बियाबान में शोर
Feb
22
2012
अति के आगे अंत
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यह केवल सरकारी संरक्षण में चल रहे आर्थिक भ्रष्टाचार तक सीमित मामला नहीं है अपितु यह पूरी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े करता है कि हम किस जंगल तंत्र में जीने को विवश हैं। इस जंगलतंत्र का एक रूप हमने गुजरात में देखा था जहाँ आज भी अपराधी न केवल स्वतंत्र हैं अपितु शान से सत्ता सुख लूट रहे हैं क्योंकि वे अपने दुष्प्रचार से मतदाताओं के एक वर्ग को बरगलाने में सफल हैं और हम लोकतंत्र के नाम पर उनको अपने अपराध छुपाने दबाने व जाँच एजेंसियों को प्रभावित करने की ताकत देने के लिए मजबूर हैं। हरियाणा में चुनावों से ठीक पहले कुछ लोग खाप पंचायत के फैसले के नाम पर सरे आम हत्याएं कर देते हैं और लगभग सभी पार्टियों में बैठे, सत्तासुख के लिए वोटों के याचक उनका खुल कर विरोध भी नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें एक जाति के नाराज हो जाने का खतरा था। न्याय व्यवस्था के रन्ध्रों में से निकल कर लम्बे समय तक सुख से जीने वाले अपराधी न्याय में भरोसा रखने वालों को मुँह चिढाते लगते हैं जिसके परिणामस्वरूप लोग जंगली न्याय में भरोसा करने लगते हैं। समाज में बढती हिंसा के पीछे यह एक प्रमुख कारण बनता जा रहा है।
Feb
12
2012
गरीबी और कैलोरी की काल्पनिक सीमारेखा
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गरीबी रेखा एक ऐसी राज्य निर्मित काल्पनिक सीमा रेखा है जो देश की आबादी में से गरीब या अतिपिछडों को अलग करती है। यह कहना बिल्कुल गलत है कि गरीबी रेखा से उपर का हर व्यक्ति अमीर ही है। अमीर तो बहुत कम लोग होते है बाकी लोग सामान्य की श्रेणी मे आते है भले ही वे गरीबी रेखा के बाहर हो। विश्व स्तर पर इस सीमा रेखा का मापदण्ड इक्कीस सौ से चौबीस सौ कैलोरी प्रतिदिन के भोजन के समकक्ष माना जाता है। राज्य का कर्तव्य है कि वह गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने वाले नागरिकों का जीवन स्तर इस तरह सुधारे कि उन्हें चौबीस सौ कैलोरी से ज्यादा प्राप्त होने लगे। कैलोरी का आकलन कुछ भोजन की वस्तुओं के मूल्यों का औसत निकाल कर किया जाता है। चूंकि रूपये का मूल्य हमेशा बदलता रहता है इसलिये समय समय पर मूल्यों का औसत भी बदलता रहता है किन्तु इक्कीस सौ से चौबीस कैलोरी का मापदण्ड नहीं बदलता।
कुछ देशों के नागरिकों का जीवन स्तर इतना उंचा हो जाता है कि वहां कैलोरी का मापदण्ड छोटा पड़ जाता है। तब ये देश इस मापदण्ड में कुछ शिक्षा स्वास्थ्य जोड़कर इस रेखा का आकलन शुरू कर देते हैं। आज
Feb
11
2012
हमजा काशगरी का संदेश और पैगम्बर मोहम्मद का संकट
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हमजा काशगरी ने वैसे तो पैगम्बर मोहम्मद के बारे में जो लिखा है उसमें कहीं से भी पैगम्बर के प्रति नफरत की बू नहीं आती है लेकिन उसको उसकी उन तीन संदेशों के लिए मौत का संदेश भेज दिया गया है जो सही अर्थों में अल्लाह से इश्क का रिश्ता दर्शाता है. हजरत मोहम्मद साहब के जन्मदिन इद-ए-मिलाद से एक दिन पहले हमजा अपनी पहली ट्वीट पोस्ट में लिखता है कि "आपके जन्मदिन पर मैं कह सकता हूं कि मैं आपके अंदर छिपे विद्रोही को प्यार करता हूं. इसलिए आप हमारे लिए हमेशा प्रेरणा के स्रोत रहे हैं. लेकिन मैं आपके आसपास आध्यात्मिक परिवेश (halos of divinity ) नहीं पाता हूं, इसलिए मैं आपसे नफरत करता हूं." इसके बाद हमजा अपनी दूसरी पोस्ट में लिखता है " आपके जन्मदिन से पहले मैं अपने आसपास जहां देखता हूं, आपको पाता हूं. मैं कह सकता हूं कि मेरे पास आपको प्यार करने और नफरत करने दोनों के बहाने हैं." अपनी तीसरी पोस्ट में हमजा लिखता है "आपके जन्मदिन पर मैं आपके सामने सिजदा नहीं करूंगा. मैं आपके हाथ को भी नहीं चूमूंगा. हां, मैं आपसे हाथ मिलाउंगा और आपकी ओर देखकर मुस्कराऊंगा, ठीक वैसे ही जैसे आप मुझे देखकर मुस्कुराएंगे. मैं आपसे
