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फिर लौटेंगे कार्टून के दिन - काक
हम अखबार के कोने में कार्टून न देखें तो अखबार अधूरा लगता है. लेकिन क्या हमने कभी किसी कार्टूनिस्ट की जिंदगी में झांककर देखने की कोशिश की है कि उसके अपनी जिंदगी का कोना कितना पूरा या अधूरा है? काक हम सबके लिए सुपरिचित कार्टूनिस्ट हैं. काकदृष्टि ब्लिट्ज के जमाने से अपने पाठकों को दृष्टि देती आयी है. एक और मशहूर कार्टूनिस्ट चंदर की काक से की गयी बातचीत.
मौत मांग रहे हैं पलामू के पांच हजार किसान
भारत के इतिहास में यह ऐतिहासिक घटना भी हो सकती है और एतिहासिक त्रासदी भी. लेकिन यह घटना तो है. पलामू के छतरपुर इलाके के लगभग 5000 किसान मरना चाहते हैं. पिछले तीन साल से सूखे से पीड़ित पलामू के ये किसान अब चाहते हैं कि सरकार उन्हें राहत तो नहीं दे सकी तो कम से कम मरने की इजाजत दे दे. अर्जी अभी पांच हजार किसानों की है लेकिन 30 हजार और किसान इच्छामृत्यु की अपनी अर्जियां तैयार कर रहे हैं....हर नीलकेणी की एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी होती है
इन्फोसिस के बारे में कहा जाता है कि वह केवल एक व्यापारिक संस्थान भर नहीं है. वह उससे भी अलग कुछ है. इसी बात का प्रमाण उस समय मिल गया जब केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने नीलकेणी को देश के महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट (एनएयूआई) का अध्यक्ष बनाते हुए उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया है, और नीलकेणी की राजनीतिक महत्वाकांक्षी को कुछ हद पूरा कर दिया है. ...पाकिस्तान में आधुनिक शिक्षा और कंपनियां
पाकिस्तान में राजनीतिक हालात कुछ ही हों और वहां की राजनीतिक अस्थिरता को लेकर तरह-तरह की बातें कही जा रही हो, लेकिन वहां का कॉरपोरेट जगत ऐसी परिस्थितियों में भी देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में योगदान देता नजर आ रहा है। पाकिस्तान के सबसे पुराने वाणियिक संगठन ओवरसीज इन्वेस्टर्स चेम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्टीज (ओआईसीसीआई) की सदस्य कंपनियों ने विगत कुछ वर्षों में 200 करोड़ रूपए से अधिक खर्च किए हैं।...जड़ से जहां तक, कहां से कहां तक?
हिन्दी के प्रतिष्ठित समाचार चैनल जी न्यूज ने चुनाव के दौरान ही जी न्यूज (उत्तर प्रदेश) लांच किया था. चुनाव के दौरान समाचार माध्यमों में अचानक बाढ़ क्यों आ जाती है वह इस चैनल की गतिविधियों को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है. चैनल ने ऐसा बहुत कुछ किया जो उसे नहीं करना चाहिए था. जी न्यूज समूह के एक पत्रकार द्वारा अपने सीनियर एचआर अधिकारी को लिखा गया पत्र विस्फोट न्यूज नेटवर्क के हाथ लगा है, जो बहुत सारी अनकही कहानी कहता है. इस पत्र से यह भी खुलासा होता है कि कैसे चुनाव के दौरान चैनल के शीर्ष पर बैठे लोगों के अपनी पसंद की पार्टियों का पूरा पक्ष लिया. क्यों? इसे समझना क्या बहुत मुश्किल है?...लोगों के हाथ में बंदूक है तो यह उनका जुर्म क्यों?
