भारत की कहानी

Feb

20

2012

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राजनीति का जनाजा ढोते अर्थीबाबा एमबीए

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चुनाव प्रचार के दौरान अर्थी बाबा चुनाव प्रचार के दौरान अर्थी बाबा

तीसरी बार विधानसाभा चुनाव लड़ रहे पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रतिष्ठित गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमबीए डिग्रीधारी राजन यादव जब "अर्थी" लेकर अपना चुनाव प्रचार करते थे तो लोगों के मुंह से बरबस ही हंसी छूट पड़ती थी. लेकिन जैसे ही राजन यादव लोगों को बताते हैं कि वे आखिर क्यों "अर्थी" लेकर चल रहे हैं तो जल्दी ही उनके चेहरों से हंसी काफूर हो जाती. वे राजन की बातों पर एक बार सोचने को मजबूर होते थे. आप के मन में सवाल होगा, आखिर पढ़ा लिखा यह नौजवान पूरे चुनाव के दौरान अर्थी उठा कर अपना मजाक क्यों उडवाता रहा?

दरअसल, बेहतरीन करियर और मान-प्रतिष्ठा त्याग कर 35 वर्षीय यह नौजवान व्यवस्था परिवर्तन चाहता है. राजन यादव के मन में वर्तमान राजनीति के प्रति बेहद आक्रोश है. उनका कहना है कि राजनीति तो मर चुकी है. नेताओं और भ्रष्ट व्यवस्था ने लोकतंत्र और राजनीति की हत्या कर दी है. इसीलिए वह "राजनीति का जनाजा" निकाल रहे हैं. 2007 में पहली बार गोरखपुर से चुनाव लड़ने वाले राजन "अर्थी" लेकर प्रचार करते हैं. इसी वजह से वह "अर्थीबाबा" के नाम से चर्चित हैं. वैसे वे अब आधिकारिक स्तर पर अपना नाम राजन यादव एमबीए उर्फ अर्थीबाबा लिखते हैं. राजनीति का जनाजा

Feb

04

2012

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रंग उदयपुर रै राणा नै

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रंग उदयपुर रै राणा नै

यहाँ के समाज में संत जांभोजी का प्रभाव व्यापक था। उनके संपर्क में आकर राठौड़ों ने मांस तथा मदिरा का सेवन छोड़ दिया। अफीम ने शराब का स्थान ले लिया और धीरे- धीरे इसका महत्व बढ़ता गया। विवाह, सगाई, मरण, मिलन, विछोह, मान- मनुहार, मेलजोल व आपसी समझौते के समय अफीम की मनुहार का यहाँ विशेष महत्व है। अमल के समय विभिन्न इतिहास पुरुषों को स्मरण किया जाता है। इन्हें वे "रंग देना' कहते हैं। इसमें वे ब्रम्हा से लेकर देश के राजा व चौधरी तक को अपने अमूल्य योगदान के लिए रंग देते हैं। इनका एक उदाहरण इस प्रकार दिया जा रहा है --

""रंग उदयपुर रै राणा नै, रंग रुप नगर रै ढ़ाणा नै, रंग मंडोवर री बाड़ी नै, रंग नींबाज रा किंवाड़ा नै, रंग सूरा साकदड़ा नै, रंग कोटड़ा रा घोड़ा नै, रंग तेजा जूंझारा नै, रंग मेड़ता रा अमवारां नै, रंग जसवंत सिघ री हाडी राणी नै, रंग रुपादे मल्लीनाथ री राणी नै, रंग सीता रै सत नै, रंग लिछमण जती नै, रंग ईसरदास नै, रंग जेतमाल दसमा सालगराम नै, रंग जैसल री राणी नै, रंग भीम रा अपांण नै, रंग दीवाण रोहितास नै, रंग सती कागण नै, रंग पाबू रा भाला नै, रंग जायल