Feb
09
2012
मनरेगा को मारने पर आमादा सरकार
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सरकार के अड़ियल रवैये का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस मुद्दे पर पहले आंध्र प्रदेश और फिर कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने फैसलों में स्पष्ट रूप से कहा कि केन्द्र सरकार मनरेगा के तहत स्थानीय राज्य सरकारों द्वारा घोषित न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी नहीं दे सकती है. दोनों उच्च न्यायालयों के मुताबिक, यह अवैध है और ‘जबरन श्रम’ के बराबर है.
उल्लेखनीय है कि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने १९६७ में अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि न्यूनतम मजदूरी कानून के तहत घोषित न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी पर काम कराना ‘जबरन श्रम’ कराने की तरह है जो पूरी तरह अवैध है. मजदूरी को इससे नीचे गिरने की इजाजत नहीं दी जा सकती है और किसी भी हालत में यह मजदूरी देनी ही होगी.
यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में न्यूनतम मजदूरी (मिनीमम वेज), उचित मजदूरी (फेयर वेज) और लिविंग वेज में अंतर स्पष्ट करते हुए बताया था कि न्यूनतम मजदूरी वह मजदूरी है जिसमें श्रमिक
यूनतम जरूरतें भी मुश्किल से पूरा हो पाती हैं. इस मजदूरी में कोई सिर पर छत, बदन पर कपडे, मेडिकल सुविधा और शिक्षा की भी नहीं सोच सकता है.
सुप्रीम
Feb
04
2012
कोई कैसे कहेगा कि घोटाला हुआ?
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साढ़े चार बरस पहले ट्राई के जिन नियमों की अनदेखी मनमोहन सरकार ने की थी, साढे चार साल बाद वही मनमोहन सरकार ट्राई से उन्हीं नियमों को बनवाने की बात कह रही है। अंतर सिर्फ इतना है कि तब ए राजा मंत्री थे और आज कपिल सिब्बल हैं। तब ए राजा ने बतौर संचार मंत्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर यह जानकारी दी थी कि वह ट्राई के नियमों को नहीं मान रहे और आज कपिल सिब्बल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलकर मीडिया के सामने आये तो ट्राई के जरिये अगले 10 दिनो में उन्हीं नियमों को बनवाने की बात कह गये जो पहले से ही संचार मंत्रालय के दफ्तर में पड़े पड़े धूल खा रही है।
असल में 28 अगस्त 2007 में ही भारतीय दूरसंचार नियमन प्राधिकरण यानी ट्राई ने स्पेक्ट्रम लाइसेंस की कीमतों का निर्धारण करने के लिये प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया को अपनाने का आग्रह संचार मंत्रालय से किया था। और इस बारे में 32 पेज की एक व्याख्या करती हुई रिपोर्ट भी तब के संचार मंत्री ए राजा को सौपी थी। लेकिन संचार मंत्रालय ने बिना देर किये छह घंटों के भीतर ही 28 अगस्त 2007 को ही ट्राई के आग्रह को खारिज करते हुये 2001 की
Feb
02
2012
टूजी घोटाले की टूटी हुई कड़ियां
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टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है. टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में सारा झगड़ा इसी बात का है कि निजी घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन नीति में मनमानी बदलाव किये गये और कौड़ियों के दाम में अनमोल स्पेक्ट्रम टेलिकॉम कंपनियों को बांट दिये गये. मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश देने शुरू किये. उन निर्देशों के आधार पर सीबीआई को केस रजिस्टर करना पड़ा और उसके बाद क्या कुछ हुआ उसको पूरा देश जानता है. अपने इस आदेश के साथ कि जो लाइसेन्स तत्कालीन संचार मंत्री ए राजा द्वारा आवंटित किये गये थे उन्हें कैंसिल किया जाए और उन कंपनियों पर फाइन लगाया है जिन्होंने गड़बड़झाला करके स्पेक्ट्रम हासिल किया था.