लालगढ़ को अशांत घोषित कर दिया गया है. इस अशांति के मायने क्या हैं? क्या यह कि तकरीबन 187 गाँवों में संथाली आदिवासी लोगों ने अपनी कमेटियाँ बना ली हैं, वे अपने सुख-दुख का आपस में निपटारा करने का प्रयास कर रहे हैं, गाँव की किसी समस्या का समाधान गाँव में ही कर लेना चाहते हैं. यानि गाँव के लोगों का गाँव के लोगों पर शासन, एक छोटा सा लोकतंत्र आदिवासी समाज का लोकतंत्र. क्योंकि बडा़ लोकतंत्र बडों का हो चुका है इसलिये उन पर नज़र ही नहीं जाती....खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी है जैविक खेती
मॉनसेंटों जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीजों और खाद से हो रही खेती के दुष्परिणाम देश के हर इलाके में दिखने लगे हैं। हर साल पंजाब और हरियाणा में भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। इसके जरिए होने वाली खेती की खाद-पानी और कीटनाशकों की भूख लगातार बढ़ती जा रही है। ...लालगढ़ की लड़ाई का सच क्या है?
पूरा देश यह मान रहा है कि लालगढ़ पर माओवादियों ने कब्जा कर रखा है और सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करके बहुत जनहित का काम कर रही है. ये वो खबरें हैं जो हमें बताई जा रही हैं. लेकिन बहुत कुछ ऐसा है जिसे छिपाया जा रहा है. कोई यह जानने की कोशिश नहीं कर रहा है कि लालगढ़ में संग्राम शुरू ही क्यों हुआ? लालगढ़ के इस इलाके में जिंदल स्टील प्लांट अब तक का सबसे बड़ा स्टील प्लांट होगा. मूलतः संथाल आदिवासियों का यह इलाका इसका विरोध कर रहा है. अगर सिंगूर और नंदीग्राम में अपनी जमीन के लिए लड़ी गयी स्थानीय लोगों की लड़ाई सही थी तो लालगढ़ की लड़ाई गलत कैसे हो गयी? ...भारत के नये दुश्मन का नाम है नेपाल
वैसे तो पड़ोसी मुल्क नेपाल के साथ भारत के रिश्ते उसी दिन से खराब होने शुरू हो गये जिस दिन वहां माओवादी शक्तियां अस्तित्व में आयीं। इसकी नींव 1995 के आसपास पड़ी जो 2000 आते-आते सतह पर दिखाई देने लगी। माओवादी पार्टी के सरकार में शामिल होने के बाद इसमें क्रांतिकारी तेजी आयी। लेकिन हाल-फिलहाल तक माओवादियों के तमाम प्रयास के बावजूद आम नेपाली नागरिक के मन में भारत के प्रति नफरत की भावना न के बराबर थी। परंतु पिछले कुछ दिनों यह भावना अप्रत्याशित रूप से बदली है। वहां भारत विरोधी शक्तियां तेजी से आकार ले रही हैं जिनका एक ही मकसद है कि दोनों देशों के सदियों पुराने रिश्ते में किसी न किसी तरह नफरत का जहर घोलना।...प्रभाष जी के लिखे पर आपत्ति दर्ज करने से पहले अपने गिरेबां में झांकिये
एक हिन्दी वेबसाईट भड़ास4मीडिया पर वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोषी के एक अभियान, जिसमें उन्होंने चुनाव के दौरान कुछ समाचारपत्रों द्वारा धन लेकर खबरें छापने पर ऐतराज जताया है, कई नामी गिरामी पत्रकार अपनी भड़ास निकाल चुके हैं। प्रभाष जी के लिखे के बारे में इस मीडिया साईट पर जो बहस चल रही है वह एकतरफा और कुछ लोगों की पक्षधरता लिए हुए है. मैंने बृजेश जी के लिखे पर आपत्ति दर्ज करते हुए जो लेख उन्हें भेजा पहले तो वह पूरा छपा लेकिन बाद में उसे काटकर छोटा कर दिया गया. भड़ास के संचालक यशवंत सिंह की नजर में जो कुछ "आपत्तिजनक" था वह हमारे लेख से हटा दिया गया. मीडिया पर बहस चलानेवाली एक वेबसाइट की इस पारदर्शिता और प्रभाष जी के लिखे पर उठाये जाने वाले सवालों पर सम्यक जवाब देना जरूरी है. वही आपके सामने रख रहा हूं. ...आनंद शर्मा के खिलाफ जनसंगठन लामबंद, दोहा दौर समाप्त करने का विरोध
