बात करामात

आतंकी हमले और धर्मनिरपेक्ष समाज
 

आतंकी हमले और धर्मनिरपेक्ष समाज

मुम्बई में हुए दुखद बम विस्फोटों पर संघ परिवारियों की बाछें खिल गयीं हैं, और उनके बयान वीरों ने ही नहीं अपितु इंटरनैटियों ने भी अपने अपने हिस्से की राजनीति खेलना शुरू कर दी। लाशों पर राजनीति करने वाले इन बयानबाजों ने गोयबल्स के सिद्धांत के अनुसार बहुत जोर शोर से वे कहानियां बनानी और फैलानी शुरू कर दीं जिससे जाँच या किसी स्वीकारोक्ति से पहले ही लोग एक खास गुट और वर्ग को अपराधी मानना शुरू कर दें। ... Full story

आतंक की राजधानी
 

आतंक की राजधानी

मुंबई को अब तक हम देश की आर्थिक राजधानी कहते रहे हैं। कुछ लोग इसे ग्लैमर की राजधानी भी मानते हैं। गालिब के दिल बहलाने वाले ख़याल की तरह इस शहर को हम आगे भी भले ही यही उपमाएं देते रहें। मगर हकीकत यह नहीं है। आतंकवाद ने देश की इस आर्थिक राजधानी के ग्लैमर को लील लिया है। और बीते कुछेक सालों के इतिहास पर नजर डालें तो, सबसे बड़ी हकीकत यही है कि मुंबई अब सिर्फ आतंक की राजधानी है। मगर, यह शहर बार बार अपने पर लगते आतंक के इस तमगे को हर बार हटाकर फिर से अचानक अपने असली अस्तित्व में आ जाता है। ... Full story

पैरों में स्पोर्ट्स शू, हाथ में मिनरल वाटर और साथ में गाड़ियों का काफिला लेकर गांव की पदयात्रा पर पहुंचे राहुल गांधी
 

पाइरेटेड पदयात्रा और सत्तामोही सत्याग्रह का दौर

साल 2011 सत्याग्रह, अनशन और पदयात्रओं के लिए याद किया जायेगा और उससे भी अधिक इस बात के लिए कि इसी साल इन गांधीवादी हथियारों को कुछ अगंभीर सत्याग्रहियों ने इतना नुकसान पहुंचाया कि इनकी धार कुंद पड़ने लगी. इसकी शुरुआत जन लोकपाल बिल के लिए चलाये जा रहे अन्ना हजारे के आंदोलन से हुई और बाबा रामदेव की यात्रा और अनशन से गुजरते हुए राहुल गांधी की पदयात्रा पर खत्म हुई. इस त्रिस्तरीय यात्रा में इन "लोकतांत्रिक हथियारों" की विश्वसनीयता कितनी गिरी यह किसी से छुपा नहीं है. ... Full story

न्याय के नाम पर नक्सलवाद
 

न्याय के नाम पर नक्सलवाद

सुप्रीम कोर्ट के एसपीओ और सलवा-जुडूम संबंधी आदेशों से छत्तीसगढ़ सरकार की नक्सल विरोधी अभियानों को गंभीर झटका लगा है. अभी दिए अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने जहां सलवा-जुडूम को बंद करने को कहा है वहीं नक्सलियों की नाक में दम कर रख देने वाले बहादुर कोया जवानों समेत सभी करीब पाच हज़ार विशेष पुलिस अधिकारियों को हथियार विहीन करने के साथ-साथ केन्द्र को भी यह आदेश दिया है कि वह किसी भी तरह की आर्थिक मदद एसपीओ के मामले में नहीं करे. ... Full story

चार आने का चले जाना
 

चार आने का चले जाना

हम सब बड़े-ही व्यावहारिक, लेकिन एहसान फरामोश वक्त में जी रहे हैं; किसी ने इस बारे में कोई आवाज नहीं उठाई. और अब तो हालत यह है कि उसकी मौत के फरमान पर बाकायदा आधिकारिक दस्तखत तक किए जा चुके हैं. पहली जुलाई, 2011 को भारत की आबादी का एक छोटा-सा हिस्सा यानी गरीब तबका हमेशा के लिए बदल जाएगा. यह छोटा-सा बदलाव कई मायने में तमाम संदर्भों को नए मायने दे जाएगा. ... Full story

राष्ट्र के परिवर्तन की प्रसव पीड़ा
 

राष्ट्र के परिवर्तन की प्रसव पीड़ा

बीते एक अरसे से जिस तरह के हालात हैं उसे देखकर ऐसा लगता है मानो एक राष्ट्र के रूप में हमारा आत्मविश्वास खत्म हो गया हो। इसी के चलते हमारे राष्ट्र नामक इकाई की तमाम संस्थाएं बेचैन हैं। बीते छह दशकों से यह राष्ट्र जिस तरह के लोगों द्वारा संचालित एवं शासित था, उन सबकी सम्यक वृत्तियां साफतौर पर मध्यमार्गी और राष्ट्रवादी थीं। ये शासक स्थापित मान्यताओं एवं पूर्व निर्धारित प्रणाली के अनुरूप राष्ट्र संचालन कर रहे थे। उन्होंने ऐसा परिवेश तैयार किया था जिसमें ‘वृद्धि’ एवं ‘विकास’ के दुपहिए पर एक टिकाऊ राष्ट्र राज्य की निरंतरता सुनिश्चित थी। लेकिन जिस अंदाज में संसदीय प्रणाली का चौखंभा चीरहरण का शिकार है उससे इस राष्ट्र राज्य का आम आदमी निरंतर अपना आत्मविश्वास खोता जा रहा है। ... Full story

