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मीडिया सर्वेः चैनलों पर सख्ती करे सरकार
मुंबई पर आतंकी हमलों के बाद एक स्वतंत्र मीडिया समूह मीडियाखबर.कॉम द्वारा किये गये सर्वे में ६६.१५ प्रतिशत लोगों ने कहा है कि मीडिया की गतिविधियों पर लगाम लगाना जरूरी है. जबकि २९.३६ फीसदी लोगों का कहना है कि नहीं, सरकार को मीडिया पर अंकुश नहीं लगाना चाहिए. दिसंबर और जनवरी में व्यापक तौर पर किये गये इस सर्वे में ३,७४८ लोगों को शामिल किया गया जिसमें अधिकांश लोग मीडिया से जुडे़ हुए लोग हैं.
प्रणव दा जवाब नहीं !
कांग्रेस पार्टी में गांधी परिवार के भरोसेमंद के तौर पर मुखर्जी का नाम 42 सालों से लिया जा रहा है। पहली बार 1969 में राज्यसभा पहुंचे और तब से कांग्रेस पर छाए हुए हैं। पेशे से वकील रहे प्रणब मुखर्जी खुद को राजीव गांधी के निधन के बाद नरसिंह राव की जगह देख रहे थे। लोकसभा का अनुभव नहीं होना तब उनके आड़े आया था. लेकिन लोकसभा पहुंचे तो कैरियर में राजीव गांधी से कुछ दिनों की तकरार और कांग्रेस से निकलने की बात भारी पड़ी गई। काम लगाने वालों ने कमियों के बहाने भले ही प्रणब मुखर्जी का काम लगाया हो लेकिन जी तोड़ मेहनत से मुखर्जी ने न सिर्फ भरोसे की कमी को दूर किया है बल्कि खूबियों के चलते 74 साल की उम्र में अघोषित तौर पर ही सही, कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनने में सफल हुए हैं....‘स्लमडॉग’ के व्हाइट ‘टाइगर’ की काली दुनिया
जय हो! तो आखिर हमें पहचान ही लिया गया. 4 गोल्डन ग्लोब और अब ऑस्कर में 10 नामांकन ! भारत की नकारात्मक छवि प्रस्तुत करने के बारे में स्लम डॉग के बारे में पहले ही बहुत कुछ कहा जा चुका है, वगैरह-वगैरह। मैं यहां इस बारे में बात ही नहीं करूंगा, लेकिन मेरा दृष्टिकोण (उम्मीद है कि हिंदी के ठेकेदारों ने इस शब्द को ‘मृत’ घोषित नहीं किया होगा) या कह लें कि मेरा ‘साइटएंगल’ (?) दूसरा होगा। हम भारतीयों को अपने भीतर कुछ भी अच्छा नजर नहीं आता जब तक उस पर पश्चिम की मुहर न लग जाए। फिर सिर्फ जय जयकार! ...पत्थरों के रास्ते बदलाव
जिन दलितों से रोजाना रोटी की उलझन नहीं सुलझती थी अब वही पत्थरों के रास्ते बदलाव की तरकीब सुझा रहे हैं. जानवर चराने वाली पहाड़ियों पर ज्वार पैदा करने की सूझ अतिशेक्ति अंलकार जैसी लगती है. मराठवाड़ा में बीड़ जिले के दलितों ने `जमीन हक अभियान´ से जुड़कर जमीन का मतलब जाना और समाज का ताना-बाना पलटकर रख दिया. इन दिनों 69 गांवों की करीब 2000 एकड़ पहाड़ियां दलित-संघर्ष के बीज से हरी-भरी हैं. इस संघर्ष में औरतों ने भी बराबरी से हिस्सेदारी निभायी. इसलिए उन्हें जमीन का आधा हिस्सा मिला. इस तरह खेतीहीन से किसान हुए कुल 1420 में नामों से 710 औरत हैं....तमनार की मार
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ और तमनार जिले के कुछ हिस्से बिजली की बड़ी कीमत चुका रहे हैं. लेकिन कीमत चुकाने वाले कभी खबर नहीं बनते, खबर बनती है कंपनी. पिछले महीने जिंदल पावर लिमिटेड की एक खबर बनी थी कि वह अगले पांच सालों में तमनार पावर प्लांट में १००० मेगावाट से ज्यादा बढ़ोत्तरी नहीं करेगी. इस एक हजार मेगावाट की वृद्धि के बाद तमनार पावर प्लांट की हैसियत बढ़कर ३४०० मेगावाट हो जाएगी. जिंदल पावर के मालिक और सासंद नवीन जिंदल ने तब कहा था कि इस सब पर कोई पांच हजार करोड़ रूपये का निवेश आयेगा. ...रोशनी पाने गये थे, अंधेरा लेकर लौटे
