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रायबरेली के राजदरबार में

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रायबरेली के राजदरबार में
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लखनऊ के मुगलिया स्थापत्य कला को मायावती ने लाल पत्थरों और नीली रोशनी से चाहे बदल दिया। लेकिन रायबरेली को जो पहचान पचास के दशक में फिरोज गांधी के जरीये गांधी परिवार से मिली, उसे बदलने के लिये ना तो कभी मुलायम ने कोशिश की और ना ही मायावती ने। उल्टे सियासी बिसात पर गांधी परिवार की विरासत रायबरेली के लिये कितनी त्रासदीदायक हो सकती है, यह रायबरेली के वोटरो के दर्द से समझा जा सकता है। 1981 में इंदिरा गांधी ने रायबरेली को चौबीस घंटे रोशनी देने के लिये रायबरेली के ऊंचाहार में फिरोज गांधी विघुत ताप्ती परियोजना स्थापित की। घाटे के बाद भी बिजली उत्पादन बंद ना हो इसके लिये 1992 में एनटीपीसी ने इस विघुत परियोजना को अपने हाथ में ले लिया और रायबरेली की जगह एनटीपीसी की प्राथमिकता लखनऊ हो गयी।

इंदिरा गांधी के बाद रायबरेली का भाग्य सोनिया गांधी के राजनीति में आने के बाद जागा। और 2008 में ऊंचाहार से दो किलोमीटर दूर अमावा में रायबरेली के लिये 220 मेगावाट की विधुत परियोजना लगीं। लेकिन मायावती ने झटके में अमावा से निकलने वाली बिजली को लखनऊ पहुंचाने का निर्देश दे दिया जिससे नीली रोशनी के साये में लखनऊ नहलाता हुआ दिखे। और एक बार फिर रायबरेली अंधेरे में समा गया। दरअसल रायबरेली के लिये गांधी परिवार की विरासत कितनी सुविधापूर्ण है या कितनी महंगी यह लखनऊ से रायबरेली जाने के रास्ते में सबसे पहले इंदिरा गांधी द्वार के भीतर घुसते ही समझ में आ सकता है। इंदिरा गांधी द्वार यानी रायबरेली शुरु हो गया। चंद फर्लांग के बाद ही बछरांवा में दाहिने तरफ महात्मा गांधी की मूर्ति के ठीक पीछे श्री गांधी स्कूल और उससे महज एक किलोमीटर के बाद ही कस्तूरबा गांधी प्राथमिक स्कूल। शहर में कदम रखते ही फिरोज गांधी द्वार और शहर के सबसे व्यस्त चौक को पार करते ही सोनिया गांधी के नाम का टेक्निकल स्कूल। यानी शहर में ऐसी कोई जगह नहीं है जहां से आंखों के सामने कही किसी दीवार पर गांधी परिवार का नाम ना लिखा हो।

फिरोज गांधी से सोनिया गांधी तक के दौर को महसूस करते रायबरेली की त्रासदी यही है कि बीते 22 बरस में जो भी लखनऊ की सत्ता पर काबिज हुआ उसके संबंध कांग्रेस से छत्तीस के रहे और रायबरेली को जुबान लखनऊ से ना मिल कर दिल्ली से मिलती रही। आलम यह भी हुआ कि जिस विद्युत परियोजना से रायबरेली के अंधियारे को दूर करने का प्रयास गांधी परिवार ने किया उस परियोजना से महज ढाई किलोमीटर की दूरी पर मौजूद गांव मजहरगंज में आजादी के 64 बरस बाद महज दो महिने पहले बिजली के खम्बे पहुंचे हैं। मजहरगंज में लगे बिजली के खम्बो का खर्चा भी लखनऊ ने नहीं उठाया बल्कि राजीव गांधी ग्रामीण बिजली योजना के तहत ऊंचाहार से सटे मजहरगंज के लोगों ने गांव में जलते हुये बल्ब को देखा। और अब घर में रोशनी के लिये 700 से डेढ हजर की घूस देनी पड़ रही है। जिसके बाद ही बिजली के तार और मीटर घर तक पहुंचेंगे। लेकिन तब तक चुनाव निपट जायेगा तो फिर घूस की रकम भी बढ़ सकती है। जबकि इस गांव के लोगों ने पचास के दशक में ही नेहरु से लेकर फिरोज गांधी और इंदिरा गांधी को देखा था। वह यादे आज भी गांव के सबसे बुजुर्ग मकसूद अंसारी आंखों में समेटे हैं। और आंखों में गांधी परिवार को लेकर इतनी चमक है कि इतने बरस गांव अंधेरे में रहा लेकिन अफसोस किसी पर नहीं है। सिवाय यह कहने के कि सियासी चालों से तो गांधी परिवार के रायबरेली को खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन रायबरेली के रास्ते इलाहबाद जाने वाली सड़क के आखिर में रायबरेली का ही एक गांव कटरा भी है। जहां आज तक गांधी परिवार के किसी सदस्य ने कदम नहीं रखा। अब गांधी परिवार की पहुंच से कटरा दूर रहा तो कोई नेता भी इस गांव में नहीं पहुचता। इसका असर कटरा बहादुर तहसील पर सीधा पडा। कभी घाघरा नदी के पानी से कटरा में नहर बनी जो अब सूख चुकी है। लेकिन इस नहर पर राजनीतिक पैसा आज भी खर्च होता है। सात महिने पहले ही कागज पर आठ लाख रुपये खर्च हुये जिससे नहर में पानी आ जाये लेकिन नहर का आलम यह है कि अब नहर शौचालय में तब्दील हो चुकी है।