सिविल सोसायटी के प्रतिनिधित्व पर सवाल
 

सिविल सोसायटी के प्रतिनिधित्व पर सवाल

आखिर ‘सिविल सोसायटी’ के अभियान का सार क्या है? जाहिर तौर पर ‘सिविल सोसायटी’ का मुद्दा भ्रष्टाचार है और अगर उसके नजरिए से सोचें तो यह इस समय देश का सबसे बुनियादी सवाल है। लेकिन अगर यह सचमुच सबसे बुनियादी सवाल हो भी, तो क्या भ्रष्टाचार मिटाने के संघर्ष में प्रातिनिधिक लोकतंत्र एवं संवैधानिक व्यवस्था के प्रति खुलेआम अपमान भाव का इज़हार जरूरी है? लेकिन अगर आप यह सवाल उठाएं तो ‘सिविल सोसायटी’ के समर्थक बुद्धिजीवियों आपको ‘राज्यवादी’ बता देंगे। उन बुद्धिजीवियों की नजर में ‘राज्यवादी’ होने का मतलब है कि आप जन-हित की कीमत पर सरकार का समर्थन करते हैं। ... Full story

साधु वही जिसे आरएसएस बताए
 

साधु वही जिसे आरएसएस बताए

आपने वह प्रचार जरूर देखा होगा जिसमें अभिनेता आमिर खान समझाते हैं कि ठंडा मतलब कोका कोला. कुछ कुछ इसी प्रचार की तर्ज पर आरएसएस भी हिन्दू मतलब आरएसएस अकेला की बातें करता है. अगर आरएसएस की परिभाषा को सुनें तो वह हिन्दुओं का एकमात्र प्रतिनिधि संगठन है इसलिए उसे इस बात का ठेका अपने आप मिल जाता है कि वह हिन्दू हितों की पैरवी करे. बात यहीं तक होती तो भी शायद ज्यादा दिक्कत नहीं होती. आरएसएस की मनमानी इतनी बढ़ गयी है कि वह उसे ही साधु मानती है जो आरएसएस के एजेण्डे पर काम करता है. उसकी नजर में वही राष्ट्रवादी है जो उसके एजेण्डे को आगे बढ़ा रहा है. क्या यह देश के हिन्दू चरित्र के अनुकूल है? क्या सचमुच आरएसएस हिन्दुओं का प्रतिनिधि संगठन है? वीरेन्द्र जैन का विश्लेषण- ... Full story

पूर्व सैन्य प्रमुख परवेज मुशर्रफ के साथ जनरल कयानी (दाहिने)
 

कयानी को किनारे करने का कयास

बीते सप्ताह ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ (15 जून के अंक) में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिसके अनुसार पाकिस्तानी सेना में चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल अशफाक परवेज कयानी के खिलाफ बगावत की आशंका व्यक्त की गई है। 64 वर्षो के पाकिस्तानी इतिहास में सेना द्वारा राजनीतिक तख्ता पलट कई बार हुआ है। पाकिस्तान में सैन्य शासन काल सियासी शासनकाल की तुलना में लंबा रहा है। यदि ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ या किसी अखबार में कोई विशेषज्ञ यह दावा करता है कि जनरल अशफाक परवेज कयानी पाकिस्तानी के सियासी हुक्काम आसिफ अली जरदारी का तख्ता पलट करने वाले हैं तो उक्त रिपोर्ट पर बहस की गुंजाइश घट जाती। हर कोई जानता है कि पाकितान में राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की तुलना में चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ का पद बेहद शक्तिशाली है। एक बार सेना बैरकों से निकली तो किसी सियासी सरकार में उसके सामने कुछ घंटे भी टिकने का दम नहीं है। चूंकि दावा पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख के खिलाफ ही सेना की बगावत का है इसीलिए हर कोई इस खबर को चौंक कर देखता है। क्या सचमुच पाकिस्तानी सेना में अपने जनरल के खिलाफ इतना व्यापक असंतोष है? ... Full story

संतन को कहा सीकरी सों काम ?
 

संतन को कहा सीकरी सों काम ?

हिंदी साहित्य के मध्यकाल में कृष्णभक्त कवियों की एक धारा रही, जिन्हें अष्टछाप के नाम से जाना जाता है। इसी अष्टछाप के आठ कवियों में एक कवि कुंभनदास भी थे। एक बार बादशाह अकबर के बुलावे पर उन्हें मुगल सल्तनत की तब की राजधानी फतेहपुर सीकरी जाना पड़ा था। मजबूरी में राजधानी की यात्रा के बाद उनकी व्यथा कुछ यूं फूटी थी – संतन को कहा सीकरी सों काम ? आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसरि गयो हरि नाम ।। ... Full story

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Sarman Nagele

Sarman Nagele

प्रिंट पत्रकारिता से नयी मीडिया की तरफ आये सरमन नगेले mppost.org नामक एक वेबसाइट का संचालन करते हैं. साथ ही आधुनिक तकनीकि से जुड़े विषयों पर सेमिनार, गोष्ठी का आयोजन करते रहते हैं. नये मीडिया पर लेखन और प्रयोग में विशेष रुचि.