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अनवर, मेरे दोस्त!
मुझे एम जे अकबर को ये बताने की जरूरत नहीं कि एक नकली एनकाउंटर को असली बनाने के लिए पुलिसवाले क्या खुद को भी गोली मार लेते हैं? राजबीर, दया नायक और प्रदीप शर्मा असली गोली चला कर हीरो नहीं बने बल्कि ये अकसर उन लोगों को मारकर हीरो बने है जिनकों इन्होंने पकड़ कर रखा था। मोहनचंद शर्मा भी कोई साधू नहीं रहे होंगे, लेकिन एमजे को यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी कि जामिया नगर एनकाउंटर में एम सी शर्मा पुलिस की गोलियों का भी शिकार हो सकते हैं? मेरा सवाल ये है कि क्या वो एक आम मुसलमान की तरह "रिऐक्ट" कर रहे हैं या फिर देश के एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर। यही सवाल मेरा अपने प्रिय मित्र अनवर से भी है।
रामदेव की गंगा रक्षा
जेपी इंडस्ट्रीज रामदेव के योगग्राम में पैसा लगाता है और गंगा रक्षा का दावा करनेवाले बाबा रामदेव गंगा रक्षा के पांच सूत्रीय मांगों में गंगा एक्सप्रेस हाईवे का जिक्र करना भी भूल जाते हैं. इससे गंगा रक्षा मंच और उद्योगपतियों के अन्तर्सम्बन्धों से हकीकत खुद बखुद सामने आ गई है। वैसे भी गंगा में जो भी उतरेगा उसे कपड़े उतारने पडेंगे। और कपड़े उतरेंगे को बहुत कुछ दिखेगा। दामन पर लगे दाग गंगा बाद में धोएगी पहले तो वह सार्वजनिक होगा। वही बाबा रामदेव के साथ हो रहा है।...अहिंसा की वर्णमाला
अहिंसा के क्षेत्र में काम करनेवाली संस्थाओं और व्यक्तियों के लिए क्या शिक्षा प्रणाली पर पुनर्विचार करने का समय नहीं है? यदि है तो हमें वर्णमाला के साथ साथ अहिंसा की वर्णमाला भी पढ़नी होगी. अहिंसा में प्रशिक्षित मानस ही हिंसा को चुनौती दे सकता है और उसकी चुनौती को भी झेल सकता है. ...बाढ़ का कहर, राहत का उत्सव
बाढ़ तो कमोबेश हर साल आती है. एक निश्चित समय पर आती है और देश के अधिकांश नदियों में आती है. अंग्रेज क्या करते थे उनकी बात छोड़ दीजिए, हमारी सरकार भी बांध के आस-पास गणेश परिक्रमा के ज्यादा सालभर कुछ नहीं करती. जब बाढ़ आती है तो राहत का उत्सव शुरू हो जाता है. अब तो कई इलाकों में जनता को भी बाढ़ और राहत देनेवालों का इंतजार रहता है. बाढ़ न आये तो हो सकता है वे निराश होते हों. इस बाढ़ के सालना जलसे में सरकारी अधिकारी, गैर सरकारी संस्थान और अब व्यापारिक घराने भी शामिल होने लगे हैं....इस्लामिक जेहाद का फसाद
पिछले कुछ वर्षों में विश्वस्तर पर वामपंथी भी पूँजीवाद के प्रतीक अमेरिका के विरुद्ध अपनी लडाई में जिहादवादी इस्लामवादी आतंकवादियों को अपना सहयोगी मान कर चल रहे है यही तथ्य भारत में नक्सलियों और माओवादियों के साथ भी है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि भारत में व्यवस्था परिवर्तन का आन्दोलन चलाने वाले भी जाने अनजाने जेहादवादियों के तर्कों का समर्थन करते दिखते हैं।...अतिक्रमण से प्रतिक्रमण की ओर
इन दिनों चारों तरफ निराशा है। वैज्ञानिक, पर्यावरणवादी व मौसम विज्ञानी-सभी तो यही दावा कर रहे हैं कि प्रलय करीब है और मानव सभ्यता अपने विनाश की ओर बढ़ चली है। एक के बाद एक आने वाली नई किताबें हमें बताती हैं कि हमने उस चरम बिंदु को पार कर लिया है और हम एक ऐसे बिंदु पर पहुंच गए हैं, जहां से लौटने का कोई रास्ता नहीं है। हमारा आसमान कार्बन डाईआक्साइड जैसी जहरीली गैसों से भर गया है ओर वातावरण ग्रीनहाउस गैसों से।...दलदल में दलित राजनीति