नये वाणिज्य मंत्री द्वारा दोहा दौर की वार्ता को समाप्त करने की घोषणा का जन संगठनों ने विरोध किया है. देश के 10 से अधिक जनसंगठनों ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री को लिखे गये एक सामूहिक पत्र में मांग की है कि जब तक दोहा दौर की वार्ता किसी नतीजे पर नहीं पहुंच जाती अमेरिका के साथ किसी प्रकार का द्विपक्षीय समझौता न किया जाए. ...मायावती की मानें तो 'नाटकबाज' थे गांधी
बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो एवं उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर महात्मा गांधी को निशाना बनाया है। इस बार उन्होंने सीधे तौर पर कुछ न कहकर अपनी पार्टी की एक बुकलेट में गांधी को “नाटकबाज” की संज्ञा दी है। 19 जून को बसपा के प्रदेशव्यापी कार्यक्रम के लिए जो पैम्पेलेट छपवाया गया है उसमें कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार को नाटकबाज बताते हुए महात्मा गांधी को भी इसी श्रेणी में रख दिया है और लिखा है कि दलितों के घर में खाने सोने की आदत कांग्रेस की पुरानी है. इसकी शुरूआत महात्मा गांधी से होती है. अभी कुछ माह पूर्व ही मायावती ने गांधी का नाम लेकर कहा था कि दलितों को जो कानूनी अधिकार मिले हैं उसमें गांधी और नेहरू की कोई भूमिका नहीं रही। इसके भी कुछ और पहले जाएं तो अपनी चंडीगढ़ यात्रा के दौरान भी कहा था कि “भारतीय समाज को जातियों में विभाजित करने के लिए महात्मा गांधी जिम्मेदार हैं, वहीं भीमराव अंबेडकर ने समतामूलक समाज बनाने का उदाहरण पेश किया”, असल में मायावती हर बार दलितों के संदर्भ में गांधी और अंबेडकर को आमने-सामने खड़ा कर पुरानी बहस को पुनर्जीवित करने की कोशिश करती हैं। ...धर्मों के बहुराष्ट्रीयकरण की सियासत
किसी एक देश में घटने वाली घटनाओं की गूंज-अनुगूंज अब, धार्मिक आधार पाकर, दूसरे कई देशों में सुनाई देनी शुरू हो गई है। बहुराष्ट्रीय होते इन और अन्य बहुत से धर्मों-संप्रदायों की एक और खासियत यह है कि इनकी संस्थाओं की चंदों-अनुदानों से पाई गई सार्वजनिक संपत्ति का निजीकरण होता रहता है, जिससे इन्हें सीमित किस्म की `आत्मशासी´ व्यवस्था मिल जाती है। इसीलिए इन संस्थाओं से जुड़ी किसी भी अप्रिय घटना की वजह से जो प्रतिक्रिया होती है-गुस्सा और विरोध सामने आता है- वह भी `संपत्ति´ और `व्यवस्था´ पर फूटता है। एक अनुमान के अनुसार हाल में धार्मिक गुरू के अपमान के विरोध में हुए प्रदर्शनों के कारण पंजाब में चार दिनों में सत्तर हजार करोड़ की संपत्ति का नुकसान हुआ और इन धर्मों की बहुराष्ट्रीयता से अहसास होता है कि जैसे इनसे जुड़े मसले पूरी मानवजाति के साझे मसले हो।...विस्फोट से जुड़े पत्रकार को 10 करोड़ का नोटिस
