राजनीति
Feb
09
2012
सियासत की बिसात पर खानदान की शह मात
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यह पहला मौका है कि समूचा गांधी परिवार ही चुनावी प्रचार के मैदान में है। यह पहला मौका है कि गांधी परिवार का हर कोई सक्रिय राजनीति में कूदने के लिये आमादा है। और यह भी पहला मौका है कि कांग्रेस के सत्ता होते हुये भी गांधी परिवार का कोई शख्स सीधे सत्ता को भोग नहीं रहा। अगर कांग्रेस के पन्नों को पलटें तो नेहरु के दौर में इंदिरा गांधी ने कभी सक्रिय राजनीति में आने की सोची जरुर लेकिन खुला इजहार कभी नहीं किया। नेहरु के सहायक के तौर पर ही इंदिरा गांधी उनके दफ्तर से देश संभालने तक पहुंची और कांग्रेस दोनों को समझती रही। 1964 में नेहरु के निधन के बाद ही राज्यसभा के जरीये इंदिरा गांधी लालबहादुर शास्त्री के कैबिनेट में शामिल हुई। और उसके बाद 1967 का चुनाव इंदिरा की अगुवाई में कांग्रेस ने लड़ा तो फिर 1984 तक गांधी परिवार का कोई दूसरा शख्स चुनावी राजनीति के जरीये सामने नहीं आया। संजय गांधी भी सक्रिय राजनीति से इतर एक अपनी लकीर खिंचने में लगे रहे जो इंदिरा गांधी की मुश्किलों को इमरजेन्सी के दिनों में इंदिरा गांधी को हिम्मत दे रहा था। ना इंदिरा गांधी ने चाहा और ना ही संजय गांधी ने इंदिरा
Feb
06
2012
बदमाश है इमाम बुखारी
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किसी भी व्यक्ति को यह हक है कि वह चाहे किसी को भी अपना वोट दे, किसी दूसरे का हस्तक्षेप वह क्यों बर्दाश्त करे? अपील करने से पहले बुखारी को इसका खुलासा करना चाहिए था कि उन्होंने किन मुसलिम मुद्दों और मांगों को मुलायम सिंह यादव के सामने रखा? हालांकि उनके वालिद कई पार्टियों को जिताने की अपील मुसलमानों से कर चुके हैं। पार्टी ने जीतने के बाद मुसलमानों के हक में क्या किया, यह आज तक किसी को पता नहीं है। इतना जरूर है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से जरूर कीमत वसूली। इसका उदहारण 1989 कर चुनाव है। राजीव गांधी की सरकार पर बौफोर्स तोप दलाली को लेकर वीपी सिंह बयानों के गोले दाग रहे थे। सरकार जनता में विश्वसनीयता खो चुकी थी।
दूसरी ओर राम मंदिर आंदोलन पूरे उफान पर था। सांप्रदायिक दंगों की आग में उत्तर प्रदेश के कई शहर जल रहे थे। राममंदिर पर राजीव गांधी की दोगली नीतियों और मलियाना और हाशिमपुरा में पुलिस और पीएसी की ज्यादती के कारण मुसलमानों का कांग्रेस से मोह भंग हो गया था। वे वीपी सिंह को अपने रहनुमा के तौर पर देख रहे थे। मरहूम अब्दुल्ला बुखारी ने मुसलमानों का रुख देखा, तो मुसलमानों से जनता दल को
Feb
04
2012
भाजपा के नेता हैं या पोरस के हाथी?