गड़बड़झाले में शामिल सबसे बड़ी कंपनी है एटिसलाट डीबी टेलिकॉम. यह वही कंपनी है जिसके मुखिया शाहिद बलवा तिहाड़ में लंबा वक्त बिताकर मुंबई लौट गये हैं. डीबी रियलिटी के नाम से रियल एस्टेट का कारोबार करनेवाली इस कंपनी ने दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मोबाइल मार्केट में इस उम्मीद से कदम रखा था कि वे उसी तरह से भारतीय टेलिकॉम मार्केट में घुसपैठ कर लेंगे जिस तरह से रिलायंस ने किया था. एटिसलाट दुनिया के 19 देशों में
Feb
02
2012
माया के सरदार का काला कारोबार
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ये उत्तर प्रदेश में सत्ता समर्थित भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा नमूना है। प्रदेश के आर्थिक व्यवस्था को राहू की तरह खा जाने वाले पोंटी चड्ढा उर्फ गुरप्रीत सिंह का नाम यहाँ के व्यवसाइयों के लिए ही नहीं मंत्रियों और नौकरशाहों के लिए भी किसी इश्वर के नाम जैसा था ,पंजाब में लिकर किंग नाम से मशहूर पोंटी ने पिछले पांच सालों में एक एक करके सारे व्यवसायों पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। मुरादाबाद में शराब की दुकानों के छोटे नेटवर्क से बढ़ते-बढ़ते सूबे के शराब कारोबार, मल्टीप्लेक्स, रीयल स्टेट, फिल्म निर्माण तक कारोबारी दायरा बढ़ा चुके चड्ढा ने मायावती को इस कदर प्राभावित कर रखा था कि उन्होंने लगभग कई हजार करोड रूपए की चीनी मिल पोंटी को महज २०० करोड में दे दी ।भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक ने उत्तर प्रदेश में औने-पौने दाम में चीनी मिलें बेचने के मामले में कई हजार करोड़ रूपये के घोटाले की पुष्टि की है। अनुमानत: 25 हजार करोड़ रुपये के इस घोटाले में मूल्यांकित किये गये मूल्यों में कटौती करने के कारण जहां 864.99 करोड़ रुपये राजस्व की क्षति हुई वहीं जो चीनी मिलें बेची गयीं उनके मूल्यांकन में सर्किल रेट की अनदेखी करने के कारण 600.18 करोड़ रुपये राजस्व की क्षति
Jan
27
2012
ब्लैक रिपब्लिक डे
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दरअसल अंकित गर्ग को ये पुरस्कार देकर, सरकार न सिर्फ उसके और पाने काले कृत्यों पर पर्दा डाल रही है ,बल्कि छत्तीसगढ़ में नकसली उन्मूलन के नाम पर जारी शोषण ,उत्पीडन एवं मानवाधिकार के उल्लंघन को भी जायज ठहराने की साजिश रच रही है। अंकित गर्ग को मिले पुरस्कार से ये साफ़ होता है कि आनेवाले दिनों में जो भी पुलिस अधिकारी नक्सल प्रभावित राज्यों में भय और दहशत का माहौल पैदा कर ज्यादा से ज्यादा फर्जी मुठभेड़ों ,गिरफ्तारियों को अंजाम देगा ,उसकी जय -जयकार की जायेगी।
गौरतलब है कि सोनी -सोरी का मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है |अंकित गर्ग के अब तक के कार्यकाल के दौरान पुलिसिया ज्यादती के शिकार ज्यादातर लोग अब भी इन्साफ की तलाश में दर-दर् भटक रहे हैं। दंतेवाड़ा के बीजापुर में महुआ बिनते 6 आदिवासियों की हत्या मामले में लीपापोती, पोंजेर में पुलिसवालों और सलवा जुडूम सैनिकों द्वारा आदिवासियों की हत्या और बहुत दबाव के बाद अज्ञात वर्दीधारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज, आदिवासी नेता कोपा कुंजाम की हत्या की साजिश, माठवाड़ा सलवा जुडूम कैंप में तीन आदिवासियों की हत्या, चेरपाल में चल रही एक बैठक में पुलिसवालों द्वारा एक महिला और ढाई साल के एक बच्चे की हत्या जैसे मामलों में