निशुल्क आंख का आपरेशन देश के लाखों गरीबों के लिए आशा का वाक्य है. लेकर अनेक दानदाता संस्थाएं समय-समय पर ऐसे शिविर आयोजित करते रहते हैं. लेकिन इन शिविरों की हकीकत क्या है? हकीकत यह है कि ऐसे शिविरों में डाक्टर बहुत गैर-जिम्मेदार तरीके से काम करते हैं. दातव्य संस्थाएं भी अपना फोटो छपवाने और मीडिया में कवरेज को ही ज्यादा महत्व देती हैं. राजस्थान में भी ऐसी ही एक घटना प्रकाश में आयी है जिसके परिणाम स्वरूप मुख्यमंत्री ने फिलहाल ऐसे कैंपों पर रोक लगा दी है. क्या हुआ और कैसे चली गयी लोगों के आंखों की ज्योति बता रहे हैं विजय प्रताप. ...मुनाफे की दुकान
आजाद भारत में पहला स्वास्थ्य केन्द्र आजादी के पांच साल बाद खुला. १९५० के दशक के आखिर तक अस्पतालों और स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई. लेकिन इनमें से ८१ प्रतिशत सुविधाएं शहरों में बढ़ी हैं. मलेरिया, हैजा, टायफायड जैसे रोग जो महामारी के रूप में गिने जाते थे अब और भयावह हो गये हैं....अखबारों को कोई नहीं मार सकता
अखबारों की मौत की घोषणाएं और बढ़ती प्रसार संख्या के बीच जब भी मीडिया के परिदृश्य में नयी विधा नयी ताकत के साथ दस्तक देती है तब यह स्वाभाविक सा सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या यह पुरानी विधाओं को ग्रस लेगी? जब रेडियो आया तब भी यह सवाल उठा था कि क्या अब भी अखबार की जरूरत बची हुई है? फिर टीवी और एक बार फिर यह कहा गया कि जब दृश्य और श्रव्य का मिला-जुला रूप ही आ गया तो अकेले रेडियो या अखबार की क्या जरूरत है? इसी तरह अब तीनों माध्यमों का समन्वित रूप इंटरनेट मीडिया परिदृश्य पर अवतरित हुआ है तो एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या अखबार मर जाएंगे? ...हे (अ)नाथ! पशुपतिनाथ
पशुपतिनाथ मंदिर में जो कुछ हो रहा है उसमें माओवादियों के एजेंडे को समझने की आवश्यकता है। यह मार्क्सवाद-माओवाद की धर्मविरोधी विचारधारा को लागू करने की कोिशश नहीं है। ऐसा होता तो वे मंदिर ही बंद करने की कोिशश करते। माओ की सांस्कृतिक क्रांति का कुछ अंश इसमें दिख सकता है लेकिन सच यह है कि मार्क्स,लेनिन और माओ की विचारधारा का उनका नेपाली संस्करण एक विकृत उग्र नेपाली राष्ट्रवाद से आच्छादित है। यह व्यवहार में उग्र भारत विरोध हो गया है। वे हर उस प्रतीक, परंपरा एवं कार्यव्यवहार को नष्ट करके उसका अपनी सोच के अनुसार नेपालीकरण करने पर तुले हैं जिनमें भारतीय सभ्यता-संस्कृति की गंध हो। ...डीडीए फ्लैट देगा तो लेगें, नहीं दिया तो केस करेंगे
दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के फ्लैट आवंटन घोटाले को केन्द्र सरकार ने भी गंभीरता से लिया है. केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री अजय माकन ने कहा है कि अगर फ्लैट आवंटन में गडबड़ी पायी गयी तो सारी प्रक्रिया को निरस्त किया जा सकता है. मंत्री और सरकार जो मर्जी रिपोर्ट सौंपे और सफाई दे, आप उनसे मिलिए जिन्हें यह फ्लैट मिला है. उनके नाम पर डीडीए का फ्लैट आवंटित हुआ है लेकिन वे दिल्ली में रहते ही नहीं. रहने की बात छोड़िये वे कभी दिल्ली गये भी नहीं. टीवी के जरिए पता चला कि अब वे दिल्ली में डीडीए के फ्लैट के मालिक हो गये हैं. ...शहीदों का यह कैसा सम्मान?
इंडिया गेट पर जिन सिपाहियों के नाम दर्ज हैं उनमें से ज्यादातर ब्रिटिश हुकूमत की ओर से अफगानों से लड़ते हुए मारे गये थे. उनकी ही याद में ब्रिटिश हुकूमत ने एक स्मारक बनाने का निर्णय लिया था. इंडिया गेट की नींव १० फरवरी १९२१ को डाली गयी थी. जिस साल भारतीय आजादी के तीन सपूतों राजगुरू, सुखदेव और भगत सिंह को फांसी दी गयी उसी साल १९३१ में इन शहीदों के हत्यारे लार्ड इरविन ने इण्डिया गेट को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दे दिया था....Author info
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