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इस पार्टी के प्रथम पंक्ति के तमाम नेता अगर प्रधानमंत्री बनने को उतावले हैं और रोज बयानबाजी करते फिर रहे हैं तो इसके प्रदेश स्तर के बड़े नेता मुख्यमंत्री बनने के लिए। उत्तर प्रदेश जैसा राज्य जो इसकी राजनीतिक उड़ानों के लिए कभी हवाई अड्डा सरीखा महत्त्व रखता था आज ऐसी धमाचौकड़ी का शिकार हो गया है कि इस पार्टी के वे नेता जो जमीन से जुड़े हैं तथा देश-प्रदेश की राजनीतिक नब्ज की जिन्हें समझ है, अब मीडिया वालों से बचकर रहने लगे हैं। इस पार्टी के एक पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ने ऐन चुनावों के दौरान प्रदेश के कई वरिष्ठ नेताओं को धकियाते हुए अपने पुत्र को प्रदेश महासचिव ही घोषित करवा दिया। टिकट कटने, दागियों-बाहरी नेताओं को लेने तथा मनपसंद स्थान का टिकट न पाने के कारण पहले से ही दु:खी पार्टीजनों में इससे बेहद असंतोष फैल गया है और यह आलेख लिखे जाने तक पार्टी के तीन वरिष्ठ पदाधिकारियों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था।
सभी जानते हैं कि वर्ष 1991 के बाद से उत्तर प्रदेश भाजपा की स्थिति में लगातार गिरावट आ रही है। कभी जिन मुद्दों के सहारे यह हिन्दू जनमानस को उद्वेलित किया करती थी उन मुद्दों से एक-एक कर इसने
Jan
23
2012
बदरंग हुआ राहुल का रंग
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उत्तर प्रदेश में राहुल अपनी चुनावी सभाओं में विपक्षी दल के शीर्ष नेताओं पर जमकर आरोप लगा रहे हैं मगर जब केंद्र सरकार से जुड़े किसी मुद्दे पर उनकी राय मांगी जाती है तो वे बगलें झांकना शुरू कर देते हैं। हमेशा मायावती के कुशासन पर आँखें तरेरने वाले युवराज का निशाना इन दिनों भाजपा की फायर ब्रांड नेत्री उमा भारती पर लग रहा है। उमा के बाहरी होने के मुद्दे को उन्होंने यह सोचकर उठाया था कि इससे बुंदेलखंड की जनता उमा को नकार देगी जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को होगा। मगर राजनीति में अपरिपक्व युवराज यहाँ भी मात खा बैठे। उमा ने राहुल पर ज़बर्दस्त पलटवार करते हुए उन्हें हिदायत दे डाली और जाने-अनजाने सोनिया के विदेशी मूल के मुद्दे को भी नया रंग दे दिया। उमा के पलटवार से युवराज निःसंदेह असहज महसूस कर रहे होंगे| इतना ही नहीं उमा के बारे में आपत्तिजनक टिप्पड़ी करना भी युवराज को भारी पड़ने लगा है। बुंदेलखंड एवं पूर्वांचल की कई सभाओं में उन्हें काले झंडे दिखाए गए तो भाजपा महिला मोर्चा की पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने राहुल का पुतला फूंक डाला।
गाँधी-नेहरु परिवार का वारिस होने के चलते शायद राहुल गांधी सत्ता के शीर्ष तक भी पहुँच जायेंगे
Jan
06
2012
राजनाथ ने रचा भाजपा का कुशवाहा कांड
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बताया जाता है कि बाबू सिंह कुशवाहा को भाजपा में शामिल करवा कर राजनाथ सिंह ने जहां अपने खास शिष्यों को खुश कर दिया है, वहीं नितिन गडकरी को भी फंसा दिया है। पर बाबू सिंह कुशवाहा भी कम खिलाड़ी नहीं है। जहां खुद भाजपा की तरफ उन्होंने अपना रूख किया है, वहीं अपने खास रामचंद्र प्रधान एमएलसी के भाई धर्मेंद्र प्रधान को सपा में घुसाने की जुगत भी बाबू सिंह कुशवाहा ने लगा लिया है। उतर प्रदेश सरकार में मायावती के एक खास अधिकारी इस पूरे खेल को अंजाम देने में अहम भूमिका निभा रहा है। वास्तव में कुशवाहा को भाजपा का रास्ता भी उक्त अधिकारी ने ही दिखायी था। उसी के बाद कुशवाहा ने इस मामले मे राजनाथ सिंह का सहयोग लिया।