Jan
26
2012
घोटाला और घाघपना
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एस-बेंड का घोटाला सिर्फ जनता के धन का घोटाला नहीं था बल्कि ये राष्ट्र की सुरक्षा के साथ भी की गयी एक बहुत बड़ी दगाबाजी थी मनमोहन सिंह जिनके अधीन इसरो काम करता है और उनकी केबिनेट २ लाख करोड़ के इस महा -घोटाले से जिस तरह से खुद के दामन को पाक-साफ़ बताकर देश के शीर्ष वैज्ञानिकों के सर पर सारा ठीकरा फोड रही है ,उसका असर मत्वपूर्ण अनुसंधानों पर भी पड़ सकता है।
गौरतलब है कि इसरो के प्रतिष्ठान एंट्रिक्स कार्पोरेशन द्वारा देवास जिनके दो लाख करोड़ के एस बैंड घोटाला मामले में देवास कम्युनिकेशन ने कहा है कि एस बैंड आवंटन का पूरा मामला सरकार और केबिनेट की जानकारी में था। कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही देवास मल्टीमीडिया को एस-बेंड के स्पेक्ट्रम आवंटित किये गए थे। हालाँकि केबिनेट और इसरो के मौजूदा अध्यक्ष भी आश्चर्यजनक ढंग से सरकार को इसकी जानकारी होने की बात से इनकार कर रहे हैं।
इस पूरे गडबडझाले को जानने से पहले हमें एस-बेंड को समझना होगा। एस-बैंड उन रेडियो तरंगों को कहते हैं, जिनकी फ्रीक्वेंसी (
्ति) दो और चार गीगा हर्ट्स के बीच होती है। इसकी पारंपरिक सीमा पहले अल्ट्रा हाई फ्रीक्वेंसी (यूएचएफ) और सुपर हाई फ्रीक्वेंसी (एसएचएफ) के बीचJan
25
2012
आधार परियोजना का कॉरपोरेट विचार
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विप्रो वह कंपनी है जो इस परियोजना में महाराष्ट्र सहित देश के कई अन्य हिस्सो में लोगों का बायोमिट्रीक डाटाबेस इकट्ठा कर रही है. जब से वित्त मामलों की संसदीय समिति ने इस परियोजना को लाल झंडी दिखाई है तब से कारपोरेट घराने परेशान हैं. ऊंचे स्तर पर लॉबिंग हो रही है और पहले से विरोध कर रहे गृहमंत्री चिदम्बरम पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे पापुलेशन रजिस्टर के बहाने इसका विरोध बंद कर दें. अब खुद नंदन नीलकेनी ने एक रास्ता सुझाया है कि अगर गृहमंत्रालय चाहे तो वे नेशनल पापुलेशन रजिस्टर को आधार परियोजना के साथ मिला सकते हैं ताकि दोनों तरह के डाटा दोनों पक्ष इस्तेमाल कर सकें. इन दो तरह के पक्षों में एक तो सरकार है फिर दूसरा पक्ष कौन है?
यह दूसरा पक्ष कारपोरेट घराने हैं जो आधार परियोजना के सबसे बड़े हिमायती हैं. उनकी यह हिमायत अनायास नहीं है. आधार परियोजना के जरिए कारपोरेट घराने देश के हर नागरिक का एक डाटाबेस अपने पास रखना चाहते हैं ताकि भविष्य में व्यापारिक गतिविधियों को ज्यादा सटीक तरीके से अंजाम दिया जा सके. इसी महीने जनवरी में दुनिया की जानी मानी पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने आधार परियोजना को अपनी कवर स्टोरी बनाया है.