आज के भारत की सबसे बड़ी दलित नेता उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती हैं। जनसंख्या के हिसाब से देश के सबसे बड़े प्रांत के मुख्यमंत्री पद पर एक दलित महिला का पहुंचना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक बड़ी घटना है। यही नहीं, वे उत्तर प्रदेश की सबसे दबंग मुख्यमंत्री साबित हुई हैं और प्रशासन पर उनकी अच्छी पकड़ है। अफसर उनसे डरते हैं। आपराधिक घटनाओं में लिप्त अपने मंत्रियों, विधायकों और सांसदों पर भी उन्होंने कड़ी कार्रवाई की है। ...गाय भैंस चराएंगे, ओलंपिक पदक लाएंगे
कारपोरेट मीडिया देश के तथाकथित कारपोरेट विशेषज्ञों के हवाले से हमें बता रहा है कि भारत में ओलंपिक पदक लाने की अकूत संभावनाएं पैदा की जा सकती हैं बशर्ते पैसा पानी की तरह बहाया जाए. प्रशिक्षण को विश्वस्तर का बनाया जाए. निश्चित रूप से इससे व्यापार की अकूत संभावनाएं पैदा होगी जिसका कुछ फायदा इन सलाहकारों को भी मिलेगा. इस शोर के बीच मंगल सिंह की आवाज भी सुनी जानी चाहिए. वे किसान पत्रकार हैं और उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में रहते हैं. ओलंपिक में ग्रामीणों के प्रवेश से पैदा होनेवाली संभावना पर मंगल सिंह कह रहे हैं कि.... ...सिंहासन पर गुरूजी
शिबू सोरेन के बारे में हमारी धारणा आमतौर पर ठीक नहीं है. शिबू सोरेन का नाम आते ही हमें झामुमो रिश्वत काण्ड, और शशिनाझ झा हत्याकाण्ड में शामिल एक ऐसे व्यक्ति की तस्वीर मन में उभरती है जो राजनीति का अपराधी होने का आभास देता है. लेकिन शिबू सोरेन के बारे में हमें किंचित यह पता नहीं है कि वे आदिवासियों के दिसाम गुरू हैं. ऐसा गुरू जो उनके हर भटकाव में उन्हें सही रास्ते पर आने की प्रेरणा देता है. एक आदिवासी लड़के का दिसाम गुरू हो जाने की कहानी जाने बिना न हम झारखण्ड आन्दोलन को समझ सकते हैं और न ही शिबू सोरेन को. ...एटमी समझौते के गुप्त सिपहसालार
परमाणु समझौते को एनएसजी तक मंजूर करवाने में नौकरशाही की बड़ी अहम भूमिका रही है. कल एक टीवी चैनल से बात करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन ने कहा कि अब वे राहत की सांस ले रहे हैं. जाहिर है एटमी करार के तकनीकि पहलुओं पर लालू और अमर सिंह सरीखे नेताओं के भरोसे कुछ हो भी नहीं सकता था. राहत की सांस लेनेवालों में केवल नारायणन ही नहीं बल्कि कुछ और नौकरशाह भी हैं. जिन्होंने इस विवादास्पद और अमरीकी यूरोपीय व्यापारिक हितों को साधनेवाले समझौतों को अंजाम दिलवाया. ...जमीन की जंग में सब नाजायज
क्या आंदोलन और खून-खराबे के बाद सरकार किसानों की मांग मानने की आदी हो चुकी है या फिर किसान दमनकारी नीतियों के सामने घुटने टेक देते हैं? आखिर क्यों किसान थोड़े से लालच में अपनी सभी मांगों को भूल शांत बैठ जाते हैं? उत्तर प्रदेश के जनपद गौतमबुद्ध नगर में स्थित मुख्यमंत्री मायावती के पैतृक गांव`बादलपुर´ और `दादरी´ विधान सभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत `घोड़ी-बछेड़ा´ के छह गांवों के किसानों का शासन से समझौता करने के बाद उनके आंदोलन का अंत नििश्चत रूप से यह सवाल पैदा करता है। ...विकास विस्थापन और उत्तराखण्ड
अफवाह और खबर दोनों है िक रतन टाटा सिंगूर छोड़ उत्तराखण्ड आ रहे हैं. वे पन्तनगर में नैनो का मुख्य असेम्बली प्लांट बना सकते हैं. उत्तराखण्ड के लिए इसे सौभाग्य की बात बतानेवाले जरा उत्तराखण्ड के उस टीस को भी अनुभव करें जो टिहरी जैसी बड़ी परियोजनाओं के कारण उसे विरासत में मिली है. उद्योगपतियों को बिना टैक्स प्रदेश में घुसानेवाली सरकारें यह आंकलन क्यों नहीं करती कि इससे आम उत्तराखण्डी को क्या मिला? उनके हिस्से में तो पलायन, विस्थापन और विनाश ही आता है....Author info
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