जाहिर है ऐसे में जमीन के नीचे से पानी निकाल कर सिचाई होती है। गांव में बिजली रात में तीन से चार घंटे रहती है तो पानी के लिये लगी मोटर डीजल पर टिकी है। जिससे गांव के लोग डीजल खरीदने के लिये शहर जाकर मजदूरी करते है। इस तहसील में आने वाले छह गांव में कोई ऐसा गांव नहीं जहां पक्की सड़क हो। लेकिन इस बेबसी में भी गांधी परिवार के साथ खड़े होने का रुतबा कोई खोना नहीं चाहता है। इसलिये जब सवाल यह पूछा जाता है कि रायबरेली आकर भी प्रियंका गांधी गांव में क्यों नहीं आयी तो गांव वाले ठहाका लगाकर कहते है कि प्रियंका बिटिया की गाडी गांव की सड़क पर कैसे चलती। इसलिये वह शहर में ही मुंह दिखाकर लौट जाती है। लेकिन बिना मुंह देखे ही हम कांग्रेस को जीता कर मुंह दिखायी हर बार दे देते है। गांधी परिवार से यह प्रेम रायबरेली के बुनकरो में भी खूब है। केन्द्र में देश के लिये बनायी गयी काग्रेस की कपडा नीति ने बुनकरों के हुनर को खत्म कर उन्हें मजदूर बना दिया लेकिन कोई गिला -शिकवा गांधी परिवार से यह के बुनकरों का भी नहीं है। राहुल गांधी के पैकेज का पैसा तो किसी बुनकर के पास अब तक नहीं पहुंचा है लेकिन बुनकरों की हालत यह है कि कमोवेश हर घर में महिलाएं धागे को कात कर जोड़कर उसे रस्सी की तरह मोटा बनाती है। फिर रंगती है। और बुनकर उसे घागे से चारपाई बुनता है। एक किलो रस्सी बनाने की एवज में महज 40 रुपये मिलते हैं और महिने भर में कमाई हर दिन दस घंटे काम करने के बाद भी डेढ़ हजार रुपये पार नहीं कर पाती। मनरेगा यहा कागज पर भी नहीं पहुंचा है।

तो हर दिन सौ रुपये कैसे कमाये जाते हैं, यह भी रायबरेली के गांववालों को नहीं पता। लेकिन शहरी रायबरेली का मिजाज थोड़ा अलग है। शहर में सीमेंट फैक्टरी से लेकर पेपर मिल और टैक्सटाइल मिल से लेकर कारपेट फैकटरी तक है। करीब 23 इंडस्ट्री पहले से है और लालगंज में बन रही रेलवे कोच फैक्ट्री पूरी होने को है। लेकिन रायबरेली का मिजाज इतना शहरी भी नहीं कि उघोग चलते रहे और गांव प्रभावित ना हो। पावर प्लाट से निकलती राख अगर छह गांव की खेती चौपट करती है तो पेपर मिल और सीमेंट कारखाने से निकलते कचरे से दर्जनो गांव के सैकड़ों लोग सासं की बीमारी को गले की खराश मान कर जी रहे है। और सफेद धूल से नहाये गांव के घरों को देखकर अगर सवाल प्रदूषण का करें तो जवाब में गांधी परिवार के रुतबे तले हर कोई यह कहने से नहीं चूकता कि उनकी बदौलत उद्योग तो रायबरेली में आये, लेकिन लखनऊ की सरकार को भी तो कुछ करना चाहिये। और अब लालगंज की कोच फैक्ट्री भी जब रोजगार देने को तैयार है तो फिर उससे प्रभवित किसानी की फिक्र क्या मायने रखती है। शायद इसलिये गांधी परिवार रायबरेली छोड़ना नहीं चाहता और लखनऊ की सियासत रायबरेली को थामना नहीं चाहती। क्योंकि चुनाव के वक्त भी रायबरेली का आम वोटर तो प्रियका गांधी को बिना देखे ही मुंह दिखायी देने को तैयार है।

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rakesh goyal 28/01/2012 19:01:43
Vistar se steek baat likhne ke liye dhanyawad
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sididdharth trive 28/01/2012 23:38:41
prasoon ji aapne bina raibareli ghoome ye lekh likh daala hai shaayad.laalganj me na to coach faiktri poori hone vaali hai na hi yaha ke logo ko rojgaar milne jaa raha hai,...........ulte yaha ke kisaan aandolit hai.raahul gaandhi bhatta-paarsaul ki tarah yaha kyu nhi aate.......?????????
siddharth trivedi.
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Punya Prasun Bajpai

Punya Prasun Bajpai पुण्य प्रसून बाजपेयी ज़ी न्यूज़ (भारत का पहला समाचार और समसामयिक चैनल) में प्राइम टाइम एंकर और सम्पादक हैं। पुण्य प्रसून बाजपेयी के पास प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 20 साल से ज़्यादा का अनुभव है। प्रसून देश के इकलौते ऐसे पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी पत्रकारिता में बेहतरीन कार्य के लिए वर्ष 2005 का ‘इंडियन एक्सप्रेस गोयनका अवार्ड फ़ॉर एक्सिलेंस’ और प्रिंट मीडिया में बेहतरीन रिपोर्ट के लिए 2007 का रामनाथ गोयनका अवॉर्ड मिला हुआ है।
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