूसरी ओर अन्ना हजारे ने भी रामदेव को बेदाग चरित्र का व्यक्ति बताते हुए इस घटना की निंदा कर दी.
शायद इसीलिए रामदेव के चेहरे पर लाली थी. मीडियावालों से दहाडकर कहा-" क्योंकि मैं लंबे समय से कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहा हूं इसलिए मुझे निशाना बनाया जा रहा है." यह निशाना कौन बना रहा है और उन्हे निशाना क्यों बनाया जा रहा है इसके बाबा रामदेव ने इसके कई उदाहरण भी दिये. सीबीआई को बालकृष्ण के पीछे छोड़ दिया गया है और रामदेव के आयुर्वेद महाविद्यालय में लड़कों को भर्ती होने से भी रोका जा रहा है. रामदेव जो इशारा कर रहे हैं वह
Jan
13
2012
इंटरनेट का नाम बदनाम ना करो
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इंटरनेट तब तक बहुत परेशान नहीं कर रहा था जब तक वह सरकारी बाबुओं के मनोरंजन की चीज बना हुआ था लेकिन उस दिन वह निश्चित रूप से परेशानी का कारण नजर आने लगा जब सरकार की सोनिया गांधी के बारे में उल्टा सीधा लिखा जाने लगा. आमतौर पर ब्लागरों के बीच ऐसी बहसें होती रही है कि टिप्पणियों के बारे में हमारा क्या रवैया होना चाहिए. पहली बार सरकार ने यही विचार शुरू कर दिया कि अभिव्यक्ति की आजादी का आखिरकार मतलब क्या होता है? इस विचार विमर्श में जो निष्कर्ष निकला वह यह कि सोनिया गांधी और कपिल सिब्बल के खिलाफ कुछ "उपद्रवी" तत्वों ने इंटरनेट पर जो अश्लील सामग्री डाल रखी है उसे हटा िदया जाए. इंटरनेट कंपनियों के साथ मीटिंग हुई और कंपनियों ने आश्वासन दिया कि "आपत्तिजनक" सामग्रियों को हटा लिया जाएगा. फेशबुक ने वह एकाउण्ट डिलिट कर दिया जिस पर कांग्रेस के खिलाफ जमकर अभिव्यक्ति की आजादी की ऐसी तैसी की गई थी और गूगल ने कह िदया कि शिकायत पर गौर करेंगे.
फेसबुक की तरह गूगल के लिए श्लील और अश्लील की परिभाषा रखने या मिटा देने जैसा नहीं है. गूगल एक सर्च इंजन है और उसका अपना कोई भी कंटेट नहीं होता
Jan
10
2012
माया, मूर्तियाँ और मुकद्दमा
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आचार्य रजनीश "ओशो'' कहते हैं कि मानव के स्वभाव के साथ उत्सुकता जुडी हुई है. इसलिए जिसको जितना दबाओगे या छुपाओगे, उत्सुकता उतनी ही बढती जायेगी. यदि किसी चौराहे के बीचों-बीच चारों ओर से पर्दा लगा कर यह लिख दिया जाये कि " इसके अन्दर एक चित्र है, जिसको देखना मना है ". तो आप-पास रहने वाले सभी जन चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, नौजवान हों या वृद्ध, उसको देखने का प्रयत्न अवश्य ही करेंगे, कोई दिन में मौका ढूँढेगा झांकने का, तो कोई अंधेरी रात में आकर झांकने का प्रयास करेगा. और तो और तमाम शहर में उसकी चर्चा अलग से होगी. इसी प्रकार हाथियों और मायावती की मूर्तियों को ढकने से मायावती और उनकी पार्टी को और अधिक प्रचार मिलेगा चुनाव में, पता नहीं किस दल की शिकायत पर चुनाव आयोग ने यह फैसला दिया है. नीति कहती है कि हटा सकते हो तो हटा दो अन्यथा पूर्णतया अनदेखा कर दो. ऐसी ही नीति अपनाते हुए कांग्रेस की आंख की किरकरी बन गये दिल्ली के कनाटप्लेस के मध्य में चल रहे एक प्रसिद्द काफी हॉउस को आपातकाल में उखाड़ कर वहाँ एक बड़ा सा फौवारा बना दिया गया था. आज लोग उस काफी हॉउस को भूल चुके