Jan

30

2012

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खस्ताहाल है बापू की धरोहर

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खस्ताहाल है बापू की धरोहर

रामनारायण दूबे उनकी काया शारीरिक रूप से दुर्बल ज़रुर दिखती थी मगर वे बेहद मजबूत थे, शारीरिक और आत्मिक दोनों रूपों में। आत्मबल के लिए जहाँ वो मौन रहने और ध्यान, पूजन-अर्चन पर विशेष रूप से केन्द्रित रहते थे, वहीँ शारीरिक तौर पर सक्रियता बनाये रखने के लिए वे हर रोज नियमित रूप से पूरे बदन की एक घंटे मालिश कराया करते थें। प्राकृतिक चिकित्सा के हिमायती राष्ट्रपिता मोहन दास करम चाँद गाँधी का मानना था कि सौ स्नान के बराबर सम्पूर्ण शरीर की एक मालिश होती है। बापू से जुड़े कुछ अन्तरंग पहलुओं का खुलासा किया है बापू के प्राकृतिक चिकित्सक रहे रामनारायण दुबे के पुत्र ओमप्रकाश दुबे ने।

प्राकृतिक चिकित्सक रामनारायण दूबे बीसवीं सदी के चालीस के दशक में वाराणसी के हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज के संस्थापक रामनारायण मिश्र के संपर्क में आये। मिश्र जी के सहयोग से दुबे जी ने लोगों का इलाज करना शुरू किया। सन १९४२ में राज़कांत रजौली स्टेट (चित्रकूट) के राजा का इलाज कर ख्याति प्राप्त किया। धीरे-धीरे रामनारायण दुबे कि चर्चा अब दूर-दूर तक होना शुरू हुई। इसी दौरान सन १९४५ में बापू के गुरु महात्मा भगवान दीन जी और ब्रिटिश राज के लेखक पंडित सुन्दर लाल जी को दमा से छुटकारा दिलाया।

Jan

25

2012

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डिग्गी पैलेस में साहित्य की डुगडुगी

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डिग्गी पैलेस में साहित्य की डुगडुगी

आयोजकों के अनुसार अंदर पैर रखने की जगह नहीं थी. बाहर खड़े लोग आयोजकों की इस दलील को अनसुना करके, किसी भी कीमत पर अंदर जाने की जल्दी में थे. भला हो जयपुर पुलिस का, जो अंदर और बाहर के बीच दीवार बनके खड़ी थी और बिना आयोजकों की इजाजत के उन्होंने किसी को अंदर नहीं जाने दिया.

जयपुर में हो रहा एशिया का सबसे बड़ा साहित्यिक उत्सव अन्ना का आंदोलन नहीं था, जो कोई भी आमो-खास सिर उठाकर चला आए. ना ही यह दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाला पुस्तकों का मेला था कि दस रुपए का टिकट लीजिए और हक से अंदर जाइए. साहित्य उत्सव में तो पास लेकर भी लोग सड़कों पर मारे-मारे फिर रहे थे. जिनकी जेब में पास नहीं था, ऐसे सैकड़ों लोगों का हाल क्या बताएं?

एशिया का सबसे बड़ा साहित्य का यह रेल
कीजिएगा मेला भारत की सरकार के ‘अतुल्य भारत’ के विज्ञापन जैसा ही दिख रहा था. डिग्गी पैलेस साइनिंग से फिल गुड का भी वहां एहसास था. वास्तव में यह आयोजन देश की तरक्की का प्रतीक है. बढ़ते हुए सेंसेक्स और बढ़ती हुई जीडीपी का आइना है. पूरे आयोजन में अन्ना का आम आदमी नदारद था. लोकपाल

Jan

21

2012

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पत्थरों के बीच कटती जिंदगी

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पत्थरों के बीच कटती जिंदगी

यहां सवाल पापी पेट का है। कहावत है कि अगर इंसान के पास पेट ना हो जो किसी से भेट भी ना हो। सो ये लोग पत्थर से बने सामाज जैसे- सिल-बट्टा, जाता-चाकी, और ओखली साइकिल व खच्चरों पर लाद कर अल्सुबह अपने डेरा से सुदूर गांवों निकल जाते हैं ओर शाम ढ़लने के साथ ही चुल्हे की आग रोशन करने के लिए सामान इकठ्ठा कर वापस आ जाते हैं।

यह दास्तां है उत्तर प्रदेश के चन्दौली जनपद के धानापुर समेत पूरे प्रदेश में रहने वाले बंजारा जाति के संगतराश या पत्थरकटों की जो कंजर समुदाय से आते हैं। जो दो वक्त की रोटी की खातिर तमाम मुश्किलों का सामना करने के बावजूद कभी-कभी भूखे पेट सोने पर मजबूर हैं। धानापुर चैराहे पर सड़क के किनारे इनकी आबादी तकरीबन पच्चास से साठ की है। ये खुद को भले ही दलित बताते हो मगर गांव के ही दलित व मैला ढोने वालों की नजर में ये अछूते हैं, कारण साफ है इनकी मुफलिसी, गरीबी और बेचारगी। उत्तर प्रद