मिली जानकारी के अनुसार बाबू सिंह कुशवाहा को भाजपा में शामिल करने का मुख्य खेल मायावती के शिकार जौनपुर के सांसद धनजंय सिंह ने किया। धनंजय सिंह ने मुख्य रुप से बाबू सिंह कुशवाहा के लिए भाजपा में शामिल करने की रणनीति बनायी है। इसमें राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज की भी भूमिका है। हाल ही में धनंजय सिंह से पंकज सिंह ने जेल में मुलाकात की थी। उसी मुलाकात के दौरान दोनों के बीच
Dec
28
2011
लो! आ गया कांग्रेस का लोकपाल
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वर्तमान राजनीतिक कांग्रेस के आदि पुरुष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आधी रात को देश की मुलाकात नियति से करवाई थी. शायद यह कांग्रेस में नेहरू फैक्टर ही काम कर रहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठानेवाले बाबा रामदेव को भी कांग्रेस ने आधी रात को ही निपटाया था, और अब अन्ना हजारे के लोकपाल को भी आधी रात से थोड़ा पहले रफा दफा कर दिया है. बाबा रामदेव को निपटाने में कांग्रेस को नौ दिन लगे लेकिन अन्ना हजारे को किनारे लगाने में कांग्रेस को करीब नौ महीने का समय लग गया. अप्रैल 2011 में जंतर मंतर से अन्ना हजारे लोकपाल की जो मशाल लेकर भ्रष्टाचार की लंका जलाने चले थे उसकी तपिश उनके खुद के ऊपर इतनी बढ़ गई कि जब लोकपाल के लिए लोकसभा में मतदान चल रहा था तो अन्ना हजारे बुखार की पीड़ा झेल रहे थे. जब ऐन वक्त पर उन्हें दिल्ली में होना था तो सर्दी की सिरदर्दी से बचने के लिए उन्हें मुंबई में अनशन करने के लिए भेज दिया गया था.
इधर दिल्ली में कांग्रेस ने उस नाटक के पूर्ण मंचन की तैयारी कर ली थी जिसे उसने करीब नौ महीने पहले खेलना शुरू किया था. नौ अप्रैल को दिल्ली के जंतर
Dec
13
2011
चुनावी चुनौतियों के बीच छोटे चौधरी
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कांग्रेस अजित की मदद से यूपी में कुछ सीटों पर निशाना साधने की सोच रही है। तीसरा मामला क्रेडिड का है। जाट अजित सिंह पर निसार हैं और उनके सिवा किसी और को अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं। जाटों को आरक्षण देने के मुद्दे पर सरकार पर भारी दवाब है। अजित सिंह चाहते हैं कि केंद्र उनकी शर्त पर जाटों के लिए आरक्षण की घोषणा करे।
उधर, अजित सिंह पर भी सबकी नजरें हैं। लोग यह जानने को बेचैन हैं कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के यूपी—फोर के फार्मूले में पश्चिमी प्रदेश की अवधारणा को अजीत कैसे अपने ड्रीम प्रोजेक्ट हरित प्रदेश में तब्दील करते हैं। यह सवाल उठने भी लगा है। रविवार को आगरा में लोकमंच प्रमुख अमर सिंह ने रैली की और छोटे चौधरी को चुनौती दी कि हरित प्रदेश बनाने का अपना वादा वह पूरा कर दिखाएं।
अजित के हरित प्रदेश के ख्वाब की चाबी भी अब केंद्र सरकार के पास है। मायावती तो प्रस्ताव रूपी गेंद के
के पाले में डालकर अपने पत्ते चल चुकीं। अब केंद्र सरकार पर है कि वह इस प्रस्ताव को राज्य पुनर्गठन आयोग के पास भेजता है या फिर संसद में बहस के लिए पेश करता है। केंद्रNov
28
2011
'आम आदमी' के मुद्दों पर मौन 'एंग्री यंगमैन'!
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राहुल ने बात की तो राजनीतिक प्रतिद्वंदियों की। सपा, बसपा और भाजपा की। उनकी कमियों की। एक बार भी आम आदमी के दुखों की बात नहीं की, बल्कि उनकी दुखती रग पर प्रहार किया। राहुल ने जब भी गरीबों का गाल सहला कर उनका भरोसा जीतने की कोशिश की, तब मंहगाई और मुश्किलों का तमाचा पड़ा। गरीबों की तरफदारी करने वाला मंहगाई पर मौन रहा।
क्या ऐसे ही जवाब देंगे?