सच बोलने और उस पर अडिग रहने की सजा विस्फोट.कॉम को मिलनी शुरू हो गयी है. उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बी सी खण्डूरी ने विस्फोट के पत्रकार पर 10 करोड़ की मानहानि का मुकदमा दायर करने की तैयारी कर ली है. विस्फोट से जुड़े पत्रकार राजेन्द्र जोशी को आज ही मुख्यमंत्री के वकील की ओर से एक नोटिस मिला है जिसमें मुख्यमंत्री की मानहानि का हवाला देते हुए उनके ऊपर 10 करोड़ का दावा ठोंकने की नोटिस भेजी गयी है. ...कचरे के ढेर में गुम होती बेटियाँ
प्रतिभा पाटिल, सोनिया गांधी, मीरा कुमार, सुषमा स्वराज कुछ ऐसे नाम हैं जो भारत में महिलाओं को सम्मान के शिखर पर पहुंचाते हैं. लेकिन जिस देश के शीर्ष पर महिलाओं का वर्चस्व इस कदर स्थापित हो रहा हो उस देश में 9 साल की दुर्गा भी है जो रोज सबेरे कचरा बीनने का थैला लेकर निकल पड़ती है. भोपाल के अरेरा कालोनी की गलियों में वह रोज कचरा इकट्ठा करती है. पूछने पर दुर्गा कहती है कि वह डाक्टर बनना चाहती है और अपना क्लिनिक बनाना चाहती है. लेकिन बड़े सपनों के साथ बड़ी होती दुर्गा अगले दिन सुबह फिर अरेरा कालोनी की गलियों में निकल पड़ती है. बात साफ है. अगर कूड़ा न बीने तो भूखा सोना पड़ेगा. ...मंजरवे मरे तो दस लोग भी नहीं आये
वह रविवार 31 मई की शाम थी. महीने का आखिरी दिन. मन यूं ही इधर-उधर भटक रहा था. लेकिन नहीं पता था कि यह मेरे आत्मीय लेकिन समाज और दुनिया से उपेक्षित एक महान कलाकार के जीवन का भी आखिरी दिन था. शायद तभी जाने क्यों मन सुबह से ही बेचैन हो रहा था. शाम को अपने एक अजीज मित्र को मोबाइल से मैसेज भेजा- आई वांट टू लीव फुल्ली, सो आई कैन डाई हैप्पी... इज इट पॉसिबल फॉर एनी वन डीयर...?...राजनयिक से राजनीति के शिखर पर मीरा कुमार
पटना में पैदा हुई और दिल्ली में पली-बढ़ी मीरा कुमार पंद्रहवीं लोकसभा अध्यक्ष होंगी. जनता पार्टी के शासन के दौरान देश के उप प्रधानमंत्री रहे जगजीवन राम की पुत्री मीरा कुमार स्वभाव और वाणी दोनों से बहुत मृदुल स्वभाव की हैं. मीरा कुमार का जन्म 31 मार्च 1945 को पटना में हुआ था. लेकिन पिता की राजनीतिक सक्रियता के कारण उनका लालन-पालन दिल्ली में हुआ. दिल्ली के ही इंद्रप्रस्थ कालेज और मिराण्डा हाउस से उन्होंने एमए, एलएलबी और स्पैनिश में डिप्लोमा की डिग्री हासिल की. ...वेब पत्रकारिता का बवंडर
31 मई 2007 को यशवंत सिंह जागरण समूह में कानपुर से स्थानांतरण करके दिल्ली आये थे. यहीं पर सबसे पहले उन्होंने एक ब्लाग शुरू किया जिसका नाम रखा भड़ास. दो साल बाद आज 31 मई को वे हिन्दी मीडिया की सबसे विवादास्पद और चर्चित वेबसाईट भड़ास4मीडिया के संचालक हैं जो मीडिया के रिपोर्टिंग पर केन्द्रित वेबसाईट है. जागरण की नौकरी छोड़ चुके यशवंत पूरी तरह से अपने काम को अंजाम दे रहे हैं. दो साल के अंदर ही यशवंत सिंह और भड़ास4मीडिया दोनों ही हिन्दी मीडिया जगत में खासा चर्चित नाम हो गया है. ...Author info
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