े वाराणसी, गाजीपुर, बलिया, गोरखपुर, चंदौली, गोण्डा, बस्ती, महराजगंज आदि जनपदों में इन पत्थरकटों की हालत कमोबेश एक सी हैं। हां, कही ये शिकारी, कहीं भिखारी तो कहीं मदारी के शक्ल में नजर

Jan

19

2012

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साजिश का शिकार हो गई अफीम

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साजिश का शिकार हो गई अफीम

नियम, शर्तंे पहले ही तय हो गई थी और दो कंपनियों को इस कारोबार करने के लायक भी मान लिया गया था। अब केन्द्रीय केबिनेट की मोहर लग जाने के बाद दोनों चुनी गई कंपनियां अपना काम काज संचालन की दिशा में आगे बढ़ा सकेगी ! नई तकनीक से ये कंपनिया सीधे पापी केप्सुल( डोडा) से मार्फिन निकालेगी। अफीम का उत्पादन लेने के झंझट से ही मुक्ति। ना अफीम होगी और न होगी उसकी तस्करी।

साफ जाहिर है, ये धंधा ही मानों हुआ खत्म! पर, हकीकत ये नहीं है। वास्तविकता कुछ और है! धंधा खत्म नहीं हुआ ! वे खत्म होंगे जो अफीम से मादक पदार्थ बना रहे थे ! जब अफीम से ही तैयार मार्फिन की डिमांड है तो वो ही तो उन कंपनियों के कारखानों में बनेगा जो सीधे पापी केप्सुल से निकाला जायेगा! डोडा चूरी की खरीदी का झंझट भी खत्म होगा ! अभी ये भी नहीं बताया गया है कि नई तकनीक से मार्फिन निकाले जाने पर पोस्ता दाना का क्या होगा ! वो निकलेगा या नï हो जायेगा !

कुल मिलाकर साफ दिख रहा है, मालवा मेवाड़ का अकुत धन संपदा देने वाला अफीम उद्योग अन्तर्
रीय कारोबारी ताकतो की साजिश का

Jan

18

2012

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जंगल को जानने का असभ्य नजरिया

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जंगल को जानने का असभ्य नजरिया

जिस तरह से सरकार जंगलों को कॉरपोरेट हाथों में बिना किसी हिचक के देती जा रही है उससे जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराता नजर आता है. एक तो साल-दर-साल जारी आंकड़े में जंगलों का क्षेत्रफल सिमटता जा रहा है. फिर भी यदि हमारी सरकार सचेत नहीं होती है तो यह चिंताजनक बात है.
 
जिस तरह से सारे विश्व में पर्यावरण को लेकर चिंताएं जतायी जा रही हैं. क्योटो से लेकर कोपनहेगन तक चर्चा और बहस का दौर गर्म है. ऐसे में चंद कॉरपोरेट हितों को साधने के लिए जंगलों को नष्ट करना न तो देश हित में है और न ही सदियों से जंगलो में रहते आ रहे समुदायों के हित में. सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि जिस सरकार पर इन आदिवासियों के लिए विकास की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी थी वही सरकार इन पर गोलियां बरसा रही है.यदि झारखंड का ही उदाहरण लें तो
में ऑपरेशन एनाकोंडा के शिकार कितने आदिवासी हुए हैं. लोगों के आंखे फोड़ी जा रही है तो कहीं पुलिस बलात्कार कर रही है. खुद पूलिस भी इस बात को स्वीकार करती है कि चाईबासा जिले के गांव बलवा का रहने वाला मंगल की मौत गलती से हुई

Jan

16

2012

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जिन्दगी से जुड़ी पतंग की डोर

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जिन्दगी से जुड़ी पतंग की डोर

कभी पतंग को आपने आकाश में मुक्त रूप से उड़ान भरते देखा है! क्या कभी सोचा है कि इससे जीवन जीने की कला सीखी जा सकती है। गुजरात और राजस्थान में मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग उड़ाने की परंपरा है। इस दिन लोग पूरे दिन अपनी छत पर रहकर पतंग उड़ाते हैं। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या महिलाएँ, क्या युवतियाँ सभी जोश में होते हैं, फिर युवाओं की बात ही क्या? पतंग का यह त्योहार अपनी संस्कृति की विशेषता ही नहीं, परंतु आदर्श व्यक्तित्व का संदेश भी देता है। आइए जानें पतंग से जीवन जीने की कला किस तरह सीखी जा सकती है-