राहुल जब यात्रा पर निकलने वाले थे तो पूरा यूपी 'जवाब हम देंगे' की होर्डिंग से पटा पड़ा था। राहुल ने लोगों को भरोसा दिलाया था कि आपकी परेशानियों पर जवाब हम देंगे। यहां तो लोगों को जवाब देना तो दूर अपने कार्यकर्ताओं तक को जवाब नहीं दिया गया। राहुल ने कहा कि आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों की रीढ़ तोड़ देने वाला यूपी अब दूसरे राज्यों की ओर देख रहा है। परप्रांत में जाकर विकास में अपनी मेहनत मजदूरी से योगदान दे रहा है। बदले में उन्हें कुछ नही
Nov
25
2011
किधर जाएंगे मुसलमान, कौन बनेगा भाग्यवान?
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बसपा, कांग्रेस, सपा जैसी पार्टियां ये दांव (मुस्लिम कार्ड) मुस्लिम आरक्षण के जरिए खेल चुकी है। दरअसल उत्तर प्रदेश में करीब 20 फीसदी मुसलमान हैं, जिनका सीधा असर 70-80 विधनसभा सीटों पर है और इन आंकड़ों को लेकर सभी पार्टियां जागरूक हैं। राजनीतिक पंडितों को मालूम है कि इनका वोट किस्तों में विभाजित नही होता, बल्कि एकमुश्त किसी पार्टी की झोली में गिरता है, जो सत्ता तक पहुंचने की आसान सीढ़ी है। सत्ता की इस मलाई को लेकर ही यूपी की जंग में कांग्रेस, बसपा, सपा, बीजेपी, रालोद, पीस पार्टी के बीच मुस्लिम बिरादरी की बदहाली और विकास को लेकर जुबानी जंग तेज हो गई है। राजनीतिक पार्टियों को पता है कि जिधर गए मुसलमान, वही बनेगा भाग्यवान।
ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या 21वीं सदी में भी अल्पसंख्यक समुदाय वोट बैंक की तरह राजनीतिक पार्टियों, नेताओं और उलेमाओं के हाथों की कठपुतली बनते रहेंगे या फिर बिहार, पश्चिम बंगाल की तर्ज पर यूपी विधनसभा चुनाव में अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और विकास के एजेंडे के साथ अपनी किस्मत का फैसला स्वयं करेंगे? ये सवाल उठना जरूरी है क्योंकि सच्चर कमिटी की रिपोर्ट बताती है कि देश में अल्पसंख्यकों की हालत दलितों से भी बदतर है। जबकि हर चुनाव
Nov
24
2011
विरथ रथी की बेबसी
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प्रधानमंत्री पद के दावेदारों के बीच उनका नाम वैसे भी सर्वोच्च है, यह यात्रा एक राजनीतिक प्रसंग है, जिसे ऐसी बातों से हल्का न कीजिए। बस यह देखिए कि अन्ना हजारे, रामदेव और श्रीश्री रविशंकर के अराजनीतिक हस्तक्षेपों के बीच भ्रष्टाचार के खिलाफ के यह अकेली सबसे प्रखर राजनीतिक आवाज है। यह उस पार्टी के लिए भी एक पाठ है जो भावनात्मक सवालों के इर्द-गिर्द ही अपना जनाधार खोजती है। आडवानी की यह सातवीं यात्रा थी, जिसमें वे देश के सबसे ज्वलंत प्रश्न पर बात कर रहे थे। यह इसलिए भी क्योंकि इस सवाल पर उनकी खुद की पार्टी भी बहुत सहज नहीं है। उनकी इस यात्रा को प्रारंभ से झटके लगने शुरू हो गए, क्योंकि एक राजनीतिक वर्ग और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा उनके इस प्रयास को 7- रेसकोर्स की तैयारी के रूप में देख रहा था। इससे यात्रा के प्रभाव को कम करने और आडवाणी के कद के नापने की कोशिशें हुयीं। जो निश्चय ही इस यात्रा के आभामंडल को कम करने वाले साबित हुए। आडवाणी जी अब जबकि 40 दिनों में 22 राज्यों की यात्रा कर लौट आए हैं तब सवाल यह उठता है कि आखिर इस यात्रा से इतनी घबराहटें क्यों थीं? क्या यात्रा के