पतंग का आशय है अपार संतुलन, नियमबध्द नियंत्रण, सफल होने का आRामक जोश और परिस्थितियों के अनुकूल होने का अद्भुत समन्वय। वास्तव में देखा जाए तो तीव्र स्पर्धा के इस युग में पतंग जैसा व्यक्तित्व उपयोगी साबित हो सकता है। पतंग का ही दूसरा नाम है, मुक्त आकाश में विचरने की मानव की सुसुप्त इच्छाओं का प्रतीक। परंतु पतंग आRामक एवं जोशीले व्यक्तित्व की भी प्रतीक है। पतंग का कन्ना संतुलन की कला सिखाते हैं। कन्ना बाँधने में थोड़ी-सी भी लापरवाही होने पर पतंग यहाँ-वहाँ डोलती है। यानी सही संतुलन नहीं रह पाता। इसी तरह हमारे

Jan

07

2012

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भूमिहीनों के लिए फिर शुरू करो भूदान

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भूमिहीनों के लिए फिर शुरू करो भूदान

योजना आयोग ने अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के विकास से जुड़ी योजनाओं की समीक्षा के लिए डॉ नरेन्द्र जाधव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है, कि केन्द्र सरकार को निजी जमीनें खरीद कर भूमिहीन दलितों- आदिवासियों में बांट देना चाहिए। उक्त समिति का सुझाव अच्छा है, पर सवाल है कि जो सरकारें मौजूदा अधिशेष भूमि भूमिहीन दलितों-आदिवासियों में नहीं बांट पा रही हैं, वे जमीन खरीद कर कैसे बांट सकती हैं! जमीन खरीदने के लिए बड़े बजट की जरूरत पड़ेगी और दलितों-आदिवासियों के बारे में बजटीय अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं। इन वर्गों हेतु आवंटित बजट की पूरी राशि खर्च नहीं की जाती या फिर अन्य मदों में खर्च कर दी जाती है। मसलन, दिल्ली में दलितों-आदिवासियों के बजट की अरबों की राशि कॉमनवेल्थ गेम में खर्च कर दी गयी थी। आजादी के समय देश में कृषिभूमि का स्वामित्व चन्द हाथों में था। भूमि की असमानता दूर करने के लिए अनेक कानून बनाए गये पर यह ऐतिहासिक सत्य है कि पंजाब राज्य में दलितों को कृषि भूमि रखने का अधिकार नहीं था।

आचार्य विनोबा भावे का सपना था कि देश में एक भी व्यक्ति भूमिहीन न रहे। 18 अप्रैल 1951

Dec

24

2011

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बिना बसेरा कैसे हो गुजारा?

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बिना बसेरा कैसे हो गुजारा?

पूरे उत्तर भारत में जारी शीत प्रकोप के बीच १२ दिसंबर को भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने को कहा कि वे सड़क किनारे रात गुजारने को मजबूर लोगों के ठंड से बचाव की पर्याप्त व्यवस्था करें। न्यायलय का यह आदेश था कि इस वर्ष कोई भी ठंड से मरना नहीं चाहिए। राज्य सरकारें फुटपाथ पर गुजर करने वालों के लिए सर्वसुविधायुक्त रैन बसेरे बनाए ताकि कड़कड़ाती से किसी की जान न जाए। दरअसल फुटपाथ पर रहने वालों की ठंड में मौत मामले में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्तीस (पी.यू.सी.एल) ने सर्वोच्च न्यायलय में याचिका दायर की थी। इस पर न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की पीठ ने मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड और महाराष्ट्र के मुख्य सचिवों को पर्याप्त संख्या में रैन बसेरे बनाने का आदेश दिया है। न्यायलय ने राज्य सरकारों से ३ जनवरी तक हलफनामा दायर कर निर्माण-व्यवस्था की स्थिति बताने को कहा है। न्यायलय का यह भी कहना है कि जब तक स्थायी रैन बसेरों का निर्माण हो, तब तक अस्थायी रैन बसेरों की व्यवस्था करना राज्य सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए। न्यायमूर्तिद्वय का यह भी कहना था कि संबंधित राज्यों के

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